पत्रोंमें नाम-जपके विविध प्रसंग
नामसे पाप-नाश कैसे सम्भव है
प्रार्थना और भगवन्नाममें बड़ा बल है। एक नामसे पापोंका अशेष नाश हो सकता है—इसको केवल कल्पना मत मानो। ज्ञानीलोग कहते हैं—‘ज्ञान प्राप्त होनेपर, ब्रह्मका स्वरूप जान लेनेपर मुक्ति हो जाती है।’ यह बात सर्वथा सत्य भी है, परंतु इसमें प्रमाण क्या है? शास्त्रके वचन ही तो हैं? ऐसे कर्म-बन्धनमें सब लोग फँसे हैं कि बिना इच्छाके भी कर्मोंका फल बाध्य होकर भोगते हैं—उस कर्मबन्धनकी सारी ग्रन्थियाँ ब्रह्मको जानते ही टूट जाती हैं। अतएव ‘ज्ञानमात्रसे बन्धनोंका नाश होना’ जैसे सम्भव है, वैसे ही ‘भगवान्के नाममात्रसे पापोंका नाश’ क्यों सम्भव नहीं है? इसमें भी शास्त्र-प्रमाण है। वस्तुत: दोनों ही बातें सत्य हैं। अतएव मनमें विश्वास करके भगवन्नामकी शरण ग्रहण करनेपर संकटोंका नाश होना कोई बड़ी बात नहीं है।
अन्तःकरणकी शुद्धिका उपाय
आपने अन्त:करण शुद्ध होनेका सुगम उपाय पूछा है; इसके लिये सबसे सुगम उपाय है—भगवान्के नामोंका निरन्तर जप। अन्त:करण अशुद्ध होता है—पाप-वासनाओंसे, आसक्ति, ममता, अहंता आदि दोषोंसे—ये सब अन्त:करणके मैल हैं। भगवन्नामके पावन जलसे ही यह मैल धुल पाती है। भगवान् सूर्य जिस प्रकार रातके अन्धकारको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार भगवान्का नाम, दोष, दु:ख और दुराशाका दलन कर डालता है। तुलसीदासजी कहते हैं—
सहित दोष दुख दास दुरासा।
दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
जन मन अमित नाम किए पावन।
नाम सकल कलि कलुष नसावन॥
विश्वासपूर्वक नाम-जपसे रोगनाश
सबसे बड़ी दवा है विश्वासके साथ भगवान्का नाम लेना। श्रीधन्वन्तरिजीके वाक्य हैं—
अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात्।
नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥
‘अच्युत, अनन्त, गोविन्द—इन नामोंके उच्चारणरूपी औषधसे सब रोगोंका नाश होता है—यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ।’
अतएव आप फलमें सन्देहरहित होकर सरल विश्वासके साथ ‘अच्युताय नम:, अनन्ताय नम:, गोविन्दाय नम:’—इन नामोंका जप कीजिये। आपके पतिदेव कर सकें तो उनसे भी कराइये। अवश्य लाभ होगा। लेकिन दु:ख-नाशका ही नहीं, भयंकर-से-भयंकर भवरोगके नाशका भी यही सर्वोत्तम उपाय है। इसपर विश्वास कीजिये।
साधकोंसे
