मातृशक्तिके प्रति

वर्तमानमें नारी-जातिका महान् तिरस्कार, घोर अपमान किया जा रहा है। नारीके महान् मातृरूपको नष्ट करके उसको मात्र भोग्या स्त्रीका रूप दिया जा रहा है। भोग्या स्त्री तो वेश्या होती है। जितना आदर माता (मातृशक्ति)-का है, उतना आदर स्त्री (भोग्या)-का नहीं है। परन्तु जो स्त्रीको केवल भोग्या मानते हैं, स्त्रीके गुलाम हैं, वे इस बातको क्या समझें? समझ ही नहीं सकते। विवाह माता बननेके लिये किया जाता है, भोग्या बननेके लिये नहीं। सन्तान पैदा करनेके लिये ही पिता कन्यादान करता है और सन्तान पैदा करने (वंशवृद्धि)-के लिये ही वरपक्ष कन्यादान स्वीकार करता है। परन्तु आज नारीको माँ बननेसे रोका जा रहा है और उसको केवल भोग्या बनाया जा रहा है। यह नारी-जातिका कितना महान् तिरस्कार है!

नारी वास्तवमें मातृशक्ति है। वह स्त्री और पुरुष दोनोंकी जननी(माँ) बनती है, पर पत्नी केवल पुरुषकी ही बनती है। पुरुष अच्छा होता है तो उसकी केवल अपने ही कुलमें महिमा होती है, पर स्त्री अच्छी होती है तो उसकी पीहर और ससुराल—दोनों कुलोंमें महिमा होती है। राजा जनकजी सीताजीसे कहते हैं— ‘पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ’ (मानस, अयोध्या २८७।१)।

हमारे शास्त्रोंमें नारी-जातिको बहुत आदर दिया गया है। स्त्रीकी रक्षा करनेके उद्देश्यसे शास्त्रने उसको पिता, पति अथवा पुत्रके आश्रित रहनेकी आज्ञा दी है, जिससे वह जगह-जगह ठोकरें न खाती फिरे*। स्त्री नौकरी करे तो यह उसका तिरस्कार है। उसकी महिमा तो घरमें रहनेसे ही है। घरमें वह महारानी है, पर घरसे बाहर वह नौकरानी है। घरमें तो वह एक पुरुषके अधीन रहेगी, पर बाहर उसको अनेक स्त्री-पुरुषोंके अधीन रहना पड़ेगा, अपनेसे ऊँचे पदवाले अफसरोंकी अधीनता, फटकार, तिरस्कार सहन करना पड़ेगा, जो कि उसके कोमल हृदय, स्वभावके विरुद्ध है। वह आदरके योग्य है, तिरस्कारके योग्य नहीं। पिता, पति अथवा पुत्रकी अधीनता वास्तवमें स्त्रीको पराधीन बनानेके लिये नहीं है, प्रत्युत महान् स्वाधीन बनानेके लिये है। घरमें बूढ़ी ‘माँ’ का सबसे अधिक आदर होता है, बेटे-पोते आदि सब उसका आदर करते हैं, पर घरसे बाहर बूढ़ी ‘स्त्री’ का सब जगह तिरस्कार होता है।

आजकल स्त्रियोंको पुरुषके समान अधिकार देनेकी बात कही जाती है, पर शास्त्रोंने माताके रूपमें स्त्रीको पुरुषकी अपेक्षा भी विशेष अधिकार दिया है—

सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते॥

(मनु०२।१४५)

‘माताका दर्जा पितासे हजार गुना अधिक माना गया है।’

सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नत:॥

(स्कन्द, काशी ११। ५०)

‘सबके द्वारा वन्दनीय संन्यासीको भी माताकी प्रयत्नपूर्वक वन्दना करनी चाहिये।’

वर्तमानमें गर्भ-परीक्षण किया जाता है और गर्भमें कन्या हो तो गर्भ गिरा दिया जाता है, क्या यह स्त्रीको समान अधिकार दिया जा रहा है?

‘माँ’ शब्द कहनेसे जो भाव पैदा होता है, वैसा भाव ‘स्त्री’ कहनेसे नहीं पैदा होता। इसलिये श्रीशंकराचार्यजी महाराज भगवान् श्रीकृष्णको भी ‘माँ’ कहकर पुकारते हैं—‘मात: कृष्णाभिधाने’ (प्रबोध० २४४)। उपनिषदोंमें ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ कहकर सबसे पहले माँकी सेवा करनेकी आज्ञा दी गयी है। ‘वन्दे मातरम्’ में भी माँकी ही वन्दना की गयी है। हिन्दूधर्ममें मातृशक्तिकी उपासनाका विशेष महत्त्व है। ईश्वरकोटिके पाँच देवताओंमें भी मातृशक्ति (भगवती)-का स्थान है। देवीभागवत, दुर्गासप्तशती आदि अनेक ग्रन्थ मातृशक्तिपर ही रचे गये हैं। जगत् की सम्पूर्ण स्त्रियोंको मातृशक्तिका ही रूप माना गया है—

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा:

स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।

(दुर्गासप्तशती ११। ६)

परन्तु भोगीलोग मातृशक्तिको क्या समझें? समझ ही नहीं सकते। वे तो उसको भोग्या ही समझते हैं।

