राम-नामका फल
दो भाई थे, पर दोनोंके स्वभावमें अन्तर था। बड़ा भाई साधु-सेवी और भगवान्के भजनमें रुचि रखनेवाला था। दान-पुण्य भी करता था। सरल हृदय था। इसलिये कभी-कभी नकली साधुओंसे ठगा भी जाता था। छोटा भाई अच्छे स्वभावका था, परन्तु व्यापारी मस्तिष्कका था। उसे साधु-सेवा, भजन और दानके नामपर ठगाया जाना अच्छा नहीं लगता था और वह यही समझता था कि ये सब ठगीके सिवा और कुछ नहीं है। अत: वह बड़े भाईके कार्योंसे सहमत नहीं था। उग्र विरोध तो नहीं करता था, पर समय-समयपर अपनी असम्मति प्रकट करता और असहयोग तो करता ही था।
बड़े भाईको इस बातका बड़ा दु:ख था कि उसका छोटा भाई मानव-जीवनके वास्तविक लक्ष्य भगवान्की प्राप्तिके साधनमें रुचि न रखकर दुनियादारीमें ही पूरा लगा हुआ है। बड़े भाईकी अच्छी नीयत थी और वह अपने छोटे भाईको भगवान्की ओर लगा देखना चाहता था। वह समय-समयपर नम्रता और युक्तियोंसे समझाता था। दूसरे अच्छे लोगोंसे भी कहलवाता, उपदेश दिलवाता था, पर छोटे भाईपर कोई प्रभाव नहीं था।
एक बार अपनी शिष्यमण्डलीसहित एक विरक्त महात्मा उनके शहरमें आये। बड़ा भाई साधुसेवी था ही। वह महात्माकी सेवामें उन्हें एक दिन भिक्षा करानेकी इच्छासे निमन्त्रण देने पहुँचा। वहाँ बात-ही-बातमें उसने अपने छोटे भाईकी स्थिति बतलायी। महात्माने पता नहीं क्या विचारकर उससे कहा कि तुम एक काम करना—जिस दिन तुम्हारा छोटा भाई घरमें रहे, उस दिन हमें भोजनके लिये बुलाना और हमलोगोंको ले जाने और लौटानेके समय एक बाजा साथ रखना। तुम्हारा छोटा भाई जो करे, उसे करने देना, शेष सारी व्यवस्था हम कर लेंगे।
महात्माके आज्ञानुसार व्यवस्था हो गयी। बजते हुए बाजेके साथ महात्मा मण्डलीसहित आ रहे थे। घरमें उस दिन ज्यादा रसोई बनते देखकर और घरके समीप ही बाजेकी आवाज सुनकर छोटे भाईको कुछ संदेह हुआ और उसने बड़े भाईसे पूछा कि ‘रसोई किसलिये बन रही है और अपने घरकी ओर बाजेके साथ कौन आ रहा है?’ बड़े भाईने कहा—‘एक पहुँचे हुए महात्मा अपनी शिष्यमण्डलीसहित यहाँ पधारे हैं और उन्हें अपने यहाँ भोजनके लिये बाजे-गाजेके साथ लाया जा रहा है। महात्मा भी पहुँचनेवाले ही हैं।’ छोटे भाईको ये सब बातें बहुत बुरी लगीं। उसने कहा—‘आप ये सब चीजें करते हैं, मुझे तो अच्छी नहीं लगतीं। आप बड़े हैं, आप जो चाहें सो करें। किन्तु मैं यह सब देख नहीं सकता। इसलिये मैं कमरेके अंदर किंवाड़ बंदकर बैठ जाता हूँ। आपके महात्मा खा-पीकर चले जायँगे, तब मैं बाहर निकलूँगा। इससे किसी प्रकारका कलह होनेसे घर बच जायगा।’ यह कहकर उसने कमरेमें जाकर अंदरसे किंवाड़ बंद कर लिये। महात्माजी आये और सारी बातोंको जानकर उन्होंने उस कमरेके बाहरकी साँकल लगा दी। भोजन सम्पन्न हुआ। तदनन्तर महात्माजीने अपनी सारी मण्डली बाजेके साथ लौटा दिया और स्वयं उस कमरेके दरवाजेके पास खड़े हो गये।
