हिन्दूधर्मकी रक्षाके लिये शिखा (चोटी) धारणकी आवश्यकता

हिन्दू-संस्कृति बहुत विलक्षण है। इसमें छोटी-से-छोटी अथवा बड़ी-से-बड़ी प्रत्येक बातका धर्मके साथ सम्बन्ध है और धर्मका सम्बन्ध कल्याणके साथ है। हिन्दूधर्ममें जो-जो नियम बताये गये हैं, वे सब-के-सब नियम मनुष्यके कल्याणके साथ सम्बन्ध रखते हैं। कोई परम्परासे सम्बन्ध रखते हैं, कोई साक्षात् सम्बन्ध रखते हैं। हिन्दूधर्ममें विद्याध्ययनका भी सम्बन्ध कल्याणके साथ है। संस्कृत व्याकरण भी एक दर्शनशास्त्र है, जिससे परिणाममें परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है! इसलिये हिन्दूधर्मके किसी नियमका त्याग करना वास्तवमें अपने कल्याणका त्याग करना है!

जैसे, घड़ीमें छोटे-बड़े अनेक पुर्जे होते हैं। उसमें बड़े पुर्जेका जो महत्त्व है, वही महत्त्व छोटे पुर्जेका भी है। बड़ा पुर्जा अपनी जगह पूरा है और छोटा पुर्जा अपनी जगह पूरा है। छोटे-से-छोटा पुर्जा भी यदि निकाल दिया जाय तो घड़ी बन्द हो जायगी। इसी तरह हिन्दूधर्मकी छोटी-से-छोटी बात भी अपनी जगह पूरी है और कल्याण करनेमें सहायक है। छोटी-सी शिखा अर्थात् चोटी भी अपनी जगह पूरी है और मनुष्यके कल्याणमें सहायक है। शिखाका त्याग करना मानो अपने कल्याणका त्याग करना है!

जैसे घड़ीके छोटे पुर्जेकी जगह बड़ा पुर्जा काम नहीं कर सकता, ऐसे ही हम कोई भी काम करें, उसमें अगर थोड़ी-सी भी कमी रह जायगी तो उसकी पूर्ति नहीं होगी। महाराज नलके चरित्रमें आता है कि कलियुग कई दिनोंतक उनके शरीरमें प्रवेश करनेकी चेष्टा करता रहा, पर प्रवेश कर नहीं सका। एक दिन महाराज नलने लघुशंका करके हाथ तो धो लिये, पर पैर नहीं धोये तो उसी दिन कलियुग उनके भीतर प्रवेश कर गया। फलस्वरूप महाराज नल और उनकी पत्नी दमयन्ती—दोनोंको बड़ा कष्ट भोगना पड़ा। अत: शिखा नहीं रखना बड़ी भारी कमी है, जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती।

शिखा अर्थात् चोटी हिन्दुओंका प्रधान चिह्न है। हिन्दुओंमें चोटी रखनेकी परम्परा प्राचीनकालसे चली आ रही है। परन्तु अब आपने इसका त्याग कर दिया है—यह बड़े भारी नुकसानकी बात है। विचार करें, चोटी न रखनेके लिये अथवा चोटी काटनेके लिये किसीने प्रचार भी नहीं किया, किसीने आपसे कहा भी नहीं, आपको आज्ञा भी नहीं दी, फिर भी आपने चोटी काट ली तो आप मानो कलियुगके अनुयायी बन गये! यह कलियुगका प्रभाव है; क्योंकि उसे सबको नरकोंमें ले जाना है। चोटी कट जानेसे नरकोंमें जाना सुगम हो जायगा। इसलिये आपसे प्रार्थना है कि चोटीको साधारण समझकर इसकी उपेक्षा न करें। चोटी रखना मामूली दीखता है, पर यह मामूली काम नहीं है।

अग्निका एक नाम ‘शिखी’ है। शिखी उसको कहा जाता है, जिसकी शिखा हो—‘शिखा यस्यास्तीति स शिखी’। वह धूमशिखावाला अग्नि हमारा इष्टदेव है—‘अग्निर्देवो द्विजातीनाम्’। अत: शिखा हमारे इष्टदेव (अग्नि)-का प्रतीक है।

