अजामिल-प्रसंग एवं नामकी महिमा

अजामिल जातिका ब्राह्मण था; परन्तु एक शूद्र-जातीय कुलटा स्त्रीमें आसक्त होकर उसीके साथ रहने लगा। उसने अपने छोटे पुत्रका नाम ‘नारायण’ रखा था। मृत्युके समय यमदूतोंके भयसे उसने अपने पुत्रको ही पुकारा। परन्तु किसी भी निमित्तसे यदि भगवान‍्का नाम अन्त समयमें मुँहसे निकल जाय तो भगवान् उसका कल्याण अवश्य करते हैं; इस विरदका निर्वाह करनेके लिये भगवान‍्ने ‘नारायण’ नामका उच्चारण होते ही अपने दूत उसके पास भेज दिये और उन्होंने यमदूतोंके हाथसे उसको बचा लिया। यह भगवान‍्की नासमझी नहीं है, उदारता तथा अकारण करुणा करनेका स्वभाव है।

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इस प्रसंगमें ‘नाम-व्याहरण’ का अर्थ नामोच्चारणमात्र ही है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—

यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्।

ऋणमेतद् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति॥

‘मेरे दूर होनेके कारण द्रौपदीजीने जोर-जोरसे ‘गोविन्द-गोविन्द’ इस प्रकार करुण क्रन्दन करके मुझे पुकारा। वह ऋण मेरे ऊपर बढ़ गया है और मेरे हृदयसे उसका भार क्षणभरके लिये भी नहीं हटता।’

‘नामपदै:’ कहनेका यह अभिप्राय है कि भगवान‍्का केवल नाम ‘राम-राम’, ‘कृष्ण-कृष्ण’, ‘हरि-हरि’, ‘नारायण-नारायण’ अन्त:करणकी शुद्धिके लिये—पापोंकी निवृत्तिके लिये पर्याप्त है। ‘नम:, नमामि’ इत्यादि क्रिया जोड़नेकी भी कोई आवश्यकता नहीं है। नामके साथ बहुवचनका प्रयोग—भगवान‍्के नाम बहुत-से हैं, किसीका भी संकीर्तन कर लें इस अभिप्रायसे है। एक व्यक्ति सब नामोंका उच्चारण करे, इस अभिप्रायसे नहीं, क्योंकि भगवान‍्के नाम अनन्त हैं, सब नामोंका उच्चारण सम्भव ही नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान‍्के एक नामका उच्चारण करनेमात्रसे सब पापोंकी निवृत्ति हो जाती है। पूर्ण विश्वास न होने तथा नामोच्चारणके पश्चात् भी पाप करनेके कारण ही उसका अनुभव नहीं होता।

पापकी निवृत्तिके लिये भगवन्नामका एक अंश ही पर्याप्त है, जैसे ‘राम’ का ‘रा’ इसने तो सम्पूर्ण नामका उच्चारण कर लिया। मरते समयका अर्थ ठीक मरनेका क्षण ही नहीं है; क्योंकि मरनेके क्षण जैसे कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि करनेके लिये विधि नहीं हो सकती, वैसे नामोच्चारणकी भी नहीं है। इसलिये ‘म्रियमाण’ शब्दका यह अभिप्राय है कि अब आगे इससे कोई पाप होनेकी सम्भावना नहीं है।

वस्तुकी स्वाभाविक शक्ति इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करती कि यह मुझपर श्रद्धा रखता है कि नहीं, जैसे अग्नि या अमृत।

हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृत:।

अनिच्छयापि संस्पृष्टो दहत्येव हि पावक:॥

‘दुष्टचित्त मनुष्यके द्वारा स्मरण किये जानेपर भी भगवान् श्रीहरि पापोंको हर लेते हैं। अनजानेमें या अनिच्छासे स्पर्श करनेपर भी अग्नि जलाती ही है।’