भगवान्के नाममें पूरा आनन्द नहीं आता, इसका कारण यही है कि भगवान्में अभीतक प्रियतम-बुद्धि नहीं है। जिसमें प्रियतम-बुद्धि हो जाती है, उसके नामकी तो बात ही निराली है, उसकी फटी जूतीका चिथड़ातक अत्यन्त प्यारा लगता है। भगवान्में प्रियतम-बुद्धि हो जानेपर उनके सारे जगत् में—भयानक जगत्में भी उन्हींके नाते अत्यन्त प्रेम हो जायगा और सभी वस्तुएँ आनन्ददायिनी बन जायँगी, क्योंकि सबमें फिर उन्हीं परम प्रियतमका सम्बन्ध दीख पड़ेगा; सभी उनके कर-कमलोंसे संस्पृष्ट जान पड़ेंगी। फिर नाम परम मधुर हो जायगा। नाम सुननेवाला परम प्रिय और परम पूज्य जान पड़ेगा। उनकी स्मृति करा देनेवालेके चरणोंमें चित्त लुट पड़ेगा।
सेवा और नाम-जप
जहाँतक हो सके भगवान्के नामका आश्रय लेकर अधिक-से-अधिक भगवन्नाम-स्मरण करना चाहिये। मेरी समझसे—यदि सेवाकी वासना मनमें होगी तो भगवन्नाम-ग्रहणके द्वारा जगत्की सेवा भी कम नहीं होगी, यह विश्वास करना चाहिये। कलियुगमें यही एकमात्र मार्ग है।
भगवान्की कृपापर निर्भर करके, बस, उनका नाम लेते रहिये। इस कालमें जीवोंके लिये यही सर्वोत्कृष्ट साधना है। दूसरे सब साधन तो इस सुधामयी बूटीके अनुपानमात्र हैं।
सच पूछिये तो यह कहना भी अत्युक्ति न होगा कि इस युगमें जगत्के उद्धारकी चेष्टा तो बस, अहंकारकी सृष्टिमात्र होगी।
नाम-जप और दैवी सम्पत्ति
भगवान्के नाम और भगवद्भक्तिकी महिमा अनन्त है। आप और हम तो क्षुद्र हैं—महापुरुष भी इनकी महिमा पूरी-पूरी नहीं गा सकते, परन्तु भाईसाहब! आप जिस ढंगसे भक्ति और भगवन्नामका माहात्म्य बतलाते हैं, वह मुझे पसंद नहीं है। मैं तो मानता हूँ, भगवन्नामसे पापका लेश भी नहीं रहता। फिर यह कैसे स्वीकार करूँ कि भगवन्नामका सहारा लेकर दुष्कर्म करते रहना जान-बूझकर भी उनसे हटनेका प्रयास और अभिलाषा न करना उचित है? मेरी समझसे भगवद्भक्तिके साथ दैवी सम्पत्तिका अनिवार्य संयोग है।
यह सत्य है कि अधिक पाप करनेवालोंको भी भगवन्नाम-कीर्तन और भक्ति करनेका अधिकार है। भगवान्का द्वार पापियोंके लिये बन्द नहीं है तथा भगवन्नाम और भगवद्भक्तिसे पापी भी शीघ्र ही पुण्यात्मा-महात्मा भी बन सकते हैं, परन्तु जिनके मनमें बुरे कर्मोंसे जरा भी ग्लानि नहीं और जो इसलिये भगवन्नाम लेते हैं कि उनके पाप ढके रहें या पाप करनेमें उन्हें सुविधा मिल जाय, उनके लिये बहुत विचारणीय बात है। यह सत्य है कि भगवन्नाममें पापनाश करनेकी शक्ति पापीके पाप करनेकी शक्तिसे कहीं अधिक है और अन्तमें उसके पापोंका नाश करके भगवन्नाम उसे तार देगा; परन्तु जान-बूझकर पाप करनेके लिये ही नाम लेना भगवद्भक्तिका आदर्श क्योंकर माना जा सकता है?
