इस युगमें नाम-जप ही प्रधान साधन है

संसार-समुद्रसे पार होनेके लिये कलियुगमें श्रीहरि-नामसे बढ़कर और कोई भी सरल साधन नहीं है। भगवन्नामसे लोक-परलोकके सारे अभावोंकी पूर्ति तथा दु:खोंका नाश हो सकता है। अतएव संसारके दु:ख-सुख, हानि-लाभ, अपमान-मान, अभाव-भाव, विपत्ति-सम्पत्ति—सभी अवस्थाओंमें प्रतिक्षण भगवान‍्का नाम लेते रहना चाहिये, विश्वासपूर्वक लेते रहना चाहिये। नाम साक्षात् भगवान् ही हैं, यों मानना चाहिये। नाम-जप इस युगमें सबसे बढ़कर भजन है।

नाम-जप करनेवालोंको बुरे आचरण और बुरे भावोंसे यथासाध्य बचना चाहिये। झूठ-कपट, धोखा-विश्वासघात, छल-चोरी, निर्दयता-हिंसा, द्वेष-क्रोध, ईर्ष्या-मत्सरता, दूषित आचार, व्यभिचार आदि दोषोंसे अवश्य बचना चाहिये। एक बातसे तो पूरा खयाल रखकर बचना चाहिये—वह यह कि भजनका बाहरी स्वाँग बनाकर इन्द्रिय-तृप्ति या किसी भी प्रकारके नीच स्वार्थका साधन कभी नहीं करना चाहिये। नामसे पाप नाश करना चाहिये; परन्तु नामको पाप करनेमें सहायक कभी नहीं बनाना चाहिये। नाम जपते-जपते ऐसी भावना करनी चाहिये कि ‘प्रत्येक नामके साथ भगवान‍्के दिव्य गुण, अहिंसा, सत्य, दया, प्रेम, सरलता, साधुता, परोपकार, सहृदयता, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, संतोष, शौच, श्रद्धा, विश्वास आदि मेरे अंदर उतर रहे हैं और भरे जा रहे हैं। मेरा जीवन इन दैवी गुणोंसे तथा भगवान‍्के प्रेमसे ओतप्रोत हो रहा है। अहा! नामके उच्चारणके साथ ही मेरे इष्टदेव प्रभुका ध्यान हो रहा है, उनके मधुर-मनोहर स्वरूपके दर्शन हो रहे हैं, उनकी सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी त्रिभुवन-पावनी ललित लीलाओंकी झाँकी हो रही है। मन-बुद्धि उनमें तदाकारताको प्राप्त हो रहे हैं।’

मन न लगे तो नाम-भगवान‍्से प्रार्थना करनी चाहिये—‘हे नाम-भगवन्! तुम दया करो, तुम्हीं साक्षात् मेरे प्रभु हो; अपने दिव्य प्रकाशसे मेरे अन्त:करणके अन्धकारका नाश कर दो। मेरे मनके सारे मलको जला दो। तुम सदा मेरी जिह्वापर नाचते रहो और नित्य-निरन्तर मेरे मनमें विहार करते रहो। तुम्हारे जीभपर आते ही मैं प्रेम-सागरमें डूब जाऊँ; सारे जगत् को, जगत‍्के सारे सम्बन्धोंको, तन-मनको, लोक-परलोकको, स्वर्ग-मोक्षको भूलकर केवल प्रभुके—तुम्हारे प्रेममें ही निमग्न हो रहूँ। लाखों जिह्वाओंसे तुम्हारा उच्चारण करूँ, लाखों-करोड़ों कानोंसे मधुर नाम-ध्वनिको सुनूँ और करोड़ों-अरबों मनोंसे दिव्य नामानन्दका पान करूँ। तृप्त होऊँ ही नहीं। पीता ही रहूँ नाम-सुधाको और उसीमें समाया रहूँ।’

यदि मन विशेष चंचल हो तो फिर जिह्वा और ओठोंको चलाकर नामका स्पष्ट उच्चारण करते हुए उसे सुननेका प्रयत्न कीजिये। तन्द्रा आती हो तो आँखें खोलकर वाणीसे स्पष्ट जप कीजिये। मनकी चंचलताका नाश करनेके लिये इन्द्रियोंका संयम आवश्यक है और उसके लिये स्पष्ट उच्चारणपूर्वक वाचिक जप करना चाहिये। वाचिक जपसे मन-इन्द्रियोंकी चंचलताका शमन होता है, फिर उपांशु जपके द्वारा नामकी रस-माधुरीकी ओर चित्तकी गति की जाती है। तदनन्तर मानसिक जपके द्वारा मधुर नाम-रसका पान किया जाता है।

भगवान‍्के सभी नाम एक-से हैं, सबमें समान शक्ति है, सभी पूर्ण हैं; तथापि जिस नाममें अपनी रुचि हो, जिसमें मन लगता हो और सद्‍गुरु अथवा सन्तने जिस नामका उपदेश किया हो, उसीका जप करना उत्तम है। दो-तीन नामोंका, जैसे राम, कृष्ण, हरि—जप एक ही भावनासे, एक साथ भी चलें तो भी हानि नहीं है।