भगवन्नाम-कीर्तन (कुछ ज्ञातव्य बातें)

भगवान‍्के यश, पराक्रम, गुण, माहात्म्य, चरित्र और नामोंका प्रेमपूर्वक कीर्तन करना चाहिये।

(क) कीर्तन स्वाभाविक होना चाहिये, उसमें कृत्रिमता न हो।

(ख) कीर्तन केवल भगवान‍्को रिझानेकी शुभ भावनासे हो, लोगोंको दिखलानेके लिये न हो।

(ग) कीर्तन नियमितरूपसे हो।

(घ) यथासम्भव कीर्तनमें बाजे और करतालका भी प्रबन्ध रहे।

(ङ) कीर्तनके साथ स्वाभाविक नृत्य भी हो।

(च) समय-समयपर मण्डली बनाकर नगर-कीर्तन भी किया जाय। स्वाभाविक कीर्तन वह है जो अपने मनकी मौजसे अपने सुखके लिये बिना प्रयास होता है, उसमें एक अनोखी मस्ती रहती है जिसका अनुभव उस साधकको ही होता है, दूसरे लोग उसका अनुमान भी नहीं कर सकते।

माननीय, गुणज्ञ, सारग्राही सत्पुरुष इसीलिये कलियुगकी प्रशंसा करते हैं कि इसमें कीर्तनसे ही साधक संसारके संगका त्यागी होकर परमधामको पाता है (भागवत ११। ५। ३६)। महाप्रभु चैतन्य, भक्त तुकाराम और नरसीजी आदि इसके उदाहरण हैं। इस दोषपूर्ण कलियुगमें यही एक भारी गुण है कि इसमें भगवान‍्के कीर्तनसे ही मनुष्य समस्त बन्धनोंसे छूटकर परमधामको प्राप्त करता है। सत्ययुगमें भगवान‍्के ध्यानसे, त्रेतामें यज्ञसे, द्वापरमें सेवासे जो फल होता था, वही कलियुगमें केवल श्रीहरि-कीर्तनसे होता है। अतएव जो अहर्निश प्रेमपूर्वक हरिकीर्तन करते हुए घरका सारा काम करते हैं वे भक्तजन धन्य हैं (भागवत)।

भगवान‍्के नामके समान मंगलकारी और कुछ भी नहीं है, भक्तिरूपी इमारतकी नींव श्रीभगवन्नाम ही है। पूर्वकृत महान् पापोंका नाश करनेमें भगवान‍्का नाम प्रचण्ड दावानल है, भक्त अजामिल और जीवन्ती वेश्याका इतिहास प्रसिद्ध है। परन्तु जो लोग दम्भसे या पाप करनेके लिये भगवान‍्का नाम लेते हैं, वे पातकी हैं। जो लोग नामकी आड़में पाप करते हैं उनके वे पाप वज्रलेप हो जाते हैं, उन पापोंकी शुद्धि करनेमें यमराज भी समर्थ नहीं हैं (पद्मपुराण, ब्रह्मखण्ड)।