नाम-जपसे जीवनकी सफलता
और कुछ न हो सके तो उनकी कृपापर विश्वास करके उनके नामका जप, स्मरण और कीर्तन आरम्भ कर दीजिये। भगवन्नाममें महान् शक्ति है। वह बहुत शीघ्र पाप-तापका नाश करके भगवान्को मिला देता है। वस्तुत: नाम और नामी एक ही हैं। नामका प्रेम हो जानेपर तो संसारमें सर्वत्र श्रीभगवान्की ही झाँकी होने लगती है। फिर संसारमें ऊँच-नीचका कोई भेद नहीं रह जाता। हर समय और हर स्थानमें नामप्रेमी भक्त प्रेमपूर्वक भगवान्का नाम-गान करता हुआ स्वयं पवित्र होता है और जगत्को पवित्र करता है (‘भुवनं पुनाति’)। श्रीमद्भागवतमें कहा है—पृथ्वीमें जो भगवान्के जन्मकी और लीलाओंकी मंगलमयी कथाएँ प्रसिद्ध हैं, उनको सुनते रहना चाहिये और उन गुणलीलाओंका स्मरण करानेवाले नामोंका लज्जा-संकोच छोड़कर गान करते रहना चाहिये। अन्य कहीं भी आसक्ति न रखकर संसारमें विचरना चाहिये। जो इस प्रकार भगवान्के दिव्य जन्म-कर्मकी कथाओंको तथा उनके कल्याणमय नामोंको सुनने और गानेका व्रत ले लेता है, उसके हृदयमें अपने परम प्रियतम प्रभुके नाम-कीर्तनसे प्रेमका अंकुर उत्पन्न हो जाता है। उसका चित्त द्रवित हो जाता है और लोक-साधारणकी स्थितिसे ऊपर उठकर वह प्रेमकी मादकतामें कभी खिलखिलाकर हँसने लगता है और कभी फूट-फूटकर रोने लगता है। कभी ऊँचे स्वरसे भगवान्को पुकारता है तो कभी मधुर स्वरसे उनके गुणोंका गान करने लगता है और कभी-कभी आनन्दमत्त हो लोक-लाज छोड़कर नाचने लगता है।
भगवन्नामकी महिमा
मालापर नाम-जपसे डरनेकी क्या आवश्यकता है? ज्यादा नाम लेनेका अभिमान हो जायगा, इस डरसे जप न करना तो बड़ी भूलकी बात है। नाम-जप करनेसे चित्तके दुर्गुणोंका नाश होता है और सद्गुण अपने-आप आते हैं। अभिमानसे जरूर बचना चाहिये, पर भजनसे कभी नहीं हटना चाहिये। भगवान्के नामकी शक्तिपर विश्वास करके यह निश्चय करना चाहिये कि नाम-जपसे मेरे मनमें अभिमान आदि दोष कभी उत्पन्न नहीं हो सकते, वरं मेरे मनमें जो पहलेके दोष हैं, उन सबका भी नाश हो जायगा। नामका बड़ा प्रभाव है। भगवन्नामसे सारे पाप-ताप सहज ही नष्ट हो जाते हैं और श्रद्धापूर्वक नाम लेनेपर तो असम्भव भी सम्भव एवं अमंगल भी मंगलरूप बन जाते हैं।
शिवपुराणमें कहा है—
अग्निश्च शीततां यातो जलं च स्थलतां गतम्।
स्थलं च जलतां यातं विषं चामृततां गतम्॥
शस्त्राणि पुष्पभावं च हरेर्नाम्नश्च कीर्तनात्।
(विश्वेश्वरसंहिता १०।३६)
‘श्रीहरिनाम-कीर्तनसे अग्नि शीतल हो जाता है, जल स्थलरूपको प्राप्त हो जाता है, स्थल जल बन जाता है, विष अमृतमें परिणत हो जाता है और शस्त्रसमूह पुष्पके समान कोमल हो जाते हैं।’
फिर कलियुगमें तो भगवान्का नाम ही जीवके लिये एक आधार है—
है हरि-नामको आधार।
और या कलिकाल नाहिन
रह्यो विधि व्यौहार॥
नारदादि सुकादि संकर
कियो यहै विचार।
सकल श्रुति दधि मथत काढ्यो
इतोई घृतसार॥
