सन्तोंके प्रति

जैसे परिवारमें जो मुख्य व्यक्ति होते हैं, उनपर परिवारकी विशेष जिम्मेवारी होती है, ऐसे ही समाजमें जो व्यक्ति मुख्य माने जाते हैं, जिनको समाज आदरकी दृष्टिसे देखता है, उनको अच्छा मानता है, उनपर समाजकी विशेष जिम्मेवारी होती है। अपने-अपने स्थान या क्षेत्रमें जो व्यक्ति मुख्य कहलाते हैं, उन साधु, ब्राह्मण, व्याख्यानदाता, नेता, शासक, अध्यापक, आचार्य, महन्त, कथावाचक आदिको अपने आचरणोंमें विशेष सावधानी रखनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है, जिससे दूसरोंपर उनका अच्छा प्रभाव पड़े। कारण कि मुख्य व्यक्तिकी ओर सबकी दृष्टि रहती है। रेलगाड़ीके चालकके समान मुख्य व्यक्तिपर विशेष जिम्मेवारी रहती है। रेलगाड़ीमें बैठे अन्य व्यक्ति सोये भी रह सकते हैं, पर चालकको सदा जाग्रत् रहना पड़ता है। उसकी थोड़ी भी असावधानीसे दुर्घटना हो जानेकी सम्भावना रहती है। गीतामें भगवान् कहते हैं—

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(३।२१)

‘श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं और वह जो कुछ कहता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार करते हैं।’

उपर्युक्त श्लोकमें श्रेष्ठ मनुष्यके आचरणके विषयमें तो ‘यत्-यत्’, ‘तत्-तत्’ और ‘एव’—ये पाँच पद आये हैं, पर वचनके विषयमें ‘यत्’ और ‘तत्’—ये दो ही पद आये हैं। इसका तात्पर्य यह है कि मनुष्यके आचरणोंका असर दूसरोंपर पाँच गुना (अधिक) पड़ता है और वचनोंका असर दो गुना (अपेक्षाकृत कम) पड़ता है। जो मनुष्य स्वयं अपने कर्तव्यका पालन न करके केवल अपने वचनोंसे दूसरोंको कर्तव्य-पालनकी शिक्षा देता है, उसकी शिक्षाका समाजपर विशेष असर नहीं पड़ता। समाजपर शिक्षाका विशेष असर तभी पड़ता है, जब शिक्षा देनेवाला स्वयं भी नि:स्वार्थभावसे अपने कर्तव्यका पालन करे।

वास्तवमें बड़ा वह है, जिसमें बड़प्पनका अभिमान नहीं है। कोई बड़ा होता है तो वह नम्रताके कारण बड़ा होता है। बड़प्पन दूसरोंको देनेकी चीज है, लेनेकी नहीं है। सबकी सेवा करना, सुख पहुँचाना, परिश्रम करना—यह अपने लेनेकी चीज है और मान-बड़ाई, आदर-सत्कार दूसरोंको देनेकी चीज है। शास्त्रोंमें माता-बहनोंके लिये लिखा है कि तुम पतिको परमेश्वर मानो, पर पुरुषोंके लिये नहीं लिखा है कि तुम अपनेको परमेश्वर मानो, नहीं तो सभी विवाहित पुरुष परमेश्वर हो जायँगे और कुँआरे बेचारे बाकी रह जायँगे! अत: अपनेसे जो छोटे हैं, उनका निरादर न करके प्यार करना चाहिये।

गीता आदि ग्रन्थोंको पढ़नेसे और सन्तोंकी बातें सुननेसे मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि संसारमें कोई कितना ही नीच प्राणी क्यों न हो, उसका भी उद्धार हो सकता है, उसको भी भगवान् मिल सकते हैं, वह भी जीवन्मुक्त हो सकता है, उसको भी तत्त्वज्ञान हो सकता है। जो अपनेको नीचा मानता है, उसको जितनी जल्दी और सुगमतासे परमात्मप्राप्ति हो सकती है, उतनी जल्दी और सुगमतासे अपनेको बड़ा माननेवालेको नहीं हो सकती। कारण कि बड़प्पनका अभिमान आसुरी सम्पत्ति है, जो पतन करनेवाली है।

छोटे छोटे तर गये, राम भजन लवलीन।

जातिके अभिमानसे, डूबे सभी कुलीन॥

इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं उच्च वर्णकी निन्दा करता हूँ। उच्च वर्णको मैं ऊँचा ही मानता हूँ। परन्तु वे ऊँचे तभी होंगे, जब ऊँचा कार्य करेंगे। अभिमानमें आकर नीचा कार्य करेंगे तो ऊँचापन कबतक टिकेगा? जो ऊँचा कार्य करता है, वह अपने-आपको भले ही नीचा माने, पर दुनिया उसको बड़ा मानने लग जायगी; क्योंकि वास्तवमें वह बड़ा है। जैसे, भगवान् विष्णुका निवास चरणोंमें है, इसीलिये बड़ोंके चरण छूकर प्रणाम करते हैं। चरणोंमें निवास होनेपर भी वे सबसे बड़े माने जाते हैं; क्योंकि वे प्राणिमात्रका पालन-पोषण करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण क्षत्रियोंकी सेनाके बीचमें अर्जुनके रथके घोड़े हाँकते हैं। उनको घोड़ोंका कोचवान बनते लज्जा नहीं आयी। परन्तु जब कौरवसेनाके सेनापति भीष्मजी शंख बजाते हैं, तब पाण्डवसेनामें सबसे पहले भगवान् श्रीकृष्ण शंख बजाते हैं। तात्पर्य है कि जो वास्तवमें बड़ा होता है, उसको यह वहम नहीं होता कि छोटी जगह बैठनेसे मैं छोटा हो जाऊँगा। यह वहम उन्हींको होता है, जो वास्तवमें छोटे होते हैं, पर बड़ा बनना चाहते हैं। उन्हींको यह भय लगता है कि छोटी जगह बैठनेसे अथवा छोटा काम करनेसे कोई हमें छोटा न मान ले! अगर वे वास्तवमें बड़े हैं तो भय किस बातका?

अत: समाजमें बड़े कहलानेवाले व्यक्तियोंका कर्तव्य है कि वे स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करें। व्यक्तिके सुधारसे ही समाजका सुधार होगा—ऐसा मेरा विश्वास है। वास्तवमें व्यक्तिका सुधार राग-रहित होनेमें है। वीतराग पुरुषके द्वारा समाजका जितना सुधार होता है, उतना दूसरे किसी व्यक्तिके द्वारा हो ही नहीं सकता। अत: जिस समाजमें वीतराग पुरुष होते हैं, वह समाज सबसे श्रेष्ठ होता है।