पुरुष स्त्रीका तिरस्कार करे, उसको दु:ख दे, उसको तलाक दे, उसको मारे-पीटे—ऐसा शास्त्रोंमें कहीं नहीं कहा गया है। इतना ही नहीं, स्त्रीसे कोई बड़ा अपराध भी हो जाय तो भी उसको मारने-पीटनेका विधान नहीं है, प्रत्युत वह क्षम्य है। भीष्मजी कौरव-सेनाकी रक्षा करनेवाले थे—‘अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्’ (गीता १। १०); परन्तु दुर्योधन उनकी भी रक्षा करनेके लिये अपनी सेनाको आदेश देता है—‘भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्त: सर्व एव हि’ (गीता१। ११)। कारण कि दुर्योधन जानता था कि शिखण्डीके सामने आनेपर भीष्मजी उसपर कभी शस्त्र नहीं चलायेंगे, भले ही अपने प्राण चले जायँ! शिखण्डी पहले स्त्री था, वर्तमानमें नहीं; परन्तु वर्तमानमें पुरुषरूपसे होनेपर भी भीष्मजी उसको स्त्री ही मानते हैं और उसपर शस्त्र नहीं चलाते, प्रत्युत उसीके द्वारा मारे जाते हैं—यह स्त्री-जातिका कितना सम्मान है!

शास्त्रोंके अनुसार पत्नी पतिके द्वारा किये गये पुण्य-कर्मोंकी भागीदार तो होती है, पर पाप-कर्मोंकी भागीदार नहीं होती। उसको मुफ्तमें आधा पुण्य मिलता है। समाजमें भी देखा जाता है कि अगर डॉक्टर, पण्डित आदिकी पत्नी अनपढ़ हो तो भी वह डॉक्टरनी, पण्डितानी आदि कहलाती है! वास्तवमें आज अभिमानको मुख्यता दी जा रही है, इसलिये नम्रता बढ़ानेकी बात न कहकर अभिमान बढ़ानेकी बात ही कही और सिखायी जा रही है, जो कि पतनका हेतु है। ‘पुरुष ऐसा करते हैं तो हम क्यों न करें? हम पीछे क्यों रहें?’—यह केवल अभिमान बढ़ानेकी बात है। अभिमान जन्म-मरणका मूल और अनेक प्रकारके क्लेशों तथा समस्त शोकोंको देनेवाला है—

संसृत मूल सूलप्रद नाना।

सकल सोक दायक अभिमाना॥

(मानस, उत्तर० ७४। ३)

अभिमानी व्यक्ति लौकिक मर्यादाको भी नहीं समझ सकता, फिर वह शास्त्रोंकी बातोंको क्या समझेगा? समझ ही नहीं सकता।

संसारके हितके लिये मातृशक्तिने बहुत काम किया है। रक्तबीज आदि राक्षसोंका संहार भी मातृशक्ति ने ही किया है। मातृशक्तिने ही हमारी हिन्दू-संस्कृतिकी रक्षा की है। आज भी प्रत्यक्ष देखनेमें आता है कि हमारे व्रत-त्योहार, रीति-रिवाज, माता-पिताके श्राद्ध आदिकी जानकारी जितनी स्त्रियोंको रहती है, उतनी पुरुषोंको नहीं रहती। पुरुष अपने कुलकी बात भी भूल जाते हैं, पर स्त्रियाँ दूसरे कुलकी होनेपर भी उनको बताती हैं कि अमुक दिन आपकी माता या पिताका श्राद्ध है आदि। मन्दिरोंमें, कथा-कीर्तनमें, सत्संगमें जितनी स्त्रियाँ जाती हैं, उतने पुरुष नहीं जाते। कार्तिक-स्नान, व्रत, दान, पूजन, रामायण आदिका पाठ जितना स्त्रियाँ करती हैं, उतना पुरुष नहीं करते। तात्पर्य है कि स्त्रियाँ हमारी संस्कृतिकी रक्षा करनेवाली हैं। अगर उनका चरित्र नष्ट हो जायगा तो संस्कृतिकी रक्षा कैसे होगी?

वर्तमानमें सन्तति-निरोधके कृत्रिम उपायोंके प्रचार-प्रसारसे स्त्रियोंमें लज्जा, शील, सतीत्व, सच्चरित्रता, नीरोगता, सदाचरण आदिका नाश हो रहा है। परिणामस्वरूप स्त्री-जाति केवल भोग्य वस्तु बनती जा रही है। यदि स्त्री-जातिका चरित्र भ्रष्ट हो जायगा तो देशकी क्या दशा होगी? आगे आनेवाली पीढ़ी अपने प्रथम गुरु माँसे क्या शिक्षा लेगी? स्त्री बिगड़ेगी तो उससे पैदा होनेवाले बेटी-बेटा(स्त्री-पुरुष)दोनों बिगड़ेंगे। अगर स्त्री ठीक रहेगी तो पुरुषके बिगड़नेपर भी सन्तान नहीं बिगड़ेगी। अत: स्त्रियोंके चरित्र,शील, लज्जा आदिकी रक्षा करना और उनको अपमानित, तिरस्कृत न होने देना, प्रत्युत उनका आदर-सत्कार करना मनुष्यमात्रका कर्तव्य है। मनुस्मृतिमें आया है—

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:॥

(३। ५६)

‘जहाँ स्त्रियोंका आदर किया जाता है, वहाँ देवता रमण करते हैं और जहाँ इनका अनादर होता है, वहाँ सब कार्य निष्फल हो जाते हैं।’