दसहु दिसि गुन करम रोक्यो,
मीनकों ज्यों जार।
सूर हरिको सुजस गावत,
जेहि मिटे भवभार॥
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।
एक अधार राम गुन गाना॥
कलि नाम काम तरु रामको।
दलनिहार दारिद दुकाल दुख,
दोष घोर घन घामको॥
कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग।
जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग॥
इन सब वचनोंपर विश्वास करके भगवन्नामका जप अवश्य करना चाहिये। इसमें मंगल-ही-मंगल है।
भगवन्नामका महत्त्व
विशुद्ध होकर तथा सारे पापोंको छोड़कर जो भगवान्का नाम लिया जाता है, उसका तो कहना ही क्या है। हमलोगोंको यही आदर्श सामने रखना चाहिये कि भगवन्नाम लेनेपर हमारे हृदयमें पाप-संस्कारका लेश भी न रहे, परन्तु जो लोग अभी पापसे नहीं छूटे हैं; इच्छा न होनेपर भी जिनके मन-तनसे पापाचरण बन जाते हैं, वे क्या करें? उनके पाप-नाशका उपाय भी तो नाम-जप ही है। अतएव पाप-नाश होनेके बाद नाम-जप करेंगे, ऐसी धारणा ठीक नहीं। पहले नाम-जप करके पापोंका नाश कर लीजिये, फिर विशुद्ध होकर परम प्रेमपूर्वक नाम-जपका विलक्षण आनन्द लूटिये। भगवान्के नाममें विलक्षण पापनाशिनी शक्ति है। जिस किसी प्रकार भी भगवान्के नामका जीभसे स्पर्श हो जाना चाहिये, उससे पाप-नाश होते हैं।
स्कन्दपुराणमें आता है—
हास्याद् भयात् तथा क्रोधाद् द्वेषात् कामादथापि वा।
स्नेहाद्वा सकृदुच्चार्य विष्णोर्नामाघहारि च॥
(वैशाख० २१।३६)
हँसीसे, भयसे, क्रोधसे, द्वेषसे, कामसे या स्नेहसे—‘किसी भी प्रकारसे एक बार भगवान्के नामका उच्चारण पापोंका नाश करनेवाला होता है।’
जप परम साधन है
गायत्री और नामका जप करते काफी समय हो गया, सो बड़ा अच्छा है। इससे बढ़कर और है ही क्या? साधनसे कभी भी ऊबना नहीं चाहिये। ठीक रास्ता जाननेकी इच्छा लिखी सो आप इस गायत्री तथा नाम-जपको क्या बेठीक रास्ता मानते हैं? यही ठीक रास्ता है, इसीपर विश्वासपूर्वक चलते रहें। इस समय चाहे आपको इससे लाभ न दीखे, पर लाभ अवश्य हुआ है और होगा। जप चलता है, यही एक बड़ा लाभ है। जपके लाभको तो कोई रोक नहीं सकता। मनुष्यके जीवनमें उसके द्वारा भगवान्का स्मरण और जप होता रहे, यही तो करना है। भगवान्ने जो जप-यज्ञको अपना स्वरूप बतलाया है। ‘यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि।’ एकान्त मिले या न मिले, उपांशु हो या न हो—इसकी चिन्ता छोड़कर जिस तरहसे भी हो, जपका क्रम चालू रहने दें। अपने साध्य और साधनमें कभी संदेह नहीं करना चाहिये। चित्तमें नाना प्रकारके खयाल दौड़ाकर वहम न पैदा होने दें।
भगवान्के नामोंमें छोटा-बड़ा कोई नहीं
