भगवन्नाम-साधना

स्वरूपका चिन्तन न हो सके तो निरन्तर भगवान‍्का नाम-स्मरण ही करना चाहिये। भगवान‍्के नाम-स्मरणसे मन और प्राण पवित्र हो जायँगे और भगवान‍्के पावन पदकमलोंमें अनन्य प्रेम उत्पन्न हो जायगा। नाम-जपकी सहज विधि यह है कि अपने श्वास-प्रश्वासके आने-जानेकी ओर ध्यान रखकर श्वास-प्रश्वासके साथ-ही-साथ मनसे और साथ ही धीमे स्वरसे वाणीसे भी भगवान‍्का नाम-जप करता रहे। यह साधन उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-खड़े रहते सब समय किया जा सकता है। अभ्यास दृढ़ हो जानेपर चित्त विक्षेपशून्य होकर निरन्तर भगवान‍्के चिन्तनमें अपने-आप ही लग जायगा। प्राय: सभी प्रसिद्ध भक्तों और संतोंने इस साधनका प्रयोग किया था। महात्मा चरणदासजी कहते हैं—

स्वासा माहीं जपेतें दुबिधा रहे न कोय।

इसी प्रकार कबीरजी कहते हैं—

साँस साँस सुमिरन करौ, यह उपाय अति नीक।

मतलब यह कि भगवान‍्के स्वरूप, प्रभाव, रहस्य, गुण, लीला अथवा नामका चिन्तन निरन्तर तैलधाराकी भाँति होते रहना चाहिये। यही अखण्ड भजन है।

भगवान‍्के नाम-श्रवण और कीर्तनका महान् फल होता है। जहाँतक भगवान‍्के नामकी ध्वनि पहुँचती है, वहाँतकका वातावरण पवित्र हो जाता है। मृत्युकालके अन्तिम श्वासमें भगवान‍्का नाम किसी भी भावसे जिसके मुँहसे निकल जाता है, उसको परमपदकी प्राप्ति हो जाती है। भगवान‍्के नामका जहाँ कीर्तन होता है वहाँ यमदूत नहीं जा सकते। अतएव दस नामापराधोंसे बचते हुए भगवान‍्के नामका जप-कीर्तन और श्रवण अवश्य ही करना चाहिये।

सभी सद्‍ग्रन्थों और सन्तोंकी वाणियोंमें भगवन्नामकी महिमा गायी गयी है। श्रीमद्भागवतके निम्नलिखित श्लोक मनन करनेयोग्य हैं।

श्रीमद्भागवतमें कहा है—

पतित: स्खलितश्चार्त: क्षुत्त्वा वा विवशो ब्रुवन्।

हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात्॥

संकीर्त्यमानो भगवाननन्त:

श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम्।

प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं

यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवात:॥

(१२।१२।४६-४७)

‘कोई भी मनुष्य गिरते, पड़ते, छींकते और दु:खसे पीड़ित होते समय परवश होकर भी यदि ऊँचे स्वरसे ‘हरये नम:’ पुकार उठता है तो वह सब पापोंसे छूट जाता है। जैसे सूर्य पर्वतकी गुफाके अन्धकारका भी नाश कर देता है और जैसे प्रचण्ड वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न करके लुप्त कर देता है, इसी प्रकार अनन्तभगवान‍्का नाम-कीर्तन अथवा उनके प्रभावका श्रवण हृदयमें प्रवेश करके समस्त दु:खोंका अन्त कर देता है।’

यह तो विवश होकर नाम लेनेका फल है। प्रेमसे लेनेपर तो कहना ही क्या। इसीसे गोसाईंजी कहते हैं—

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं।

जनम अनेक रचित अघ दहहीं॥

सादर सुमिरन जो नर करहीं।

भव बारिधि गोपद इव तरहीं॥

अतएव भक्तिकी प्राप्तिके लिये निरन्तर भगवान‍्के नाम-गुण-यशका कीर्तन, श्रवण और चिन्तन नि:सन्देह परम साधन है।