महामना मालवीयजीके कुछ भगवन्नाम-सम्बन्धी संस्मरण
(१) महामना एक बार गोरखपुर पधारे थे और मेरे पास ही दो-तीन दिन ठहरे थे। उनके पधारनेके दूसरे दिन प्रात:काल मैं उनके चरणोंमें बैठा था। वे अकेले ही थे। बड़े स्नेहसे बोले—‘‘भैया! मैं तुम्हें आज एक दुर्लभ तथा बहुमूल्य वस्तु देना चाहता हूँ। मैंने इसको अपनी मातासे वरदानके रूपमें प्राप्त किया था। बड़ी अद्भुत वस्तु है। किसीको आजतक नहीं दी, तुमको दे रहा हूँ। देखनेमें चीज छोटी-सी दीखेगी, पर है महान् ‘वरदान-रूप’।’’ इस प्रकार प्राय: आधे घंटेतक वे उस वस्तुकी महत्तापर बोलते गये। मेरी जिज्ञासा बढ़ती गयी। मैंने आतुरतासे कहा—‘‘बाबूजी! जल्दी दीजिये, कोई आ जायँगे।’’
तब वे बोले—‘‘लगभग चालीस वर्ष पहलेकी बात है। एक दिन मैं अपनी माताजीके पास गया और बड़ी विनयके साथ उनसे यह वरदान माँगा कि ‘मुझे आप ऐसा वरदान दीजिये’, जिससे मैं कहीं भी जाऊँ सफलता प्राप्त करूँ।’’
माताजीने स्नेहसे मेरे सिरपर हाथ रखा और कहा—‘‘बच्चा! बड़ी दुर्लभ चीज दे रही हूँ। तुम जब कहीं भी जाओ तो जानेके समय ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण कर लिया करो। तुम सदा सफल होओगे।’’ मैंने श्रद्धापूर्वक सिर चढ़ाकर माताजीसे मन्त्र ले लिया। हनुमानप्रसाद! मुझे स्मरण है, तबसे अबतक मैं जब-जब चलते समय ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण करना भूला हूँ, तब-तब असफल हुआ हूँ। नहीं तो, मेरे जीवनमें—‘चलते समय ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण कर लेनेके प्रभावसे कभी असफलता नहीं मिली। आज यह महामन्त्र परम दुर्लभ वस्तु मेरी माताकी दी हुई महान् वस्तु तुम्हें दे रहा हूँ। तुम इससे लाभ उठाना।’ यों कहकर महामना गद्गद हो गये।
मैंने उनका वरदान सिर चढ़ाकर स्वीकार किया और इससे बड़ा लाभ उठाया। अब तो ऐसा हो गया है कि घरभरमें सभी इसे सीख गये हैं। जब कभी घरसे बाहर निकला जाता है, तभी बच्चे भी ‘नारायण-नारायण’ उच्चारण करने लगते हैं। इस प्रकार रोज ही, किसी दिन तो कई बार ‘नारायण’ की और साथ ही पूज्य माताजीकी पवित्र स्मृति हो जाती है।
(२) महामनाके एक पुत्र बड़े अर्थ-संकटमें थे। उनको महामनाने यह लिखा ‘तुम आर्त होकर विश्वाससे गजेन्द्रस्तुतिका पाठ करो, इससे तुम्हारा संकट दूर हो जायगा।’ फिर एक पत्रमें उनको लिखा—‘भगवान् पर विश्वास रखो, धैर्य मत छोड़ो और गजेन्द्रस्तुतिका आर्तभावसे विश्वासपूर्वक पाठ करो।* मैं एक बार नाकतक ऋणमें डूब गया था, गजेन्द्रस्तुतिके पाठसे मैं ऋणमुक्त हो गया, तुम भी इसका आश्रय लो।’ अपने कष्टमें पड़े पुत्रको बिना पूर्ण विश्वासके कौन पिता ऐसा लिख सकता है।