शास्त्रीय विवादसे हानि
शास्त्रोंमें कहीं-कहीं आयी कुछ बातोंको लेकर प्राय: लोग अनेक शंकाएँ किया करते हैं। कुछ लोग उन बातोंको लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर देते हैं। शास्त्रोंमें अनेक प्रकारकी बातें मिलती हैं, पर सब बातें हमारे मनके, हमारे सिद्धान्तके अनुकूल हों—ऐसा सम्भव नहीं है। उनमेंसे कुछ बातें प्रक्षिप्त भी हो सकती हैं, पर कौन-सी बात प्रक्षिप्त है और कौन-सी नहीं है—इसका निर्णय कौन करे? निर्णय करना असम्भव है। शास्त्रोंका निर्णय करना मनुष्यकी बुद्धिके बाहरकी बात है। वास्तवमें शास्त्रोंकी सब बातें सबकी समझमें आ भी नहीं सकतीं। अत: कोई बात हमारी समझमें न आये तो इसमें अपनी समझकी कमी न मानकर उस बातको ही सहसा गलत सिद्ध कर देना उचित नहीं है।
अपनेको समझदार मानकर अभिमान करनेवाले व्यक्ति ही विवाद खड़ा करते हैं। परन्तु जिनमें अपनी समझदारीका अभिमान नहीं है, जो शास्त्रकी कमी न मानकर अपनी समझकी कमी मानते हैं, वे कभी विवाद खड़ा नहीं करते। ऐसे व्यक्ति भविष्यमें शास्त्रकी बातको समझ भी सकते हैं। इसलिये शास्त्रकी बातोंको लेकर विवाद खड़ा करनेमें न हमारा हित है, न दूसरोंका हित है; न वर्तमानमें हित है, न परिणाममें हित है। उलटे लोगोंमें शास्त्रोंके प्रति अश्रद्धा पैदा हो जायगी, जिससे वे शास्त्रोंकी अमूल्य तथा हितकारक बातोंसे वंचित रह जायँगे!
इतिहासके आधारपर सत्यका निर्णय नहीं हो सकता। कारण कि उस समय समाजकी क्या परिस्थिति थी और किसने किस परिस्थितिमें क्या किया और क्यों किया, किस परिस्थितिमें क्या कहा और क्यों कहा—इसका पूरा पता नहीं चल सकता। इसलिये इतिहासमें आयी अच्छी बातोंसे मार्गदर्शन तो हो सकता है, पर सत्यका निर्णय विधि-निषेधसे ही हो सकता है। अत: हमें क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये—इस विषयमें इतिहासको प्रमाण न मानकर शास्त्रके विधि-निषेधको ही प्रमाण मानना चाहिये। गीतामें भगवान्ने कहा है—
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
(गीता १६।२४)
‘तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है—ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य-कर्म करनेयोग्य है, अर्थात् तुझे शास्त्रविधिके अनुसार कर्तव्य-कर्म करना चाहिये।’
इतिहाससे विधि प्रबल है और विधिसे भी निषेध प्रबल है।
शास्त्रीय विवादमें पड़ना साधकका काम नहीं है। वह इस विवादमें पड़ जायगा तो फिर साधन कब करेगा? वास्तवमें जो अपना कल्याण चाहते हैं, जिनमें श्रद्धा-विश्वासकी प्रधानता है, वे शास्त्रीय विवादमें नहीं पड़ते। शास्त्रोंका निर्णय करना कठिन है, पर अपना कल्याण करना सुगम है! जैसे मनुष्य किसी सरोवरके जलसे अपनी प्यास तो बुझा सकता है, पर पूरे सरोवरका जल ग्रहण करना उसके वशकी बात नहीं है, ऐसे ही मनुष्य शास्त्रोंकी बातोंसे अपना कल्याण तो कर सकता है, पर शास्त्रोंकी सब बातोंको समझना, उसका निर्णय करना उसके वशकी बात नहीं है। आजतक बडे़-बडे़ विद्वान्, आचार्य भी इसका निर्णय नहीं कर सके। इसलिये साधकके लिये इस विवादमें न पड़ना ही बढ़िया है। अगर वह उनका निर्णय करनेमें लगेगा तो इससे लाभ तो कुछ होगा नहीं, पर समय अवश्य बरबाद हो जायगा। आजकल कहाँ इतना समय है? कहाँ इतना ज्ञान है? कहाँ इतनी बुद्धि है? कहाँ इतनी सामर्थ्य है? कहाँ इतनी योग्यता है? इसलिये सन्तोंने ठीक ही कहा है—
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥
(मानस, बाल० ६)
तेरे भावैं जो करौ, भलौ बुरौ संसार।
‘नारायन’ तू बैठि के, अपनौ भुवन बुहार॥
भगवान्ने भी गीतामें शास्त्र-जालको ‘श्रुतिविप्रतिपत्ति’ कहा है१। इसलिये शास्त्रोंमें कोई बात प्रक्षिप्त दीखे अथवा अपनी समझमें न आये, उस बातको निकाल देना अनधिकार चेष्टा है और बड़ी हानिकी बात है। साधकके लिये यही उचित है कि वह शास्त्रीय विवादमें न पडे़ और जो बात उसको निर्विवाद दीखे, उसके अनुसार आचरण करे२ और जो बात विवादास्पद दीखे, उसको छोड़ दे।
जैसे, परीक्षामें चतुर विद्यार्थी निर्विवाद प्रश्नोंका उत्तर पहले लिखता है, पीछे विवादास्पद, प्रश्नोंपर विचार करता है। अगर वह पहले ही विवादास्पद प्रश्नोंको लेकर बैठ जायगा तो समय निकल जायगा और वह फेल हो जायगा।