हरिवंशपुराणमें एक कथा आती है। हैहय और तालजंघ वंशके राजाओंने शक, यवन, काम्बोज, पारद आदि राजाओंको साथ लेकर राजा बाहुका राज्य छीन लिया। राजा बाहु अपनी पत्नीके साथ वनमें चला गया। वहाँ राजा बाहुकी मृत्यु हो गयी। तब महर्षि और्वने उसकी गर्भवती स्त्रीकी रक्षा की और उसको अपने आश्रममें ले आये। वहाँ उसने एक पुत्रको जन्म दिया, जो आगे चलकर राजा सगरके नामसे प्रसिद्ध हुआ। राजा सगरने महर्षि और्वसे शस्त्र और शास्त्रकी विद्या सीखी। समय पाकर राजा सगरने हैहयोंको मार डाला और फिर शक, यवन, काम्बोज, पारद आदि राजाओंको भी मारनेका निश्चय किया। वेशक, यवन आदि राजालोग महर्षि वसिष्ठकी शरणमें चले गये। वसिष्ठजीने कुछ शर्तोंपर उनको अभयदान दे दिया और राजा सगरको आज्ञा दी कि वे उनको न मारें। राजा सगर अपनी प्रतिज्ञा भी नहीं छोड़ सकते थे और वसिष्ठजीकी आज्ञा भी नहीं टाल सकते थे। अत: उन्होंने उन राजाओंका सिर शिखासहित मुँड़वाकर उनको छोड़ दिया। वे राजालोग क्षत्रिय थे, पर शिखा कटनेके कारण वे सब धर्मभ्रष्ट हो गये—

शका: यवनकाम्बोजा: पारदाश्च विशाम्पते।

कोलिसर्पा: समहिषा दार्द्याश्चोला: सकेरला:॥

सर्वे ते क्षत्रियास्तात धर्मस्तेषां निराकृत:।

वसिष्ठवचनाद् राजन् सगरेण महात्मना॥

(हरिवंशपुराण १४।१८-१९)

‘शक, यवन, काम्बोज, पारद, कोलिसर्प, महिष, दर्द, चोल और केरल—ये सब क्षत्रिय ही थे। वसिष्ठजीके वचनसे महात्मा सगरने इनके धर्मको ही नष्ट कर दिया।’

इस कथासे यह सिद्ध होता है कि शिखा काटनेसे मनुष्य मरे हुएके समान हो जाता है और अपने धर्मसे भ्रष्ट हो जाता है। प्राचीनकालमें किसीकी शिखा काट देना मृत्युदण्डके समान माना जाता था। धर्मके साथ शिखाका अटूट सम्बन्ध है। इसलिये शिखा काटनेपर मनुष्य धर्मच्युत हो जाता है। बड़े दु:खकी बात है कि आज हिन्दूलोग मुसलमानों-ईसाईयोंके प्रभावमें आकर अपने हाथों अपनी शिखा काट रहे हैं! खुद अपने धर्मका नाश कर रहे हैं! यह हमारी गुलामीकी पहचान है।

भगवान् ने गीतामें कहा है—

य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत:।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।

ज्ञात्वा शास्त्रत्त्विधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

(गीता १६।२३-२४)

‘जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि (अन्त:करणकी शुद्धि)-को, न सुख (शान्ति)-को और न परमगतिको ही प्राप्त होता है।’

‘अत: तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है—ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्रविधिसे नियत कर्तव्य-कर्म करनेयोग्य है अर्थात् तुझे शास्त्रविधिके अनुसार कर्तव्य-कर्म करने चाहिये।’

चोटी रखना शास्त्रका विधान है। चाहे सुख मिले या दु:ख मिले, हमें तो शास्त्रके विधानके अनुसार चलना है। भगवान् जो कहते हैं, सन्त-महापुरुष जो कहते हैं, शास्त्र जो कहते हैं, उसके अनुसार चलनेमें ही हमारा वास्तविक हित है। भगवान् और उनके भक्त—ये दोनों ही नि:स्वार्थभावसे सबका हित करनेवाले हैं—

हेतु रहित जग जुग उपकारी।

तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी॥

(मानस, उत्तर० ४७। ३)

इसलिये इनकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाला लोक और परलोक दोनोंमें सुख पाता है।

