इस लेखकी सार बात

धन से अधिक वस्तुओंका महत्त्व है, वस्तुओंसे अधिक मनुष्यका महत्त्व है, मनुष्यसे अधिक विवेकका महत्त्व है, विवेकसे अधिक परमात्मतत्त्वका महत्त्व है। उस परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें ही मनुष्यजन्मकी सफलता है।