नाम-कीर्तन-महिमा

‘कल्याण’ के एक अंकमें श्रीअमरनाथजी शर्मा, एडवोकेटका ‘नाम-कीर्तन-महिमा’ शीर्षक लेख प्रकाशित हुआ था। उसमें अखण्डनाम-कीर्तनमें बनाये हुए काजलकी महिमा लिखी थी तथा यह भी लिखा था, किसीके माँगनेपर श्रीशर्माजी कुछ काजल उन लोगोंको भेज देंगे, जो श्रद्धा-विश्वासके साथ स्वयं २४ घंटेका अखण्ड कीर्तन करना स्वीकार करेंगे। इस लेखको पढ़कर काजल माँगनेवालोंके इतने अधिक पत्र उनके पास तथा कल्याण-सम्पादकके पास आये और अबतक आ रहे हैं कि उन सबको काजल भेजना तो दूर रहा, उनका उत्तर लिखना भी कठिन हो गया। स्वयं कीर्तन करनेकी बात तो बहुत थोड़े लोगोंने स्वीकार की, अधिकांशने तो काजल ही माँगा। शर्माजीके पास काजल कितना संग्रहमें था, जो इतने लोगोंको दिया जाता। अतएव लोगोंको निराश ही होना पड़ा। इससे अब काजल मँगानेके लिये श्रीअमरनाथजीको, श्रीस्वामीजीको और कल्याण-सम्पादकको कोई भी सज्जन कृपया पत्र न लिखें। जिनको भगवान् और भगवन्नाममें श्रद्धा-विश्वास हो, वे अपने यहाँ कम-से-कम २४ घंटेतक, हो सके तो तीन या सात दिनोंतक—

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

—इन सोलह नामोंके मन्त्रका अखण्ड-कीर्तन करावें। कीर्तनके स्थानपर भगवान‍्की मूर्ति या चित्रके पास शुद्ध घृतका दीपक रखें। दीपक अखण्ड रहे यानी जबतक कीर्तन होता रहे, तबतक बुझे नहीं और उसी दीपकसे काजल बना लें। काजल बनाना गृहस्थमें प्राय: सभी जानते हैं। दीपकके ऊपर टेढ़ा सकोरा रख दें अथवा एक हाँड़ीमें पाँच-सात छेद करके उस हाँड़ीको दीपकपर रख दें। काजल बनता जायगा और दीपक बुझेगा नहीं। घी बीच-बीचमें दीपकमें देते रहें, जरूरत हो तो बत्ती भी बदलते रहें, पर खयाल रखें, बत्ती बुझने न पावे। दूसरी बत्ती जला देनेपर ही पहलीको निकालें।

अखण्ड-कीर्तनकी विधि यह है कि कम-से-कम दो-दो आदमी लगातार दो घंटेतक कीर्तन करते रहें, (आदमी कम हों और कर सकें तो चार घंटेतक दो आदमी कीर्तन करते रहें) उनका समय पूरा होते ही दूसरे दो सज्जन आ जायँ और वे जब कीर्तन करने लगें, तब पहलेके दोनों चले जायँ। यों कीर्तन जारी रहे। दो घंटे दिनमें और दो घंटे रातमें वही आदमी कीर्तन करें तो २४ आदमियोंसे अखण्ड-कीर्तन हो सकता है। घरके, मुहल्लेके लोगोंको मिलकर कीर्तन करना चाहिये। स्त्रियाँ भी कीर्तन कर सकती हैं, परन्तु उनके साथ पुरुष नहीं रहना चाहिये—इस प्रकार कीर्तन करके काजल बनाया जा सकता है और श्रद्धा-भक्ति तथा विश्वास होगा तो वह काजल श्रीअमरनाथजीके लेखमें बताये हुए काजलसे कम महत्त्वका नहीं होगा। लोगोंको पत्र न लिखकर कीर्तन करने-करानेका श्रम स्वीकार करके स्वयं काजल बना लेना चाहिये।