‘हरि:शरणम्’ मन्त्रसे महामारी भाग गयी

कलकत्तेके स्वर्गीय श्रीरूढ़मलजी गोयनका बड़े प्रसिद्ध विद्वान् और भगवद्विश्वासी थे। भगवान‍्की लीलासे उनके घरमें कोई नहीं रह गया था। यों वे बड़े शौकीन थे और साथ ही बड़े विद्याव्यसनी थे। संस्कृतके विद्वानोंको उनके यहाँ बड़ा आश्रय मिलता था। वे अपने बड़तल्ला स्ट्रीटके मकानमें रहते थे।

उन दिनों कलकत्तेमें प्राय: प्रतिवर्ष प्लेगकी महामारी आया करती थी और बड़ा विनाश होता था। रूढ़मलजी भी प्लेगसे आक्रान्त हो गये। बहुत तेज ज्वर था और दोनों ओर गिल्टियाँ थीं। घरमें और तो कोई थे नहीं, उनके एक विश्वस्त सेवक थे। वे ही सब देख-भाल करते थे। उस समय डॉक्टर सर कैलाशचन्द्र बोसका कलकत्तेमें बड़ा नाम था। उन्हें लोग ‘विधाता’ कहते थे। वे बड़े सफल चिकित्सक थे। दूरसे ही देखकर रोगका निदान कर देते थे। ऐसा माना जाता था। गोयनका-परिवारमें वे घरेलू डॉक्टर थे। संध्याके समय वे रूढ़मलजीको देखने आये और कह गये कि ‘इनको सन्निपात हो गया है, रोग असाध्य है और रात्रिको किसी भी समय इनके प्राण जा सकते हैं।’

रूढ़मलजी सब सुन रहे थे। डॉक्टर सर कैलाशचन्द्रके लौट जानेके बाद उन्होंने अपने सेवकसे गंगाजल मँगवाया। उससे शरीर पोंछकर कपड़े बदले। भगवान् श्रीकृष्णका बड़ा सुन्दर एक चित्र था। उसको पलंगपर अपने सामने रखवा लिया और चारों तरफ तकिये लगवाकर वे बैठ गये। सेवकसे कहा—‘तू किंवाड़ बंद कर लो और बाहर बैठ जाओ। डॉक्टर साहब रातको प्राणत्यागकी बात कह ही गये हैं। यदि प्राण रहेंगे तो मैं जब आवाज दूँ, तब किंवाड़ खोल देना। नहीं तो सबेरे किंवाड़ खोलकर परिवारके अन्य लोगोंको सूचना दे देना। वे अन्त्येष्टिकी व्यवस्था कर देंगे।’ सेवकने आज्ञानुसार बाहरसे किंवाड़ बंद कर दिये।

प्रात:काल चार बजे उन्होंने आवाज देकर किंवाड़ खुलवाये और सेवकसे कहा कि मेरा शरीर स्वस्थ है। ब्राह्मण-भोजन करवाना है। अतएव तू गंगाजीके घाटपर और अपने परिचित विद्वानोंके यहाँ जाकर सौ ब्राह्मणोंको निमन्त्रण दे आओ। वे दस-ग्यारह बजे भोजनके लिये आ जायँ और तुम लौटकर ब्राह्मण-भोजनके लिये रसोईकी व्यवस्था करो। आदेशके अनुसार सारी व्यवस्था हो गयी। ब्राह्मण-भोजन भलीभाँति सम्पन्न हो गया। ब्राह्मण दक्षिणा पाकर लौट गये। उधर श्रीकैलाशबाबू गोयनका-परिवारके ही एक अन्य घरमें रोगी देखने गये थे। उन्होंने पूछा—बाबू रूढ़मलजीकी दाह-क्रिया करके आपलोग कब लौटे? उत्तरमें बताया गया कि वे तो जीवित हैं और स्वस्थ हैं, कैलाशबाबू आश्चर्यमें डूब गये और उन्हें देखनेके लिये उनके मकानपर गये। देखा, तो वे सदाकी भाँति रेशमी पीताम्बर पहने, तिलक लगाये आसनपर बैठे हैं और चौकीपर रखे हुए चाँदीके थालमें ब्राह्मणोंका प्रसाद पा रहे हैं। सर कैलाशने यह देखकर उनसे पूछा कि आप यह सब किसके कहनेसे खा रहे हैं। उन्होंने हँसकर उत्तर दिया—‘जिनकी दवासे अच्छा हुआ, उन्हींके कहनेसे।’ भगवान‍्का विधान, सर कैलाशबाबूने यही निश्चय किया कि ये सन्निपातमें हैं और जाते समय वे देख-रेख करनेवालोंसे कह गये कि ध्यान रखना किसी भी समय इनका शरीर जा सकता है।

