नम्र निवेदन

हमारे शास्त्रोंमें श्रीभगवन्नामकी महिमा अतुलनीय है। विशेषतया कलियुगके प्राणियोंके लिये तो भगवन्नाम ही एकमात्र परम साध्य और परम साधन है। जिसने नामका आश्रय ले लिया, उसका जीवन निश्चय ही सफल हो चुका। भगवान‍्के पवित्र नामोंके जप-कीर्तनमें वर्णाश्रमका कोई नियम नहीं है। सभी भगवन्नामके अधिकारी हैं, सभी भगवान‍्का नाम-कीर्तन करके पापोंसे मुक्त हो सनातन पदको प्राप्त कर सकते हैं।

प्रस्तुत संग्रह श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारके भगवन्नामविषयक लेखों, विचारों, पत्रों आदिका संग्रह है, जो समय-समयपर ‘कल्याण’ में प्रकाशित हुए थे। श्रीभाईजी उस भागवतीय स्थितिमें पहुँच गये थे जहाँ पहुँचे हुए व्यक्तिके जीवनसे, वाणीसे, लेखनीसे परमार्थके साधकोंको ही नहीं, मानवमात्रको अमोघ लाभ मिलता है। हमारा विश्वास है, इस संग्रहको मननपूर्वक पढ़नेसे पाठकोंका ध्यान नाम-जप-कीर्तनकी ओर आकर्षित हुआ और वे भगवन्नाम-जप-कीर्तनमें लग गये तो उनका और जगत‍्का महान् कल्याण होगा।