मन्त्र और नाम-जप

‘ॐ नमो नारायणाय,’ ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप कर सकते हैं और सभी जप स्नानादिके बाद शुद्धतापूर्वक ही करना चाहिये। वैश्य-गायत्री मुझे मालूम नहीं है। वह ब्राह्मण-गायत्रीसे भिन्न तो होगी ही। परन्तु मेरे विचारसे तो जिसे ब्राह्मण-गायत्री कहते हैं, उसीको यज्ञोपवीत-संस्कारयुक्त तीनों वर्णवालोंको जपना चाहिये। गायत्रीके जो अनेक भेद किये गये हैं वे प्राचीन नहीं हैं। पीछेके महानुभावोंने किये हैं, ऐसा प्रतीत होता है।

इस मन्त्रको मूलमन्त्र कहते हैं। रामायणमें राम-नामको ही मूलमन्त्र कहा गया है। इसीका जप श्रीशंकरभगवान् करते हैं।

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श्रीदुर्गाजीका दुर्गा नाम ही ढाई अक्षरका है। इसका जप आप हर समय कर सकते हैं। प्रतिदिन स्नान-सन्ध्या आदिसे निवृत्त होकर एक आसनपर बैठकर मालाद्वारा जप करना चाहिये। जितना आप अधिक-से-अधिक प्रेमपूर्वक जप कर सकें, उतना ही अच्छा है—‘अधिकस्याधिकं फलम्।’ इसके जपकी कोई नियमित संख्या या विशेष विधि नहीं है।

‘सरस्वती’ का बीज-मन्त्र ‘ऐं’ है। यह सबसे छोटा मन्त्र है। सरस्वतीजीका ध्यान करते हुए इस मन्त्रका जप करनेसे उनकी कृपा प्राप्त होती है। श्रीदेवीभागवतमें इसकी बड़ी महिमा बतायी गयी है। सुदर्शनने इसीके जपसे सरस्वतीका प्रत्यक्ष दर्शन और दुर्लभ वरदान प्राप्त किया था।’

प्रत्येक कामनाकी पूर्ति करनेवाले हैं स्वयं श्रीभगवान्, अत: प्रेमपूर्वक उन्हींका नाम जपना चाहिये—

अकाम: सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधी:।

तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥

(श्रीमद्भागवत २।३।१०)

‘अर्थात् ‘कोई कामना न हो’, अथवा सब प्रकारकी कामनाएँ हों या मोक्षमात्रकी अभिलाषा हो, मनुष्य तीव्र भक्तियोगके द्वारा परमपुरुष भगवान‍्की आराधना करे। अत: प्रत्येक कामनाकी पूर्तिका उपाय है—भगवान‍्की अटल भक्ति और भगवान‍्के नामोंका निरन्तर जप।’