भगवान्के नामोंमें छोटा-बड़ा कोई नहीं है। जिसको जिस नाममें रुचि हो, जो प्रिय लगे वह उसीका जप-कीर्तन करे, परन्तु दूसरे किसीको भी छोटा न समझे, न किसीकी निन्दा करे। जैसे एक ही भगवान्के अनेक स्वरूप हैं, वैसे ही अनेक नाम भी हैं। भगवान् दो नहीं हैं। जो भगवान्के जिस नाम-रूपका उपासक हो, वह उसी नाम-रूपकी उपासना करे, पर यह समझे कि दूसरे जितने नाम-रूप हैं, सब मेरे ही भगवान्के हैं। जो दूसरे नाम-रूपोंको किसी दूसरे भगवान्के मानकर उनकी निन्दा करता है, वह अपने ही भगवान्को सीमित और अल्प बनाता है। श्रीकृष्णका उपासक यह माने कि श्रीराम, श्रीविष्णु, शिव, गणेश, दुर्गा, सूर्य—मुसलमानोंके अल्लाह, खुदा—ईसाइयोंके परम पिता सब मेरे श्रीकृष्णके स्वरूप हैं और उन्हींके नाम हैं। इसी प्रकार दूसरे नाम-रूपोंके उपासक भी मानें। ऐसा माननेपर न तो अनन्यतामें बाधा आती है, न सम्प्रदायके नामपर राग-द्वेष बढ़ता है और न भगवान्के नामपर भगवान्की अवज्ञा ही होती है। अतएव हम लोगोंको चाहिये कि हम अपने इष्टका नाम-जप करें और दूसरोंके इष्टको भी अपने ही इष्टका स्वरूप समझें, क्योंकि भगवान् एक ही हैं।
निःसंकोच नाम-जप कीजिये
आपने लिखा था कि भजन तो करता हूँ; पर माला न रखनेपर तो बहुत भूल हो जाती है और माला रखनेपर संकोच होता है। कुछ मित्रलोग मजाक करते हैं और कुछ लोग भक्त समझकर सम्मान करने लगते हैं। ‘अतएव क्या करूँ?’ इसके उत्तरमें निवेदन है कि यदि माला रखे बिना भूल होती है तो सारा संकोच छोड़कर अवश्य माला रखनी चाहिये। इसमें लज्जा-संकोचकी क्या बात है। मित्रलोग मजाक करते हैं तो करने दीजिये। मजाक करनेमें उनको सुख मिलता है तो आनन्दकी ही बात है। आपकी किसी क्रियासे मित्रोंका मनोरंजन हो, उन्हें सुख मिले, यह तो आपके लिये सुखकी बात है। पर कहीं ऐसा तो नहीं है कि संकोच तो आपका अपना मन ही करता हो और अपना दोष छिपानेके लिये मित्रोंके मजाककी बात गौण होनेपर भी मनने उसको प्रधानता दे दी हो, ऐसा हो तो आपको सावधान हो जाना चाहिये और मनको समझा देना चाहिये कि इसमें लज्जाकी बात तनिक भी नहीं है। लज्जा आनी चाहिये झूठ बोलनेमें, गंदी जुबान निकालनेमें, निन्दा-चुगली या व्यर्थकी बात करनेमें, किसीका अहित करनेमें, क्रोध और लोभवश होनेमें, परस्त्रीके प्रति बुरी नजरसे देखने या मनमें भी बुरा भाव लानेमें, दूसरेकी वस्तुको—किसीके स्वत्वको हरण करनेमें, चोरी, ठगी और छल-कपट करनेमें तथा दूसरे-दूसरे बुरे काम तन-मन-वचनसे करनेमें। मनुष्यका बड़ा दुर्भाग्य है कि वह इन सब कामोंके करनेमें तो तनिक भी नहीं लजाता, बल्कि कोई-कोई तो ऐसे कार्योंमें गौरवतक मानते हैं तथा गर्व करते हैं, पर भगवान्का नाम लेने या भजन करनेमें उन्हें लज्जा आती है। यही एक ऐसा श्रेष्ठ कर्म है, जिसको लज्जा छोड़कर करना श्रेष्ठ माना गया है। लज्जाको तिलांजलि देकर भजन करनेवाला प्रेमी स्वयं ही पवित्र नहीं होता, वह समस्त विश्वको पवित्र करता है।