एक कहानी है। एक बनजारा था। वह बैलोंपर मेट (मुल्तानी मिट्टी) लादकर दिल्लीकी तरफ आ रहा था। रास्तेमें कई गाँवोंसे गुजरते समय उसकी बहुत-सी मेट बिक गयी। बैलोंकी पीठपर लदे बोरे आधे तो खाली हो गये और आधे भरे रह गये। अब वे बैलोंकी पीठपर टिकें कैसे? क्योंकि भार एक तरफ हो गया। नौकरोंने पूछा कि क्या करें? बनजारा बोला—‘अरे! सोचते क्या हो, बोरोंके एक तरफ रेत (बालू) भर लो। यह राजस्थानकी जमीन है, यहाँ रेत बहुत है।’ नौकरोंने वैसा ही किया। बैलोंकी पीठपर एक तरफ आधे बोरेमें मेट हो गयी और दूसरी तरफ आधे बोरेमें रेत हो गयी।

दिल्लीसे एक सज्जन उधर आ रहे थे। उन्होंने बैलोंपर लदे बोरोंमेंसे एक तरफ रेत झरते हुए देखी तो वे बोले कि बोरोंमें एक तरफ रेत क्यों भरी है? नौकरोंने कहा—सन्तुलन करनेके लिये। वे सज्जन बोले—‘अरे! यह तुम क्या मूर्खता करते हो? तुम्हारा मालिक और तुम एक-से ही हो। बैलोंपर मुफ्तमें ही भार ढोकर उनको मार रहे हो! मेटके आधे-आधे दो बोरोंको एक ही जगह बाँध दो तो कम-से-कम आधे बैल तो बिना भारके खुले चलेंगे।’ नौकरोंने कहा कि आपकी बात तो ठीक जँचती है, पर हम वही करेंगे, जो हमारा मालिक कहेगा। तुम जाकर हमारे मालिकसे यह बात कहो और उनसे हमें हुक्म दिलवाओ। वह मालिक (बनजारे)-से मिला और उससे बात कही। बनजारेने पूछा कि आप कहाँके हैं? कहाँ जा रहे हैं? उसने कहा कि मैं भिवानीका रहनेवाला हूँ। रुपये कमानेके लिये दिल्ली गया था। कुछ दिन वहाँ रहा, फिर बीमार हो गया। जो थोड़े रुपये कमाये थे, वे खर्च हो गये। व्यापारमें घाटा लग गया। पासमें कुछ रहा नहीं तो विचार किया कि घर चलना चाहिये। उसकी बात सुनकर बनजारा नौकरोंसे बोला कि इनकी सम्मति मत लो। अपने जैसे चलते हैं, वैसे ही चलो। इनकी बुद्धि तो अच्छी दीखती है, पर उसका नतीजा ठीक नहीं निकलता। अगर ठीक निकलता तो ये धनवान् हो जाते। हमारी बुद्धि भले ही ठीक न दीखे, पर उसका नतीजा ठीक होता है। मैंने कभी अपने काममें घाटा नहीं खाया।

बनजारा अपने बैलोंको लेकर दिल्ली पहुँचा। वहाँ उसने जमीन खरीदकर मेट और रेत दोनोंका अलग-अलग ढेर लगा दिया और नौकरोंसे कहा कि बैलोंको जंगलमें ले जाओ और जहाँ चारा-पानी हो, वहाँ उनको रखो। यहाँ उनको चारा खिलायेंगे तो नफा कैसे कमायेंगे? मेट बिकनी शुरू हो गयी। उधर दिल्लीका बादशाह बीमार हो गया। वैद्यने सलाह दी कि अगर बादशाह राजस्थानके धोरे (रेतके टीले)-पर रहें तो उनका शरीर ठीक हो सकता है। रेतमें मनुष्यको नीरोग करनेकी शक्ति होती है। अत: बादशाहको राजस्थान भेजो।

‘राजस्थान क्यों भेजो? वहाँकी रेत यहीं मँगा लो।’

‘ठीक है, मँगा लेते हैं। रेत लानेके लिये ऊँट भेजो।’

‘ऊँट क्यों भेजें? यहीं बाजारमें रेत मिल जायगी।’

‘बाजारमें कैसे मिल जायगी?’

‘अरे! दिल्लीका बाजार है, यहाँ सब कुछ मिलता है। मैंने एक जगह रेतका ढेर लगा हुआ देखा है!’

