युवकोंके प्रति

बड़े दु:खकी बात है कि आजका युवक-समाज प्राय: अनुशासनहीन होता चला जा रहा है! गीतामें आया है—

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा:।

न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥

(१६। ७)

‘आसुरी स्वभाववाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति (कर्तव्य और अकर्तव्य)-को नहीं जानते और उनमें न बाह्य शुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है।’

गीताकी यह बात आजकलके नवयुवकोंमें प्रत्यक्ष देखनेमें आ रही है। आरम्भमें ही अच्छी शिक्षा न मिलनेसे वे क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये; शरीरकी शुद्धि क्या होती है और अशुद्धि क्या होती है; खान-पान क्या शुद्ध होता है और क्या अशुद्ध होता है; बड़ों और छोटोंके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये और कैसा नहीं करना चाहिये; वाणी आदिका सत्य क्या होता है और असत्य क्या होता है—इन सब बातोंको नहीं जानते। इस कारण वे सत्य-तत्त्व परमात्मासे विमुख हो जाते हैं। परमात्मासे विमुख होनेके कारण वे न धर्मको मानते हैं और न उसकी मर्यादाको मानते हैं। अविवेकके कारण उनमें आरम्भसे ही बड़प्पनका अभिमान भर जाता है कि मैं पढ़-लिख गया, समझदार हो गया, बड़ा हो गया। इस भावके कारण उनका विकास रुक जाता है। इसलिये युवकोंको कभी ऐसा नहीं मानना चाहिये कि अब मैं समझदार हो गया, पढ़-लिख गया, पूर्ण हो गया, प्रत्युत अपने शरीरको पुष्ट करनेकी तरह विद्याको भी आजीवन उत्तरोत्तर पुष्ट करते रहना चाहिये। मुझे तो जीवनभर विद्यार्थी बने रहना ही अच्छा लगता है।

मनुष्य-जीवन वास्तवमें विद्यार्थी-जीवन ही है। पशु, पक्षी, यक्ष, राक्षस, देवता आदि जितनी योनियाँ हैं, वे सब भोगयोनियाँ हैं। परन्तु मनुष्ययोनि केवल ब्रह्मविद्या प्राप्त करके मुक्त होनेके लिये है, भोग भोगनेके लिये नहीं।

विद्यार्थी किसे कहते हैं?

जो केवल विद्याध्ययन करना चाहता है, उसको विद्यार्थी कहते हैं। ‘विद्यार्थी’ शब्दका अर्थ है—विद्याका अर्थी अर्थात् केवल विद्या चाहनेवाला। कौन-सी विद्या? विद्याओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या—‘अध्यात्मविद्या विद्यानाम्’(गीता१०।३२)

विद्याका वास्तविक स्वरूप क्या है ?

कुछ भी जानना विद्या है। अनेक शास्त्रोंका, कला-कौशलोंका, भाषाओं आदिका ज्ञान विद्या है। वास्तवमें विद्या वही है, जिससे जानना बाकी न रहे, जीवकी मुक्ति हो जाय—‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विष्णुपुराण १।१९।४१)। अगर जानना बाकी रह गया तो वह विद्या क्या हुई!

एक शब्दब्रह्म (वेद) है और एक परब्रह्म (परमात्मतत्त्व) है। अगर शब्दब्रह्मको जान लिया, पर परब्रह्मको नहीं जाना तो केवल परिश्रम ही हुआ—

शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात् परे यदि।

श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्यधेनुमिव रक्षत:॥

(श्रीमद्भा ११। ११। १८)

अत: परमात्मतत्त्वको जानना ही मुख्य विद्या है और इसीमें मनुष्य-जीवनकी सफलता है।

जिससे जीविकाका उपार्जन हो, नौकरी मिले, वह भी विद्या है, पर वह विद्या परमात्मप्राप्तिमें सहायक नहीं होती, प्रत्युत कहीं-कहीं उस विद्याका अभिमान होनेसे वह विद्या परमात्मप्राप्तिमें बाधक हो जाती है। विद्याके अभिमानीको कोई ब्रह्मनिष्ठ महात्मा मिल जाय तो वह तर्क करके उनकी बातको काट देगा, उनको चुप करा देगा, जिससे वह वास्तविक लाभसे वंचित रह जायगा। अत: कहा गया है—

षङ्गादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या

कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।

यशोदाकिशोरे मनो वै न लग्नं

तत: किं तत: किं तत: किं तत: किम्॥

‘छहों अंगोंसहित वेद और शास्त्रोंको पढ़ा हो,सुन्दर गद्य और पद्यमय काव्य-रचना करता हो, पर यशोदानन्दनमें मन नहीं लगा तो उन सभीसे क्या लाभ है?’