‘जब लौटते हुए बाजेकी अंदरसे आवाज सुनी, तब छोटे भाईने समझा कि अब सब लोग चले गये हैं।’ उसने अंदरकी साँकल हटाकर किंवाड़ खोलने चाहे, पर वे बाहरसे बंद थे। उसने जोर लगाया। फिर बार-बार पुकारकर कहा—‘बाहर किसने बंद कर दिया है, जल्दी खोलो।’ महात्माने किंवाड़ खोले और उसके बाहर निकलते ही बड़े जोरसे उसके हाथकी कलाईको पकड़ लिया। महात्मामें ब्रह्मचर्यका बल था। वह चेष्टा करके भी हाथ छुड़ा न सका। महात्माने हँसते हुए कहा—‘‘भैया! हाथ छुड़वाना है तो मुँहसे ‘राम’ कहो।’’ उसने आवेशमें कहा—‘मैं यह नाम नहीं लूँगा।’ महात्मा बोले—‘तो फिर हाथ नहीं छूटेगा।’ क्रोध और बलका पूरा प्रयोग करनेपर भी जब वह हाथ नहीं छुड़ा सका, तब उसने कहा—‘‘अच्छा, ‘राम’। छोड़ो हाथ जल्दी और भागो यहाँसे।’’ महात्मा मुसकराते हुए यह कहकर बाहर निकल गये कि—‘तुमने ‘राम’ कहा सो तो बड़ा अच्छा किया, पर मेरी बात याद रखना। इस ‘राम’-नामको किसी भी कीमतपर कभी बेचना नहीं।’
यह घटना तो हो गयी, पर कोई विशेष अन्तर नहीं आया। समयपर बड़े भाईकी मृत्यु हो गयी और उसके कुछ दिन बाद छोटे भाईकी भी मृत्यु हो गयी। विषयवासना और विषयकामनावाले लोग विवेकभ्रष्ट हो जाते हैं और जाने-अनजाने छोटे-बड़े पाप करते रहते हैं। पापका फल तो भोगना ही पड़ता है, मरनेके अनन्तर छोटे भाईकी आत्माको यमलोकमें ले जाया गया और वहाँ कर्मका हिसाब-किताब देखकर बताया गया कि ‘विषयवासनावश इस जीवने मनुष्ययोनिमें केवल साधु-अवज्ञा और भजनका विरोध ही नहीं किया और भी बड़े-बड़े पाप किये हैं; पर इसके द्वारा एक बड़ा भारी महान् कार्य हुआ है, इसके जीभसे एक महात्माके सम्मुख एक बार जबरदस्ती राम-नामका उच्चारण हुआ है।’
यमराजने यह सुनकर मन-ही-मन उस एक बार राम-नामका उच्चारण करनेवालेके प्रति श्रद्धा प्रकट की और कहा—‘इस राम-नामके बदलेमें जो कुछ चाहो सो ले लो। उसके बाद तुम्हें पापोंका फल भोगना पड़ेगा।’ उसको महात्माकी बात याद आ गयी। उसने यमराजसे कहा—‘‘मैं राम-नामको बेचना नहीं चाहता, पर इसका जो कुछ भी मूल्य होता हो, वह आप मुझको दे दें।’’ राम-नामका मूल्य आँकनेमें यमराज असमर्थ थे। अतएव उन्होंने कहा—देवराज इन्द्रके पास चलकर उनसे पूछना है कि ‘राम-नामका मूल्य क्या होता है। उस जीवने कहा—‘मैं यों नहीं जाता। मेरे लिये एक पालकी मँगायी जाय और उसमें कहारोंके साथ आप भी लगें।’ उसने यह सोचा कि ‘राम-नामका मूल्य जब ये नहीं बता सकते, तब अवश्य ही वह बहुत बड़ी चीज है और इसकी परीक्षा इसीसे हो जायगी कि ये पालकी ढोनेवाले कहार बनते हैं या नहीं।’ उसकी बात सुनकर यमराज सकुचाये तो सही, पर सारे पापोंका तुरंत नाश कर देनेवाले और मन-बुद्धिसे अतीत फलदाता भगवन्नामके लेनेवालेकी पालकी उठाना अपने लिये सौभाग्य समझकर वे पालकीमें लग गये।