‘अच्छा! तो फिर जल्दी रेत मँगा लो।’

बादशाहके आदमियोंने जाकर बनजारेसे पूछा कि रेत क्या भाव है? वह बोला कि चाहे मेट खरीदो, चाहे रेत खरीदो, एक ही भाव है। दोनों बैलोंपर बराबर तुलकर आये हैं। बादशाहके आदमियोंने वह सारी रेत खरीद ली। अगर बनजारा दिल्लीसे आये उस सज्जनकी बात मानता तो ये मुफ्तके रुपये कैसे मिलते? इससे सिद्ध हुआ कि बनजारेकी बुद्धि ठीक काम करती थी।

इस कहानीसे यह शिक्षा लेनी चाहिये कि जिन्होंने अपनी उन्नति कर ली है, जिनका विवेक विकसित हो चुका है, जिनको तत्त्वकी प्राप्ति हो गयी है, ऐसे सन्त-महात्माओंकी बात मान लेनी चाहिये; क्योंकि उनकी बुद्धिका नतीजा अच्छा हुआ है। उनकी बात माननेमें ही हमारा लाभ है। अपनी बुद्धिसे अबतक हमने कितनी उन्नति की है? क्या तत्त्वकी प्राप्ति कर ली है? इसलिये भगवान्, शास्त्र और सन्तोंकी बात मानकर शिखा धारण कर लेनी चाहिये। अगर उनकी बात समझमें न आये तो भी मान लेनी चाहिये। हमने आजतक अपनी समझसे काम किया तो कितना लाभ लिया? जैसे, किसीने व्यापारमें बहुत धन कमाया हो तो वह जैसा कहे, वैसा ही हम करेंगे तो हमें भी लाभ होगा। उनको लाभ हुआ है तो हमें लाभ क्यों नहीं होगा? ऐसे ही जिन सन्त-महात्माओंने परमात्म प्राप्ति कर ली है; अशान्ति, दु:ख, सन्ताप आदिको मिटा दिया है, उनकी बात मानेंगे तो हमारेको भी अवश्य लाभ होगा।

मैं चोटी रखनेकी बात कहता हूँ तो आपके अहितके लिये नहीं कहता हूँ। आपको दु:ख हो जाय, नुकसान हो जाय, सन्ताप हो जाय—ऐसा मेरा बिलकुल उद्देश्य नहीं है। मैं आपके हितकी बात कहता हूँ। आपके लोक और परलोक दोनों सुधर जायँ, ऐसी बात कहता हूँ। वही बात कहता हूँ जो पीढ़ियोंसे आपकी वंश-परम्परामें चली आयी है। एक चोटी रखनेसे आपका क्या नुकसान होता है? आपको क्या दोष लगता है? क्या पाप लगता है? आपके जीवनमें क्या अड़चन आती है? चोटी रखनेकी जो परम्परा सदासे थी, उसका त्याग आपने किसके कहनेसे कर दिया? किस सन्तके कहनेसे, किस पुराणके कहनेसे, किस शास्त्रकी आज्ञासे, किस वेदकी आज्ञासे आपने चोटी रखना छोड़ दिया?

चोटी रखना बहुत सुगम काम है, पर आपके लिये कठिन हो रहा है; क्योंकि आपने उसको छोड़ दिया है। यह बात आपकी पीढ़ियोंसे है। आपके बाप, दादा, परदादा आदि सब परम्परासे चोटी रखते आये हैं, पर अब आपने इसका त्याग कर दिया है, इसलिये अब आपको चोटी रखनेमें कठिनता हो रही है। विचार करें, चोटी रखना छोड़ देनेसे आपको क्या लाभ हुआ? और अब आप चोटी रख लें तो क्या नुकसान होगा? चोटी रखनेसे आपको पैसोंकी हानि होती हो, धर्मकी हानि होती हो, स्वास्थ्यकी हानि होती हो, आपको बड़ा भारी दु:ख मिलता हो तो बतायें! चोटी न रखनेमें लाभ तो कोई-सा भी नहीं है, पर हानि बड़ी भारी है! चोटीके बिना आपका देवपूजन तथा श्राद्ध-तर्पण निष्फल हो जाता है, आपके दान-पुण्य आदि सब शुभकर्म निष्फल हो जाते हैं। इसलिये चोटीको मामूली समझकर इसकी उपेक्षा न करें।