भगवान‍्के नामका उच्चारण केवल पापोंको ही निवृत्त करता है, इसका और कोई फल नहीं है, यह धारणा भ्रमपूर्ण है, क्योंकि कहा है—

‘भगवन्नाम मोक्षका भी साधन है। मोक्षके साथ-ही-साथ यह धर्म, अर्थ और कामका भी साधन है’ क्योंकि ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं; जिनमें त्रिवर्ग-सिद्धिका भी नाम ही कारण बतलाया गया है—

न गंगा न गया सेतुर्न काशी न च पुष्करम्।

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथर्वण:।

अधीतास्तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

अश्वमेधादिभिर्यज्ञैर्नरमेधै: सदक्षिणै:।

यजितं तेन येनोक्तं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्।

दु:खक्लेशपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

‘जिसकी जिह्वाके नोकपर ‘हरि’ ये दो अक्षर बसते हैं, उसे गंगा, गया, सेतुबन्ध, काशी और पुष्करकी कोई आवश्यकता नहीं, अर्थात् उनकी यात्रा, स्नान आदिका फल भगवन्नामसे ही मिल जाता है। जिसने ‘हरि’ इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेदका अध्ययन कर लिया। जिसने ‘हरि’ ये दो अक्षर उच्चारण किये, उसने दक्षिणाके सहित अश्वमेध आदि यज्ञोंके द्वारा यजन कर लिया। ‘हरि’ ये दो अक्षर मृत्युके पश्चात् परलोकके मार्गमें प्रयाण करनेवाले प्राणोंको पाथेय (मार्गके लिये भोजनकी सामग्री) हैं, संसाररूप रोगके लिये सिद्ध औषध हैं और जीवनके दु:ख और क्लेशोंके लिये परित्राण हैं।’

इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि भगवन्नाम अर्थ, धर्म, काम—इन तीन वर्गोंका भी साधक है। यह बात ‘हरि’, ‘नारायण’ आदि कुछ विशेष नामोंके सम्बन्धमें नहीं है, प्रत्युत सभी नामोंके सम्बन्धमें है, क्योंकि स्थान-स्थानपर यह बात सामान्यरूपसे कही गयी है कि अनन्तके नाम, विष्णुके नाम, हरिके नाम इत्यादि। भगवान‍्के सभी नामोंमें एक ही शक्ति है।

नाम-संकीर्तन आदिमें वर्ण-आश्रमका भी नियम नहीं है—

ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: स्त्रिय: शूद्रान्त्यजादय:।

यत्र तत्रानुकुर्वन्ति विष्णोर्नामानुकीर्तनम्।

सर्वपापविनिर्मुक्तास्तेऽपि यान्ति सनातनम्॥

‘ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र, अन्त्यज आदि जहाँ-तहाँ विष्णुभगवान‍्के नामका अनुकीर्तन करते रहते हैं, वे भी समस्त पापोंसे मुक्त होकर सनातन परमात्माको प्राप्त होते हैं।’

नाम-संकीर्तनमें देश-काल आदिके नियम भी नहीं हैं। यथा—

न देशकालनियम: शौचाशौचविनिर्णय:।

परं संकीर्तनादेव राम रामेति मुच्यते॥

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गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्वापि पिबन्भुंजंजपंस्तथा।

कृष्ण कृष्णेति संकीर्त्य मुच्यते पापकंचुकात् ॥

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अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

य: स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि:॥

‘देश-कालका नियम नहीं है, शौच-अशौच आदिका निर्णय करनेकी भी आवश्यकता नहीं है। केवल ‘राम, राम’ यह संकीर्तन करनेमात्रसे जीव मुक्त हो जाता है।’ चलते-फिरते, खड़े रहते, सोते, खाते-पीते और जप करते हुए भी ‘कृष्ण, कृष्ण’ ऐसा संकीर्तन करके मनुष्य पापके केंचुलसे छूट जाता है। × × × अपवित्र हो या पवित्र—‘सभी अवस्थाओंमें (चाहे किसी भी अवस्थामें) जो कमलनयन भगवान‍्का स्मरण करता है, वह बाहर-भीतर पवित्र हो जाता है।’