तीन-चार दिन बीत गये। डॉक्टर कैलाशबाबूको कोई समाचार नहीं मिला, तब एक दिन वे स्वयं आये, पता लगा कि रूढ़मलबाबू स्वस्थ हैं। ये उनसे मिले और पूछा—‘आप सर्वथा मरणासन्न थे, पर अब आप स्वस्थ हैं। आपने क्या दवा ली, क्या किया जिससे आप आश्चर्यजनकरूपसे स्वस्थ हो गये?’ रूढ़मलजीने बताया कि उस दिन आप कह ही गये थे कि मेरे बचनेकी कोई आशा नहीं है। मैंने भी आपके वचनोंके अनुसार यही समझा। मैंने मनमें विचार किया कि जब मरना ही है, तब भगवान‍्का स्मरण करते हुए क्यों न मरूँ?’ मैंने श्रीमद्भागवतके माहात्म्यमें पढ़ा था कि नारदजीने सनकादिसे कहा है—‘आपको कालप्रेरित जरावस्था कभी बाधा नहीं पहुँचाती और आप सदा-सर्वदा पाँच वर्षकी आयुके और नित्य नीरोग इसलिये रहते हैं कि आप रात-दिन निरन्तर ‘हरि:शरणम्’ मन्त्रका जप करते रहते हैं।’

मैंने सोचा कि मैं भी इसी मन्त्रका जप करूँ। मैंने गंगाजलसे शरीर पोंछकर कपड़े बदलकर भगवान् श्रीकृष्णका यह सुन्दर चित्र (चित्र दिखाकर) सामने रखवा लिया। ज्वर तो बहुत तेज था ही, गिल्टियोंमें दर्द भी बड़ा भयानक था, पर मैं तीनों ओर तकिये लगवाकर किसी तरह बैठ गया और ‘हरि:शरणम्’ मन्त्रका जप करने लगा। पता नहीं, कितनी देरतक होशमें रहा। जबतक होशमें रहा, जप चलता रहा। लगभग चार बजे बाह्य चेतना लौटी। मुझे अपना शरीर ठंडा और हलका मालूम दिया। दर्द नहीं था। मैंने हाथ लगाकर देखा कि दोनों ओरकी गाँठें बैठ चुकी हैं। मैंने सोचा—‘कहीं बहम न हो।’ मैं पलंगसे नीचे उतरकर कमरेमें इधर-उधर घूमा। न दर्द था, न ज्वर। मैंने समझा, यह ‘हरि:शरणम्’ मन्त्रका चमत्कार है। ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये, अतएव मैंने ब्राह्मण-भोजनकी व्यवस्था की और ब्राह्मणोंके भोजन करके लौट जानेके बाद मैं उस दिन उनका प्रसाद पा रहा था, उसी समय आप पधारे। मेरी दवा और मेरा डॉक्टर ‘हरि:शरणम्’ मन्त्र ही था, जिसने मुझको आश्चर्यजनकरूपसे स्वस्थ कर दिया। डॉक्टर सर कैलाशचन्द्र यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गये और उनकी आँखोंमें आँसू छलक आये।