भगवन्नामसे सब सम्भव
भगवन्नाम परम मंगलमय तथा सम्पूर्ण बड़े-से-बड़े उपद्रवोंको—आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक व्याधियोंको मिटाकर सब प्रकारसे परम कल्याण करनेवाला है। भगवन्नाम-कौमुदीकार भगवन्नामकी वन्दना करते हुए कहते हैं—
अह: संहरदखिलं
सकृदुदयादेव सकललोकस्य।
तरणिरिव तिमिरजलधिं
जयति जगन्मंगलं हरेर्नाम॥
‘जैसे भगवान् सूर्य उदय होनेमात्रसे ही समस्त अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, वैसे ही श्रीहरिका नाम एक बार उच्चारण करनेमात्रसे ही जीवमात्रके सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देता है, अत: समस्त जगत्का मंगल करनेवाले श्रीहरिनामकी जय हो।’
भगवन्नामकी अनन्त महिमा है। यह केवल लोक-परलोक तथा भोग-मोक्षका ही परम साधन नहीं है, दुर्लभ भगवत्प्रेमकी प्राप्तिमें भी परम सहायक होता है। सभी ऋषि-मुनियों, संत-महात्माओंने नामकी महिमा गायी है। वेदोंसे लेकर आधुनिक संतोंकी तमाम वाणियाँ भगवन्नामकी महिमासे भरी हैं। श्रीचैतन्यमहाप्रभु, गोस्वामी तुलसीदासजी आदिने तो केवल नामपर ही भरोसा करनेकी बात कही है। महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव कहते हैं—
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहा-
दावाग्निनिर्वापणं
श्रेयस्कैरवचन्द्रिकावितरणं
विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं
पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते
श्रीकृष्णसंकीर्तनम्॥
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमित: स्मरणे न काल:।
एतादृशी तव कृपा भगवन् ममापि
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुराग:॥
‘भगवान् श्रीकृष्णका नाम-संकीर्तन चित्तरूपी दर्पणको परिमार्जित करनेवाला है, (दु:खमय) संसाररूपी महान् दावानलको बुझा देनेवाला है, कल्याणरूपी कुमुदिनीके विकासके लिये चन्द्रिकाका विस्तार करनेवाला है, पराविद्यारूपी वधूका जीवनरूप है, आनन्द-समुद्रको बढ़ानेवाला है, पद-पदपर पूर्ण अमृतका आस्वादन करानेवाला है और सब प्रकारसे बाहर-भीतर स्नान करानेवाला है—समस्त मलोंको—सारे पाप-तापोंको धोकर सम्पूर्ण आत्माको आनन्दसे सराबोर कर देनेवाला है। इन सात लक्षणोंवाला श्रीकृष्णनाम-संकीर्तन ही सर्वत्र विजयको प्राप्त होता है।
‘हे भगवन्! जीवोंकी विभिन्न रुचियोंको देखकर ही आपने अपने राम, कृष्ण, मुकुन्द, गोविन्द, गोपाल, दामोदर आदि नाम प्रकट किये हैं और प्रत्येक नाममें अपनी समस्त शक्ति भी निहित कर दी है। साथ ही नाम-स्मरणके लिये किसी देश-काल-पात्रका कोई नियम भी नहीं रखा, अर्थात् कहीं भी, किसी समय भी कोई भी नाम-स्मरण कर सकता है। प्रभो! आपकी जीवोंपर इतनी अहैतुकी अनुकम्पा होनेपर भी मेरा ऐसा दुर्भाग्य है कि आपके नाममें अनुराग नहीं हुआ?
श्रीभगवन्नाम-कौमुदीकार श्रीलक्ष्मीधर नामनिष्ठाके लिये प्रार्थना करते हैं—
श्रीरामेति जनार्दनेति जगतां
नाथेति नारायणे-
त्यानन्देति दयापरेति कमला-
कान्तेति कृष्णेति च।
श्रीमन्नाममहामृताब्धिलहरी-
कल्लोलमग्नं मुहु-
र्मुह्यन्तं गलदश्रुनेत्रमवशं
मां नाथ नित्यं कुरु॥
श्रीकान्त कृष्ण करुणामय कंजनाभ
कैवल्यवल्लभ मुकुन्द मुरान्तकेति।
नामावलीं विमलमौक्तिकहारलक्ष्मी-
लावण्यवंचनकरीं करवाणि कण्ठे॥
‘हे श्रीराम, हे जनार्दन, हे जगन्नाथ, हे नारायण, हे आनन्दस्वरूप, हे दयापरायण, हे कमलाकान्त, हे श्रीकृष्ण, हे नाथ! ऐसे आपके जो सम्बोधन नामरूपी महान् सुधा-समुद्र हैं, उनकी प्रेमरूपी लहरियोंमें मुझे निमग्न कर दीजिये। विषयी लोगोंका जैसा मोह संसारके प्राणी-पदार्थोंमें होता है, आपके नाममें मेरा वैसा ही मोह उत्पन्न कर दीजिये। नाम-कीर्तन करते समय मेरे नेत्रोंसे प्रेमाश्रुओंकी अजस्र धारा बहती रहे और मैं कीर्तनानन्दमें विवश बना रहूँ। प्रभो! आप नित्य-निरन्तर मेरी यही स्थिति कर दीजिये।’
‘श्रीकान्त, कृष्ण, करुणामय, कमलनाभ, कैवल्यवल्लभ, मुकुन्द, मुरारे—आपकी यह निर्मल मुक्ताहारकी शोभा-सुषमाको तिरस्कृत कर देनेवाली विमल नामावली हम सदा-सर्वदा अपने कण्ठमें धारण किये रहें—ऐसी कृपा कीजिये।’
श्रीचैतन्य महाप्रभु कहते हैं—
नयनं गलदश्रुधारया
वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपु: कदा तव नामग्रहणे भविष्यति॥
‘श्रीकृष्ण! आपका नाम लेते ही मेरी आँखोंसे अश्रुओंकी अजस्र धारा बहने लगे, वदन गद्गद हो जाय, वाणी रुक जाय और शरीर रोमांचित हो जाय—ऐसा कब होगा?’ गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—
भरोसो जाहि दूसरो सो करो।
मोको तो रामको नाम कलपतरु
कलि कल्यान फरो॥
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संकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ जरि जीह गरो।
अपनो भलो राम-नामहि ते तुलसिहि समुझि परो॥
(विनय-पत्रिका २२६)
जपहिं नामु जन आरत भारी।
मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका।
भए नाम जपि जीव बिसोका॥
नाम कामतरु काल कराला।
सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता।
हित परलोक लोक पितु माता॥
नामु राम को कलपतरु
कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें
तुलसी तुलसीदासु॥
(श्रीरामचरितमानस)
महात्मा गाँधीजीकी दैनिक प्रार्थनामें नाम-संकीर्तनका मुख्य स्थान था। (यद्यपि उनके अनुयायी कहलानेवाले आज गाँधीजीकी राम-धुनको छोड़ चुके हैं।) अत: नाम-संकीर्तनको ‘चिल्लाना’ बतलाना सर्वथा अज्ञताका ही सूचक है।