पालकी स्वर्ग पहुँची। देवराज इन्द्रने स्वागत किया और यमराजसे सारी बात जानकर कहा—‘‘मैं भी राम-नामका मूल्य नहीं जानता। ब्रह्माजीके पास चलना चाहिये।’’ उस जीवने निवेदन किया—‘यमराजके साथ आप भी पालकीमें लगें तो मैं चलूँ।’ इन्द्रने उसकी बात मान ली और यमराजके साथ पालकीमें वे भी जुत गये। ब्रह्मलोक पहुँचे और ब्रह्माने भी राम-नामका मूल्य आँकनेमें अपनेको असमर्थ पाया और उसी जीवके कहनेसे वे भी पालकीमें जुत गये। उनकी राय भगवान् शंकरके पास जानेकी रही। इसलिये वे पालकी लेकर कैलास पहुँचे। भगवान् शंकरने ब्रह्मा, इन्द्र और यमराजको पालकी उठाये आते देखकर बड़ा आश्चर्य प्रकट किया। पूछनेपर सारी बातें उन्हें बतायी गयीं। शंकरजी बोले—‘भाई! मैं तो रात-दिन राम-नाम जपता हूँ, उसका मूल्य आँकनेकी मेरे मनमें कभी कल्पना ही नहीं आती। चलो वैकुण्ठ, ऐसे महाभाग्यवान् जीवकी पालकीमें मैं भी लगता हूँ। वैकुण्ठमें भगवान् नारायण ही कुछ बता सकेंगे।’ अब पालकीमें एक ओर यमराज और देवराज लगे हैं और दूसरी ओर ब्रह्मा और शंकर कहार बने लगे हैं। पालकी वैकुण्ठ पहुँची। चारों महान् देवताओंको पालकी उठाये आते देखकर भगवान् विष्णु हँस पड़े और पालकी वहाँ दिव्य भूमिपर रख दी गयी। भगवान्ने आदरपूर्वक सबोंको बैठाया। भगवान् विष्णुने कहा—‘आपलोग पालकीमें बैठे हुए इस महाभाग जीवात्माको उठाकर मेरी गोदमें बैठा दीजिये।’ देवताओंने वैसा ही किया। तदनन्तर भगवान् विष्णुके पूछनेपर भगवान् शंकरने कहा—‘इसने एक बार परिस्थितिसे बाध्य होकर ‘राम’-नाम लिया था। राम-नामका मूल्य इसने जानना चाहा, पर हमलोगोंमेंसे कोई भी राम-नामका मूल्य बतानेमें अपनेको समर्थ नहीं पाया। इसलिये हमलोग इस जीवके इच्छानुसार पालकीमें लगकर आपकी सेवामें उपस्थित हुए हैं। अब आप ही बताइये कि ‘राम-नामका मूल्य क्या होना चाहिये।’ भगवान् विष्णुने मुसकराते हुए कहा—‘आप-सरीखे महान् देव इसकी पालकी ढोकर यहाँतक लाये और आपलोगोंने इसे मेरी गोदमें बैठाया। अब यह मेरी गोदका नित्य अधिकारी हो गया। राम-नामका पूरा मूल्य तो नहीं बताया जा सकता, पर आप इसीसे मूल्यका कुछ अनुमान लगा सकते हैं। आपलोग अब लौट जाइये।’ भगवान् विष्णुके द्वारा लिये हुए एक बार राम-नामका इस प्रकार महान् मूल्याभास पाकर शंकरादि देवता लौट गये।
‘एक विरक्त संतने यह कथा लगभग ४५ वर्ष पूर्व कलकत्तेमें मुझको सुनायी थी। घटनाका उल्लेख किस ग्रन्थमें है, मुझको पता नहीं है, पर भगवन्नामकी महिमाका इसमें जो वर्णन आया है, वह वास्तवमें यथार्थ लगता है। घटना चाहे कल्पित हो, पर महिमा तो सत्य है ही।’
‘राम न सकहिं नाम गुन गाई।’