पहले सब लोग चोटी रखते थे। चोटीके बिना कोई आदमी नहीं दीखता था। पर हमारे देखते-देखते थोड़े वर्षोंमें आदमी शिखारहित हो गये। अब प्राय: लोगोंकी शिखा नहीं दीखती। शिखा और सूत्र (जनेऊ)-का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। आश्चर्यकी बात है कि आज ऐसे लोग भी हैं; जिनका सूत्र तो है, पर शिखा नहीं है! यह कितने पतनकी बात है! अगर यही दशा रही तो आगे आपको कौन कहेगा कि चोटी रखो? और क्यों कहेगा? कहनेसे उसको क्या लाभ?

शिखा हिन्दुत्वकी पहचान है। यह आपकी जातिकी रक्षा करनेवाली है। जनेऊ तो सबके लिये नहीं है, केवल ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यके लिये है, पर शिखा हिन्दूमात्रके लिये है। चाहे द्विजाति हो, चाहे अन्त्यज हो, शिखा सबके लिये है। जैसे मुसलमानोंके लिये सुन्नत है, ऐसे ही हिन्दुओंके लिये शिखा है। सुन्नतके बिना कोई चोटी रखना शास्त्रका विधान है। मुसलमान नहीं मिलेगा, पर शिखाके बिना आज हिन्दुओंका समुदाय-का-समुदाय मिल जायगा। मुसलमान और ईसाई बड़े जोरोंसे अपने धर्मका प्रचार कर रहे हैं और हिन्दुओंका धर्म-परिवर्तन करनेकी नयी-नयी योजनाएँ बना रहे हैं! आपने अपनी चोटी कटवाकर उनके प्रचार-कार्यको सुगम बना दिया है! इसलिये समय रहते हिन्दुओंको सावधान हो जाना चाहिये। मुसलमान अपने धर्मका प्रचार मूर्खतासे करते हैं और ईसाई बुद्धिमत्तासे। मुसलमान तो तलवारके जोरसे जबर्दस्ती धर्मपरिवर्तन करते हैं, पर ईसाई बाहरसे सेवा करके भीतर-ही-भीतर (गुप्त रीतिसे) धर्म-परिवर्तन करते हैं। वे स्कूल खोलते हैं और उनमें बालकोंपर अपने धर्मके संस्कार डालते हैं। इसीका परिणाम है कि घर बैठे-बैठे हिन्दुओंने अपनी चोटीका त्याग कर दिया। इस काममें ईसाई सफल हो गये! मुसलमानों और ईसाइयोंका उद्देश्य मनुष्यमात्रका कल्याण करना नहीं है, प्रत्युत अपनी संख्या बढ़ाना है, जिससे उनका राज्य हो जाय। कलियुगका प्रभाव प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन जोरोंसे बढ़ रहा है। लोगोंकी बुद्धि भ्रष्ट हो रही है। मनुष्यमात्रका कल्याण चाहनेवाली हिन्दू-संस्कृति नष्ट हो रही है। हिन्दू स्वयं ही अपनी संस्कृतिका नाश करेंगे तो रक्षा कौन करेगा?

प्रश्नोत्तर

प्रश्न—चोटी रखनेसे क्या लाभ होगा?

उत्तर—जो लाभको देखता है, वह पारमार्थिक उन्नति कर सकता ही नहीं। लाभ देखकर ही कोई काम करोगे तो फिर शास्त्र-वचनका, सन्त-वचनका क्या आदर हुआ? उनकी क्या इज्जत हुई? अपने लाभके लिये, अपना मतलब सिद्ध करनेके लिये तो पशु-पक्षी भी कार्य करते हैं। यह मनुष्यपना नहीं है। चोटी रखनेमें आपकी भलाई है—इसमें मेरेको रत्तीमात्र भी सन्देह नहीं है। वास्तवमें हमें लाभ-हानिको न देखकर धर्मको देखना है। धर्मशास्त्रमें आया है कि बिना शिखाके जो भी यज्ञ, दान, तप, व्रत आदि शुभकर्म किये जाते हैं, वे सब निष्फल हो जाते हैं—

सदोपवीतिना भाव्यं सदा बद्धशिखेन च।

विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम्॥

(कात्यायनस्मृति १।४)