विद्या ग्रहण करनेकी क्या आवश्यकता है?

विद्याके बिना मनुष्यजन्म सार्थक नहीं होगा, प्रत्युत मनुष्यजन्म और पशुजन्म एक समान ही होंगे। अत: विद्याकी अत्यन्त आवश्यकता है। वास्तवमें ब्रह्मविद्या ही विद्या है। कारण कि ब्रह्मविद्याके प्राप्त होनेपर कुछ भी प्राप्त करना बाकी नहीं रहता। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि अन्य (लौकिक) विद्याएँ नहीं पढ़नी चाहिये। अन्य विद्याएँ भी पढ़नी चाहिये। अन्य भाषाओं, लिपियों आदिका ज्ञान-सम्पादन करना आवश्यक है, उचित है, पर उनमें ही लिप्त रहना उचित नहीं है; क्योंकि उनमें ही लिप्त रहनेसे मनुष्यजन्म निरर्थक चला जायगा। दूसरी बात, लौकिक विद्याओंको पढ़नेसे ‘मैं पढ़ा-लिखा हूँ’—ऐसा एक अभिमान पैदा हो जायगा, जिससे बन्धन और दृढ़ हो जायगा।

शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा

यस्तु क्रियावान्पुरुष: स विद्वान्।

‘शास्त्रोंको पढ़कर भी लोग मूर्ख बने रहते हैं। वास्तवमें विद्वान् वही है, जो शास्त्रके अनुकूल आचरण करता है।’

मनुष्यजन्मका उद्देश्य है—परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करना, और उसका साधन है—संसारकी सेवा। अत: लौकिक विद्या, धन, पद आदिका उपयोग संसारकी सेवामें ही है। ये संसारकी सेवामें ही काम आ सकते हैं, परमात्मप्राप्तिमें नहीं; क्योंकि परमात्मप्राप्ति लौकिक विद्याके अधीन नहीं है। हाँ, नि:स्वार्थभावसे संसारकी सेवा करनेपर लौकिक विद्या परमात्मप्राप्तिमें सहायक हो सकती है। जिसके पास लौकिक विद्या आदि है, उसीपर संसारकी सेवा करनेकी जिम्मेवारी है। मालपर ही जकात लगती है और इन्कमपर ही टैक्स लगता है। माल नहीं हो तो जकात किस बातकी? इन्कम नहीं हो तो टैक्स किस बातका?

लौकिक विद्या, धन, पद आदिको लेकर संसारमें मनुष्यकी जो प्रशंसा होती है, वह एक तरहसे मनुष्यकी निन्दा ही है। तात्पर्य है कि महिमा तो लौकिक विद्या आदिकी ही हुई, खुदकी तो निन्दा ही हुई! अत: जो लौकिक विद्या आदिसे अपनेको बड़ा मानता है, वह वास्तवमें अपनेको छोटा ही बनाता है।

प्राचीन और आधुनिक विद्यामें क्या अन्तर है?

प्राचीन (आध्यात्मिक) विद्या अपनेको और दूसरोंको शान्ति देनेवाली है। उससे अशान्ति, कलह, अभाव आदि मिट जाते हैं। परन्तु आजकलकी (लौकिक) विद्या केवल बाहर काम आनेवाली है, अपनेको और दूसरोंको शान्ति देनेवाली नहीं है। इससे अशान्ति, आपसका कलह बढ़ता है। जैसे धन आनेसे तृष्णा, धनका अभाव अधिक बढ़ता है, ऐसे ही आधुनिक विद्या सीखनेसे अभाव बढ़ता है।

