भगवन्नामके विषयमें दिव्य संदेश
(१) जगत्के ईश्वरवादीमात्र ईश्वरके नामको मानते हैं। भगवान्के नामसे उसके स्वरूप, गुणसमूह, महिमा, दया और प्रेमकी स्मृति होती है। जैसे सूर्यके उदयमात्रसे जगत्के सारे अन्धकारका नाश हो जाता है, वैसे ही भगवान्के नाम-स्मरण और कीर्तनमात्रसे ही समस्त दुर्गुण और पापोंका समूह तत्काल नष्ट हो जाता है। जिनके यहाँ परमात्मा जिस नामसे पुकारा जाता है, वे उसी नामको ग्रहण करें, इसमें कोई आपत्ति नहीं।
(२) परन्तु परमात्माका नाम लेनेमें लोग कई जगह बड़ी भूल कर बैठते हैं। भोगासक्ति और अज्ञानसे उनकी ऐसी समझ हो जाती है कि हम भगवन्नामका साधन करते ही हैं और नामसे पापनाश होता ही है। इसलिये पाप करनेमें कोई आपत्ति नहीं है, यों समझकर वे पापोंका छोड़ना तो दूर रहा, भगवान्के नामकी ओट या उसका सहारा लेकर पाप करने लगते हैं। एक मुकद्दमेबाज एक नाम-प्रेमी भक्तको गवाह बनाकर अदालतमें ले गया, उससे कहा—‘देखो, मैं जो कुछ तुमसे कहूँ, न्यायाधीशके पूछनेपर वही बात कह देना।’ गवाहने समझा कि यह मुझसे सच्ची ही बात कहनेको कहेगा। पर उसकी बात सुननेपर पता लगा कि झूठ कहलाना चाहता है। इससे उसने कहा—‘भाई! मैं झूठी गवाही नहीं दूँगा।’ मुकद्दमेबाजने कहा—‘इसमें आपत्ति ही कौन-सी है? क्या तुम नहीं जानते कि भगवान्के नामसे पापोंका नाश होता है। तुम तो नित्य भगवान्का नाम लेते ही हो, भक्त हो, जरा-सी झूठसे क्या बिगड़ेगा? एक ईश्वरके नाममें पापनाशकी जितनी शक्ति है उतनी मनुष्यमें पाप करनेकी नहीं है। मैं तो काम पड़नेपर यों ही कर लिया करता हूँ।’ उसने कहा—‘भाई! मुझसे यह काम नहीं होगा, तुम करते हो तो तुम्हारी मर्जी। मतलब यह कि इस प्रकार परमात्माके नाम या उसकी प्रार्थनाके भरोसे जो लोग पापको आश्रय देते हैं वे बड़ा अपराध करते हैं। वे तो पाप करनेमें भगवान्के नामको साधन बनाते हैं, नाम देकर बदलेमें पाप खरीदना चाहते हैं। ऐसे लोगोंकी दुर्गति नहीं होगी तो और किसकी होगी?’
(३) कुछ लोग जो संसारके पदार्थोंकी कामनावाले हैं वे भी बड़ी भूल करते हैं। वे भगवान्का नाम लेकर उसके बदलेमें भगवान्से धन सम्पत्ति, पुत्र-परिवार, मान-बड़ाई आदि चाहते हैं। वास्तवमें वे भी भगवन्नामका माहात्म्य नहीं जानते। जिस भगवन्नामके प्रबल प्रतापसे राजराजेश्वरके अखण्ड राज्यका एकाधिपत्य मिलता हो, उस नामको क्षणभंगुर और अनित्य तुच्छ भोगोंकी प्राप्तिके कार्यमें खो देना मूर्खता नहीं तो क्या है? संसारके भोग आने और जानेवाले हैं, सदा ठहरते नहीं। प्रत्येक भोग दु:खमिश्रित हैं। ऐसे भोगोंके आने-जानेमें वास्तवमें हानि ही क्या है?
(क) जो लोग यह समझकर नाम लेते हैं कि इसके लेनेसे हमारे पाप नाश हो जायँगे वे भी विशेष बुद्धिमान् नहीं हैं; क्योंकि पापोंका नाश तो पापोंके फल-भोगसे भी हो सकता है। जिस ईश्वरके नामसे स्वयं प्रियतम परमात्मा प्रसन्न होता है, जो नाम प्रियतमकी प्रीतिका निदर्शन है, उसे पाप-नाश करनेमें लगाना क्या भूल नहीं है? वास्तवमें ऐसा करनेवाले भगवन्नामका पूरा माहात्म्य नहीं जानते, क्या सूर्यको कहना पड़ता है कि तुम अँधेरेका नाश कर दो। उसके उदय होनेपर तो अन्धकारके लिये कोई स्थान ही नहीं रह जाता।
(४) भगवान्का नाम भगवत्प्रेमके लिये ही लेना चाहिये। भगवान् मिलें या न मिलें, परन्तु उनके नामकी विस्मृति न हो। प्रेमी अपने प्रेमीके मिलनेसे इतना प्रसन्न नहीं होता जितना उसकी नित्य स्मृतिसे होता है। यदि उसके मिलनेसे कहीं उसकी स्मृति छूट जाती हो तो वह यही चाहेगा कि ईश्वर भले ही न मिले, परन्तु उसकी स्मृति उत्तरोत्तर बढ़े, स्मृतिका नाश न हो। यही विशुद्ध प्रेम है।
(५) नाम-साधनमें कहीं कृत्रिमता न आ जाय। वास्तवमें आजकल जगत्में दिखावटी धर्म ‘दम्भ’ बहुत बढ़ गया है। बड़े-बड़े धर्मके उपदेशक न मालूम किस सांसारिक स्वार्थको लेकर कौन-सी बात कहते हैं, इस बातका पता लगाना कठिन हो जाता है। इस दम्भके दोषसे सबको बचना चाहिये। दम्भ कहते हैं बगुलाभक्तिको। अंदर जो बात न हो और ऊपरसे मान-बड़ाई प्राप्त करने या किसी कार्यविशेषकी सिद्धिके लिये दिखलायी जाय वही दम्भ है। दम्भी मनुष्य भगवान्को धोखा देनेका व्यर्थ प्रयत्न कर स्वयं बड़ा धोखा खाता है। भगवान् तो सर्वदर्शी होनेसे धोखा खाते नहीं, वह धूर्त जो जगत्को भुलावेमें डालकर अपना मतलब सिद्ध करना चाहता है स्वयं गिर जाता है। पाप उसके चिरसंगी बन जाते हैं। पापोंसे उसकी घृणा निकल जाती है। ऐसे मनुष्यको धर्मका परमतत्त्व, जिसे परमात्माका मिलन कहते हैं, कैसे प्राप्त हो सकता है? अतएव इस भयंकर दोषसे सर्वथा बचना चाहिये।