इतना ही नहीं, शिखाके बिना किये गये वे पुण्यकर्म राक्षस-कर्म हो जाते हैं—

विना यच्छिखया कर्म विना यज्ञोपवीतकम्।

राक्षसं तद्धि विज्ञेयं समस्ता निष्फला क्रिया:॥

(व्यास)

इसलिये धर्मशास्त्रने आज्ञा दी है—

स्नाने दाने जपे होमे सन्ध्यायां देवतार्चने।

शिखाग्रन्थिं सदा कुर्यादित्येतन्मनुरब्रवीत्॥

‘स्नान, दान, जप, होम, सन्ध्या और देवपूजनके समय शिखामें ग्रन्थि (चोटीमें गाँठ) अवश्य लगानी चाहिये—ऐसा महाराज मनुने कहा है।’

हिन्दूधर्मके सोलह संस्कारोंमें ‘चूड़ाकरणसंस्कार’ (मुण्डन संस्कार)-का भी विशेष महत्त्व है। इस संस्कारमें शिखा धारण करनेसे दीर्घ आयु, तेज, बल और ओजकी प्राप्ति होती है—

दीर्घायुत्वाय बलाय वर्चसे शिखायै वषट्।

शिखाके विशेष महत्त्वके कारण ही हिन्दुओंने यवन-शासनमें अपनी शिखाकी रक्षाके लिये सिर कटवा दिया, पर शिखा नहीं कटवायी। कितने दु:खकी बात है कि आज हिन्दू उसी शिखाको अपने ही हाथों काट रहे हैं! धर्मशास्त्रमें शिखा न रखनेका प्रायश्चित्त बताया गया है—

शिखां छिन्दन्ति ये मोहाद् द्वेषादज्ञानतोऽपि वा।

तप्तकृच्छ्रेण शुद्धॺन्ति त्रयो वर्णा द्विजातय:॥

(लघुहारीत)

‘तीनों वर्णोंके जो द्विजाति लोग मोहसे, द्वेषसे अथवा अज्ञानसे अपनी शिखा काट देते हैं, वे तप्तकृच्छ्र-व्रत करनेसे शुद्ध होते हैं।

अथ चेत् प्रमादान्निशिखं वपनं स्यात् तत्र कौशीं शिखां ब्रह्मग्रन्थिसमन्वितां दक्षिणकर्णोपरि आशिखाबन्धादवतिष्ठेत्॥

(काठकगृह्यसूत्र)

‘यदि कोई मनुष्य प्रमादवश शिखासहित क्षौर (हजामत) करा ले तो वह ब्रह्मग्रन्थियुक्त कुशाकी शिखा बनाकर दाहिने कानपर तबतक रखे, जबतक बाँधनेयोग्य शिखा न बढ़ जाय।’

यदि सत्तर वर्षकी अवस्थाके बाद (वृद्धावस्थामें) बाल झड़ जानेके कारण शिखा न रहे तो यथासम्भव चारों ओर बचे हुए बालोंसे शिखा बनाकर नित्यकर्म करता रहे। यदि बाल बिलकुल न हों तो कुशा आदिकी शिखा रखकर नित्यकर्म करे, पर शिखा शून्य कभी न रहे—

सप्तत्यूर्ध्वं तु चेत्तस्या: पूर्वत: पृष्ठतोऽपि वा।

पार्श्वत: परितो वापि समुद्भूतैश्च रोमभि:॥

शिखा कार्या प्रयत्नेन न चेन्नैवोपपद्यते।

तत्स्थाने सर्वशून्ये तु परितो वापि किं पुन:॥

ब्राह्मण्यसूचनायैवं तानि लोमानि धारयेत्।

अन्यथा न भवेदेव तथा तस्मात्समाचरेत्॥

(आंगिरसस्मृति ६१—६३)

‘अखिल भारतीय पण्डित महापरिषद्’ (वाराणसी)- ने शिखा रखनेके निम्न लाभ बताये हैं—

१- शिखा रखने तथा उसके नियमोंका यथावत् पालन करनेसे मनुष्यको सद्‍बुद्धि, सद्विचार आदिकी प्राप्ति होती है।