कृष्णेति मंगलं नाम यस्य वाचि प्रवर्तते।

भस्मीभवन्ति सद्यस्तु महापातककोटय:॥

सर्वेषामपि यज्ञानां लक्षणानि व्रतानि च।

तीर्थस्नानानि सर्वाणि तपांस्यनशनानि च॥

वेदपाठसहस्राणि प्रादक्षिण्यं भुव: शतम्।

कृष्णनामजपस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥

‘जिसकी जिह्वापर ‘कृष्ण, कृष्ण, कृष्ण’ यह मंगलमय नाम नृत्य करता रहता है, उसकी कोटि-कोटि महापातक-राशि तत्काल भस्म हो जाती है। सारे यज्ञ, लाखों व्रत, सर्वतीर्थ-स्नान, तप, अनेकों उपवास, हजारों वेद-पाठ, पृथ्वीकी सैकड़ों प्रदक्षिणा कृष्ण-नाम-जपके सोलहवें हिस्सेके बराबर भी नहीं हो सकती।’

भगवन्नामके कीर्तनमें ही यह फल हो, सो बात नहीं। उसके श्रवण और स्मरणमें भी वही फल है। दशम स्कन्धके अन्तमें कहेंगे, ‘जिनके नामका स्मरण और उच्चारण अमंगलघ्न है।’ शिवगीता और पद्मपुराणमें कहा है—

आश्चर्ये वा भये शोके क्षते वा मम नाम य:।

व्याजेन वा स्मरेद्यस्तु स याति परमां गतिम्॥

प्रयाणे चाप्रयाणे च यन्नाम स्मरतां नृणाम्।

सद्यो नश्यति पापौघो नमस्तस्मै चिदात्मने॥

‘भगवान् कहते हैं आश्चर्य, भय, शोक, क्षत (चोट लगने) आदिके अवसरपर जो मेरा नाम बोल उठता है या किसी व्याजसे स्मरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। मृत्यु या जीवन—चाहे जब कभी भगवान‍्का नाम-स्मरण करनेवाले मनुष्योंकी पाप-राशि तत्काल नष्ट हो जाती है। उन चिदात्मा प्रभुको नमस्कार है।’

इतिहासोत्तम (महाभारत)-में कहा गया है—

श्रुत्वा नामानि तत्रस्थास्तेनोक्तानि हरेर्द्विज।

नारका नरकान्मुक्ता: सद्य एव महामुने॥

‘महामुनि ब्राह्मणदेव! भक्तराजके मुखसे नरकमें रहनेवाले प्राणियोंने श्रीहरिके नामका श्रवण किया और वे तत्काल नरकसे मुक्त हो गये।’

यज्ञ-यागादिरूप धर्म अपने अनुष्ठानके लिये जिस पवित्र देश, काल, पात्र, शक्ति, सामग्री, श्रद्धा, मन्त्र, दक्षिणा आदिकी अपेक्षा रखता है, इस कलियुगमें उसका सम्पन्न होना अत्यन्त कठिन है। भगवन्नाम-संकीर्तनके द्वारा उसका फल अनायास ही प्राप्त किया जा सकता है। भगवान् शंकर पार्वतीके प्रति कहते हैं—