रही सम्मान और बड़ाईसे डरनेकी बात सो यह बहुत अच्छी बात है। मनुष्यको मान-बड़ाईसे अवश्य ही डरना चाहिये। यह मीठा विष है, जो प्राप्त करनेके समय मीठा लगनेपर भी वास्तवमें सतत विषमयी मृत्युके चक्रमें डालनेवाला है, परन्तु इसके भयसे भगवन्नामकी याद दिलानेवाली मालाका त्याग कर देना बुद्धिमानी नहीं है। भगवान्के सामने आप सदा ही विनम्र और विनयशील होकर रहिये। फिर जगत्का सम्मान आपका क्या बिगाड़ेगा और भगवान्का नाम लेनेवालेको तो सदा विनम्र रहना ही चाहिये। महाप्रभु श्रीचैतन्यदेवजीने कहा है—
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीय: सदा हरि:॥
‘जो अपनेको तिनकेसे भी अधिक नीचा समझते हैं, जो वृक्षके समान सहनशील (काटने-तोड़ने और जलानेवालेका भी उपकार ही करता है ऐसा) हैं, स्वयं अमानी हैं और सबको मान देते हैं, उन्हींके द्वारा श्रीहरि सदा कीर्तनीय हैं।’
नाम-जपकी महत्ता
स्थिति लिखी सो ठीक है। सच्ची बात यह है कि डटकर भजन नहीं बनता। भजन बने बिना विषयोंकी आसक्ति-रूप अन्त:करणका दोष नष्ट नहीं होता और जबतक विषयासक्ति रहती है, तबतक मन्दिरमें बैठकर ठाकुरजीकी पूजा करनेमें भी विषय ही ठाकुरजी बने रहते हैं, इसलिये वह भगवत्पूजन न होकर प्रकारान्तरसे विषय-सेवन ही होता है। फिर दूकान-कारखाने आदिके काममें तो भगवद्बुद्धि होना बहुत कठिन है। भूलसे कभी-कभी मान लेते हैं—भगवत्-सेवन हो रहा है, परन्तु हृदयके भीतर घुसकर देखनेपर पता लगता है—शुद्ध विषय-सेवन ही है। होना चाहिये जगत्का विस्मरण होकर एकमात्र भगवान्का स्मरण, होता है भगवान्का विस्मरण होकर विषयोंका स्मरण; यही हालत है। कलियुग है, वातावरण बहुत अशुद्ध है। सभी क्षेत्रोंमें दम्भ, दुकानदारी, दिखावापन आ गया है। अतएव भजनके सिवा और कोई भी उपाय नजर नहीं आता। मन लगे, न लगे, किसी प्रकार भी यदि चौबीस घंटेमें सब मिलाकर १८ घंटे नाम-जप होता रहे तो उसके लिये चेष्टा करनी चाहिये। भक्तलोग तो आठ पहरमें साढ़े सात पहर भजन किया करते थे। श्रीचैतन्यचरितामृतमें कहा है—
साढ़े सात पहर जाय भक्तिर साधने।
चारि दण्ड विश्राम ताओ नाहें कोना दीने॥
न काम छोड़कर अलग बैठ सकते हैं, बैठनेसे भी क्या होगा? भजनका अभ्यास न होगा तो नींद, आलस्य और प्रमादमें समय बीतेगा। अब जहाँ बड़े-बड़े कामोंके लिये राग-द्वेष होते हैं, फिर छोटी-छोटी बातोंके लिये होने लगेंगे। घर बड़ा हो या छोटा—है घर ही और राग-द्वेष अपने साथ हैं ही। कहीं भी चले जायँ, कितनी ही बड़ी या छोटी-से-छोटी दुनियामें रहें, ये राग-द्वेष अपना काम करते ही रहेंगे। अतएव अभी जिस दुनियामें हैं, इसीमें रहकर नाप-जप बढ़ाना चाहिये। बस, इसके लिये लाज-शरम छोड़कर अभ्यास डालना चाहिये। मुँहसे उच्चारण होता ही रहे। नाम-जप होता रहेगा तो नामके प्रभावसे बाकी बातें आप ही हो जायँगी। न होंगी तो आपत्ति नहीं। यदि भगवान्का नाम जपते-जपते मृत्यु हो जायगी तो भी जीवन सफल ही है। अधिक क्या लिखूँ।
प्रेमसे होनेवाला नाम-जप