अगर कोई अनुभवी सन्त-महापुरुष दीखे तो उसकी आज्ञाके अनुसार अपना जीवन बनाना सबसे बढ़िया है। सन्त-महापुरुषोंके वचनोंमें भी परस्पर मतभेद होता है; क्योंकि वे वही बात कहते हैं, जो उस समयके अनुसार आवश्यक हो। इसलिये उनकी बातोंमें भी जो बात निर्विवाद हो, उसको अपनाना चाहिये; जैसे—नामजप, भगवत्स्मरण, सेवा, बुराईका त्याग, किसीका अहित न करना आदि निर्विवाद बातें हैं, जो सब समय पालन करनेयोग्य हैं।
शास्त्रोंमें अनेक देवताओं तथा उनकी उपासनाओंका वर्णन है; क्योंकि सभी मनुष्योंकी समान रुचि, श्रद्धा-विश्वास एवं योग्यता नहीं होती। सत्त्वगुण, रजोगुण तथा तमोगुणकी तारतम्यतासे मनुष्योंकी रुचि, श्रद्धा-विश्वास और योग्यता अलग-अलग होते हैं। इसलिये उनकी उपासनाएँ भी अलग-अलग होती हैं। जैसे भूख सबकी एक होती है और तृप्ति भी सबकी एक होती है, पर भोजनकी रुचि अलग-अलग होनेसे भोजनके पदार्थ भी अलग-अलग होते हैं, ऐसे ही उपास्य-तत्त्वकी अप्राप्तिका दु:ख और प्राप्तिका आनन्द सबमें एक होनेपर भी उपासनाकी रुचि अलग-अलग होती है। वास्तवमें उपास्य-तत्त्व एक ही है। एकतामें अनेकता और अनेकतामें एकता हिन्दू-संस्कृतिकी विशेषता है। जैसे शरीरके अवयव अनेक होनेपर भी शरीर एक ही होता है, ऐसे ही उपास्यदेव अनेक होनेपर भी उपास्य-तत्त्व एक ही होता है।
अनेक उपास्यदेव होनेपर भी साधककी निष्ठा एकमें ही होनी चाहिये। अगर वह अनेक उपासना करेगा तो उसकी एक निष्ठा नहीं होगी और एक निष्ठा हुए बिना सिद्धि नहीं होगी। इसी कारण शास्त्रोंमें जहाँ जिस देवता, तीर्थ आदिका वर्णन हुआ है, वहाँ उसीको सर्वोपरि बताया गया है, जिससे मनुष्यकी निष्ठा एकमें ही हो। अगर वह अपने साध्यको सर्वोपरि नहीं मानेगा तो उसका साधन सिद्ध नहीं होगा।
जैसे पतिव्रता स्त्री पतिके सम्बन्धसे सबका आदर-सत्कार करती है, पर उसकी निष्ठा पतिमें ही होती है, ऐसे ही गृहस्थका धर्म है कि वह समय-समयपर (तिथि-त्यौहारपर) सब देवताओंका पूजन करे, आदर करे, पर निष्ठा एककी ही रखे। कुछ लोग अनेक देवी-देवताओंकी उपासना आरम्भ कर देते हैं, पर जब उनके मनमें एक ही देवताकी उपासनाका विचार आता है, तब अन्य देवताओंकी उपासना छोड़नेमें उनको भय लगता है कि कहीं देवता नाराज न हो जायँ, हमारी हानि न कर दें। वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। यदि उद्देश्य कल्याणका हो और निष्कामभाव हो तो एककी उपासना करनेसे दूसरे नाराज नहीं होंगे; क्योंकि मूलमें उपास्य-तत्त्व एक ही है। अनेककी उपासना करनेसे सकामभावकी भी पूर्ति होनी कठिन है। अत: साधकका इष्ट एक ही होना चाहिये।
यं शैवा: समुपासते शिव इति
ब्रह्मेति वेदान्तिनो
बौद्धा बुद्ध इति प्रमाणपटव:
कर्तेति नैयायिका:।
अर्हन्नित्यथ जैनशासनरता:
कर्मेति मीमांसका:
सोऽयं नो विदधातु वाञ्छितफलं
त्रैलोक्यनाथो हरि:॥
(हनुमन्नाटक १।३)
‘शैव शिवरूपसे, वेदान्ती ब्रह्मरूपसे, बौद्ध बुद्धरूपसे, प्रमाणकुशल नैयायिक कर्तारूपसे, जैन अर्हन्-रूपसे और मीमांसक कर्मरूपसे जिसकी उपासना करते हैं, वे त्रैलोक्याधिपति श्रीहरि हमें वाञ्छित फल प्रदान करें।’
त्रयी सांख्यं योग: पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमद: पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥
(शिवमहिम्न० ७)
‘हे प्रभो! वैदिकमत (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद), सांख्यशास्त्र, योगशास्त्र, शैवमत, वैष्णवमत आदि विभिन्न मत-मतान्तर हैं; इनमें ‘हमारा मत उत्तम, लाभप्रद है’—इस प्रकार रुचियोंकी विचित्रता (रुचिभेद) के कारण अनेक सीधे-टेढ़े मार्गोंसे चलनेवाले मनुष्योंके लिये एकमात्र प्रापणीय स्थान आप ही हैं। जैसे सीधे-टेढे़ मार्गोंसे बहती हुई सभी नदियाँ अन्तमें समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार सभी मतावलम्बी अन्तमें आपके पास ही पहुँचते हैं।
आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्।
सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति॥
(लौगाक्षिस्मृति)
‘जैसे आकाशसे गिरा हुआ जल समुद्रमें ही जाता है, ऐसे ही सम्पूर्ण देवताओंको किया गया नमस्कार परमात्माके पास ही जाता है।’