आजकल तरह-तरहके आविष्कार होनेपर भी शान्ति नहीं मिल रही है; क्योंकि उनमें परवशता है, स्वतन्त्रता नहीं है अर्थात् मनुष्यको उनके परवश होना पड़ता है। परन्तु प्राचीन विद्यासे मनुष्यको परवश नहीं होना पड़ता और उसको स्वयंका बोध हो जाता है।

प्राचीन विद्या मनुष्यको परमात्माके सम्मुख कराती है और आधुनिक विद्या मनुष्यको नाशवान् के सम्मुख कराती है, नाशवान् को महत्त्व देती है।

आधुनिक विद्या व्यवहारमें काम आती है; अत: इसको व्यवहारकी जगह ही महत्त्व देना चाहिये। इसको सर्वोपरि महत्त्व देना ही गलती है। वास्तवमें विद्या वही है, जो मनुष्यका कल्याण कर दे—‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विष्णुपुराण १। १९। ४१)।

मनुष्यको उन्नत करनेवाली बातें

ये सात बातें मनुष्यको उन्नत करनेवाली हैं—

उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं

क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।

शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च

सिद्धि: स्वयं याति निवासहेतो:॥

‘उत्साही, अदीर्घसूत्री (आलस्यरहित), क्रियाकी विधिको जाननेवाले, व्यसनोंसे दूर रहनेवाले, शूर, कृतज्ञ तथा स्थिर मित्रतावाले मनुष्यको सिद्धि स्वयं अपने निवासके लिये ढूँढ़ लेती है।’

इन सात बातोंका विस्तार इस प्रकार है—

(१) विद्यार्थीमें यह उत्साह होना चाहिये कि मैं विद्याको पढ़ सकता हूँ; क्योंकि उत्साही आदमीके लिये कठिन काम भी सुगम हो जाता है और अनुत्साही आदमीके लिये सुगम काम भी कठिन हो जाता है।

(२) हरेक कामको बड़ी तत्परता और सावधानीके साथ करना चाहिये। थोड़े समयमें होनेवाले काममें अधिक समय नहीं लगाना चाहिये। जो थोड़े समयमें होनेवाले काममें अधिक समय लगाता है, उसका पतन हो जाता है—‘दीर्घसूत्री विनश्यति’।

(३) कार्य करनेकी विधिको ठीक तरहसे जानना चाहिये। कौन-सा कार्य किस विधिसे करना चाहिये, इसको जानना चाहिये। शौच-स्नान, खाना-पीना, उठना-बैठना, पाठ-पूजा आदि कार्योंकी विधिको ठीक तरहसे जानना चाहिये और वैसा ही करना चाहिये।

(४) व्यसनोंमें आसक्त नहीं होना चाहिये। जूआ खेलना, मदिरापान, मांसभक्षण, वेश्यागमन, शिकार (हत्या) करना, चोरी करना और परस्त्रीगमन—ये सात व्यसन तो घोरातिघोर नरकोंमें ले जानेवाले हैं*। इसके सिवाय चाय, काफी, अफीम, पान-मसाला, बीड़ी-सिगरेट आदि पीना, और ताश-चौपड़, खेल-तमाशा, सिनेमा-वीडियो देखना,वृथा बकवाद, वृथा चिन्तन आदि जो भी पारमार्थिक उन्नतिमें और न्याययुक्त धन आदि कमानेमें बाधक हैं, वे सब-के-सब व्यसन हैं। विद्यार्थीको किसी भी व्यसनके वशीभूत नहीं होना चाहिये।

(५) प्रत्येक काम करनेमें शूरवीरता होनी चाहिये। अपनेमें कभी वृथा भय, कायरता नहीं लानी चाहिये।

(६) जिससे उपकार पाया है, उसका मनमें सदा एहसान मानना चाहिये, उसका आदर-सत्कार करना चाहिये, कभी कृतघ्न नहीं बनना चाहिये।

(७) धर्म तथा मर्यादाके अनुकूल जिस उत्तम व्यक्तिके साथ मित्रता करे, उसको हर हालतमें निभाना चाहिये।

जैसे मुसाफिर स्वयं धर्मशालाको ढूँढ़कर उसके पास आते हैं, ऐसे ही उपर्युक्त सात गुणोंवाले व्यक्तिको ढूँढ़कर सिद्धि स्वयं उसके पास आती है।