२- शिखा रखनेसे आत्मशक्ति प्रबल बनी रहती है।

३- शिखा रखनेसे मनुष्य धार्मिक, सात्त्विक और संयमी बनता है।

४- शिखा रखनेसे मनुष्य लौकिक तथा पारलौकिक समस्त कार्योंमें सफलता प्राप्त करता है।

५- शिखा रखनेसे मनुष्य प्राणायाम, अष्टांगयोग आदि यौगिक क्रियाओंको ठीक-ठीक कर सकता है।

६- शिखा रखनेसे सभी देवता मनुष्यकी रक्षा करते हैं।

७- शिखा रखनेसे मनुष्यकी नेत्रज्योति सुरक्षित रहती है।

८- शिखा रखनेसे मनुष्य स्वस्थ, बलिष्ठ, तेजस्वी और दीर्घायु होता है।

प्रश्न—चोटी रखनेसे शर्म आती है, वह कैसे छूटे?

उत्तर—आश्चर्यकी बात है कि व्यापार आदिमें बेईमानी, झूठ-कपट करनेमें शर्म नहीं आती, गर्भपात आदि पाप करनेमें शर्म नहीं आती, चोरी, विश्वासघात आदि करते समय शर्म नहीं आती, पर चोटी रखनेमें शर्म आती है! आपकी शर्म ठीक है या भगवान् और सन्तोंकी बात मानना, उनको प्रसन्न करना ठीक है? आप चोटी रखो तो आरम्भमें शर्म आयेगी, पर पीछे सब ठीक हो जायगा।

प्रश्न—चोटी देखकर लोग हँसी उड़ाते हैं, कैसे बचें?

उत्तर—लोग हँसी उड़ायें, पागल कहें तो उसको सह लो, पर धर्मका त्याग मत करो। आपका धर्म आपके साथ चलेगा, हँसी-दिल्लगी आपके साथ नहीं चलेगी। लोगोंकी हँसीसे आप डरो मत। लोग पहले हँसी उड़ायेंगे, पर बादमें आदर करने लगेंगे कि यह अपने धर्मका पक्का आदमी है। एक शंकरानन्द नामके हमारे प्रेमी सज्जन थे। वे बहुत पढ़े-लिखे थे। उन्होंने मेरेको बताया कि मैं पढ़नेके लिये जर्मनी गया। वहाँ मैं धोती पहना करता था। मेरी वेश-भूषा देखकर पहले तो वहाँके लोगोंने मेरी हँसी उड़ायी, पर बादमें सब मेरा विशेष आदर करने लग गये कि यह ईमानदार आदमी है, सच्चा धर्मात्मा आदमी है। इसलिये अपने धर्मका पालन निधड़क होकर करो, इसमें डर किस बातका?

एक कहानी है। एक आदमीकी किसी कारणसे नाक कट गयी। उसके साथीने पूछा तो वह बोला कि दोनों आँखोंके बीचमें नाक आड़े आती है, इसलिये ब्रह्मके दर्शन नहीं होते। अगर बीचमें नाक न रहे तो दोनों आँखोंकी दृष्टि मिलनेसे साक्षात् ब्रह्मके दर्शन होते हैं! ऐसा सुनकर उसके साथीने भी अपनी नाक कटवा ली। जब उसको ब्रह्मके दर्शन नहीं हुए तो उसने साथीसे कहा कि नाक कटवानेसे मेरेको तो दर्शन नहीं हुए? वह साथी बोला—‘चुप रह, हल्ला मत कर! तेरेसे कोई पूछे तो यही कहना कि मेरेको ब्रह्मके दर्शन होते हैं।’ धीरे-धीरे यह बात फैलती गयी। दूसरोंके कहनेसे, एक-दूसरेको देखकर नाक तो सबने कटवा ली, पर ब्रह्मके दर्शन किसीको नहीं हुए। एक पूरा समुदाय कटी नाकका हो गया! अब कोई नाकवाला आदमी उनके बीच आता तो वे सब मिलकर उसकी हँसी उड़ाते कि देखो, नक्कू आ गया! नक्कू आ गया!! इसी तरह चोटीकटिया लोग आज चोटीवालेकी हँसी उड़ाते हैं। अत: उनकी हँसीकी परवाह न करके अपने धर्मका पालन करना चाहिये।

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्

धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतो:।

नित्यो धर्म: सुखदु:खे त्वनित्ये

जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्य:॥

(महाभारत, स्वर्गा० ५। ६३)

‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दु:ख अनित्य हैं। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु (राग) अनित्य है।’