भगवान्में प्रेम होनेपर उनका नाम इतना प्रिय लगता है कि फिर भुलाये भी नहीं भूलता, छुड़ाये भी नहीं छूटता। भगवान्में प्रेम बढ़े। इसके लिये भगवान्से प्रार्थना कीजिये और नाम-जप किसी भी भावसे करते जाइये। जब नाममें यथार्थ रुचि हो जायगी—नामकी पूरी मिठास आ जायगी; फिर तो नाम-जप अपने-आप होगा। फिर संख्याकी जरूरत नहीं होगी। संसार-सागरसे पार होनेका उपाय तो भगवान्का सहारा ही है। भगवान्ने कहा है—‘जो मुझमें मन लगाकर मेरा भजन करते हैं, उनको संसार-सागरसे मैं स्वयं बहुत जल्दी पार कर देता हूँ।’
भजन-साधन और साध्य
राम नाम रटते रहो जब लग घटमें प्रान।
कबहूँ दीनदयाल के भनक परेगी कान॥
भजन करते-करते जब भजनका बाह्य भाव न रहकर बिलकुल आन्तरिक हो जायगा, भजनमें मन रमेगा, उसमें आनन्दकी उपलब्धि होगी, तब यथार्थ भजन होगा। एक भजन होता है साधनरूप, एक होता है साध्य। अभी साधनरूप भी पूरा नहीं हो पाया है। साधनरूप भजन करते-करते जब वह स्वाभाविक होकर अन्तरसे होने लगेगा, जब माला-नियमकी जरा भी जरूरत नहीं रहेगी, अपने-आप ही भजनमें मन लगा रहेगा, तब साध्यरूप प्राप्त होगा, फिर छूटेगा नहीं। यह स्थिति इसी जन्ममें हो सकती है।
हर समय नाम-जप कैसे हो?
‘हर समय भगवान्के नामका जप हुआ करे’ इसका उपाय पूछा सो स्वाभाविक नाम-स्मरण तो भगवान्का महत्त्व जाननेसे ही होता है। भगवान्के नामपर जितना-जितना विश्वास, प्रेम बढ़ता है, उतना-उतना ही नाम-जप अधिक हो सकता है। भगवान्के नाममें भूल होनेमें अभ्यासकी कमी ही कारण है; परन्तु प्रधान कारण तो विश्वास और प्रेमकी कमी ही समझना चाहिये। विश्वास तथा प्रेम भी भजन और सत्संगसे ही होते हैं। इसलिये सत्संग तथा नाम-जपरूपी भजनका ही विशेष अभ्यास करना चाहिये। भजन करते-करते—भगवान्के नाम-जपका अभ्यास करते-करते विश्वास बढ़कर नाम-जपमें अपने-आप ही प्रगति हो सकती है। नाम-जपमें असली उन्नति तभी समझनी चाहिये, जब नाम-जपमें भूल नहीं हो तथा एक-एक नाममें ऐसा महान् आनन्द आवे कि जिसकी तुलना सम्राट् पदकी प्राप्तिसे भी न हो सके तथा इतना प्रेम उपजे कि नाम-स्मरणके साथ ही रोमांच, अश्रुपात, गद्गदवाणी आदि होने लगे।
नाम-जप-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
प्रश्न—वर्षोंसे चेष्टामें लगा हूँ, बहुतेरे साधु-महात्माओंके दर्शन किये, तीर्थोंमें घूमे, मन्त्रोंके अनुष्ठान किये और नाना प्रकारकी साधनाएँ कीं, पर मेरा यह दुष्ट मन किसी प्रकार भी वशमें नहीं होता। शास्त्र और संत कहते हैं कि मनके वशमें हुए बिना भगवान्की प्राप्ति नहीं होती और यह बात तो निर्विवाद ही है कि भगवान्की प्राप्ति हुए बिना जीवन व्यर्थ है। मैं हताश हो गया, मेरा मन वशमें नहीं होता। क्या मेरे लिये कोई उपाय नहीं है? क्या मैं चाहता हुआ भी भगवान्को नहीं पा सकूँगा? भगवान् क्या दया करके मुझ-सरीखे चंचल-चित्तको न अपना लेंगे?