ईशोऽहं सर्वजगतां नाम्नां विष्णोर्हि जापक:।

सत्यं सत्यं वदाम्येव हरेर्नान्या गतिर्नृणाम्॥

‘सम्पूर्ण जगत‍्का स्वामी होनेपर भी मैं विष्णुभगवान‍्के नामका ही जप करता हूँ। मैं तुमसे सत्य-सत्य कहता हूँ, भगवान‍्को छोड़कर जीवोंके लिये अब कर्मकाण्ड आदि कोई भी गति नहीं है।’ श्रीमद्भागवतमें ही यह बात आगे आनेवाली है कि सत्ययुगमें ध्यानसे, त्रेतामें यज्ञसे और द्वापरमें अर्चा-पूजासे जो फल मिलता है, कलियुगमें वह केवल भगवन्नामसे मिलता है। और भी है कि कलियुग दोषोंका निधि है; परन्तु इसमें एक महान् गुण यह है कि श्रीकृष्ण-संकीर्तनमात्रसे ही जीव बन्धनमुक्त होकर परमात्माको प्राप्त कर लेता है।

इस प्रकार एक बारके नामोच्चारणकी भी अनन्त महिमा शास्त्रोंमें कही गयी है। यहाँ मूल प्रसंगमें ही—‘एकदापि’ कहा गया है; ‘सकृदुच्चरितम्’ का उल्लेख किया जा चुका है। बार-बार जो नामोच्चारणका विधान है, वह आगे और पाप न उत्पन्न हो जायँ, इसके लिये है। ऐसे भी वचन मिलते हैं कि भगवान‍्के नामका उच्चारण करनेसे भूत, वर्तमान और भविष्यके सारे ही पाप भस्म हो जाते हैं। यथा—

वर्तमानं च यत् पापं यद् भूतं यद् भविष्यति।

तत्सर्वं निर्दहत्याशु गोविन्दानलकीर्तनम्॥

‘फिर भी भगवत्प्रेमी जीवको पापोंके नाशपर अधिक दृष्टि नहीं रखनी चाहिये; उसे तो भक्ति-भावकी दृढ़ताके लिये भगवान‍्के चरणोंमें अधिकाधिक प्रेम बढ़ता जाय, इस दृष्टिसे अहर्निश नित्य-निरन्तर भगवान‍्के मधुर-मधुर नाम जपते जाना चाहिये। जितनी अधिक निष्कामता होगी, उतनी-ही-उतनी नामकी पूर्णता प्रकट होती जायगी, अनुभवमें आती जायगी।’

अनेक तार्किकोंके मनमें यह कल्पना उठती है कि नामकी महिमा वास्तविक नहीं है, अर्थवादमात्र है। उनके मनमें यह धारणा तो हो जाती है कि शराबकी एक बूँद भी पतित बनानेके लिये पर्याप्त है, परन्तु यह विश्वास नहीं होता कि भगवान‍्का एक नाम भी परम कल्याणकारी है। शास्त्रोंमें भगवन्नाम-महिमाको अर्थवाद समझना पाप बतलाया गया है—

पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमा:।

तैरर्जितानि पुण्यानि तद्वदेव भवन्ति हि॥

‘जो नराधम पुराणोंमें अर्थवादकी कल्पना करते हैं, उनके द्वारा उपार्जित पुण्य वैसे ही हो जाते हैं।’

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मन्नामकीर्तनफलं विविधं निशम्य

न श्रद्दधाति मनुते यदुतार्थवादम्।

यो मानुषस्तमिह दु:खचये क्षिपामि

संसारघोरविविधार्तिनिपीडितांगम् ॥

‘जो मनुष्य मेरे नाम-कीर्तनके विविध फल सुनकर उसपर श्रद्धा नहीं करता और उसे अर्थवाद मानता है, उसको संसारके विविध घोर तापोंसे पीड़ित होना पड़ता है और उसे मैं अनेकों दु:खोंमें डाल देता हूँ।’

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अर्थवादं हरेर्नाम्नि सम्भावयति यो नर:।

स पापिष्ठो मनुष्याणां नरके पतति स्फुटम्॥

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........‘जो मनुष्य भगवान‍्के नाममें अर्थवादकी सम्भावना करता है, वह मनुष्योंमें अत्यन्त पापी है और उसे नरकमें गिरना पड़ता है।’