उत्तर—बात यह है, सच्ची लगन हो और दृढ़तापूर्वक अभ्यास किया जाय तो मनका वशमें होना असम्भव नहीं है। मन वशमें करनेके बहुत-से उपाय हैं और उनके द्वारा मन अवश्य ही वशमें हो भी सकता है, परंतु भैया! है यह कलियुग, जीवनमें कहीं शान्ति नहीं है। नाना प्रकारकी आधि-व्याधियोंसे मनुष्यका मन सदा घिरा रहता है। इसलिये मन वशमें करनेके साधनमें लगना है बड़ा कठिन और साधनमें लगनेपर भी नाना प्रकारके विघ्नोंके कारण लगन—सच्ची लगन और दृढ़ अभ्यासका होना भी कठिन ही है।
प्रश्न—तो क्या फिर मनुष्य-जीवनकी सफलताका कोई उपाय नहीं है?
उत्तर—है क्यों नहीं? वही तो बतला रहा हूँ। वह ऐसा सुन्दर उपाय है, जिसे ब्राह्मणसे चाण्डालतक, परम विद्वान्से वज्रमूर्खतक, स्त्री और पुरुष, सदाचारी और कदाचारी सभी सहज ही कर सकते हैं। वह उपाय है—वाणीके द्वारा भगवान्के नामका रटना। कोई किसी भी अवस्थामें हो, नाम-जप अपने स्वाभाविक गुणसे जपनेवालेका मनोरथ पूर्ण कर सकता है और उसे अन्तमें भगवान्की प्राप्ति करा देता है। और-और साधनोंमें मनके वशमें होने तथा भाव शुद्ध होनेकी आवश्यकता है। भाव (नीयत)-के अनुसार ही साधनका फल हुआ करता है। परंतु नाममें यह बात नहीं है। किसी भी भावसे नाम लिया जाय वह तो कल्याणकारी ही है।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ।
नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
इसलिये मन वशमें हो चाहे न हो। कैसा भी भाव हो, तुम विश्वास करके, जैसे बने वैसे ही—भगवान्का नाम लिये जाओ और निश्चय करो कि भगवान्के नामसे तुम्हारा अन्त:करण निर्मल हुआ जा रहा है और तुम भगवान्की ओर बढ़ रहे हो। नाम लेते रहे, ताँता न टूटा तो निश्चय ही इसीसे तुम अन्तमें भगवान्को पाकर कृतार्थ हो जाओगे।
कलिजुग सम जुग आन नहिं
जौं नर कर बिस्वास।
गाइ राम गुन गन बिमल
भव तर बिनहिं प्रयास॥
भावुकताका प्रयोग नाम-जपमें कीजिये
भगवान्के रूपमें अनुराग होनेके लिये इस बातकी बहुत आवश्यकता है कि आप यथासम्भव हर समय भगवन्नाम-जप करें। यदि हर समय न कर सकें तो नियमपूर्वक मालाओंकी गणना करते हुए ही करें। इससे मनकी मलिनता दूर होगी, भगवान्में अनुराग होगा, आत्माको शान्ति मिलेगी और उसके प्रति आपके हृदयमें जो अवैध अनुराग हुआ था उसका पाप भी निवृत्त होगा।