राम-नामके बहाने तमोगुणका आश्रय मत लीजिये

जहाँतक मेरा अनुमान है, आप राम-नामकी आड़ लेकर आलस्य और प्रमादकी तमोमयी दु:स्थितिमें पड़ गये हैं। आपको मन धोखा दे रहा है। यह सत्य है कि राम-नाम अमोघ है। यह भी सत्य है कि राम-नाम सारे तापोंके नाश करनेवाली एक दवा है; परन्तु राम-नामका विश्वासी साधक या राम-नामका आश्रय करनेवाला भक्त क्या श्रीरामकी आज्ञाका पालन नहीं करेगा? श्रुति-स्मृति तो भगवान‍्की आज्ञा ही है। जिस घरमें आप पैदा हुए हैं, जिन माता-पिताने आपको जन्म देकर तथा बड़े-बड़े दु:खोंको भोगकर पाला-पोसा और बड़ा किया है, जिस पत्नीको आप अग्निकी साक्षी देकर घर लाये हैं, उनके पालन-पोषणकी आपपर जिम्मेवारी है। इस जिम्मेवारीको निबाहनेके लिये भगवान् रामकी आज्ञा है। आप राम-नामके अर्थस्वरूप भगवान् रामकी जीवन-लीलाओंको देखिये। उन्होंने आलस्य और प्रमादको कभी आश्रय नहीं दिया। कर्तव्यका पालन ही उनका मुख्य उद्देश्य रहा। राम-नामके प्रेमी श्रीहनुमान‍्जीसे बढ़कर और कौन होंगे, पर वे चौबीसों घंटे श्रीरामकी सेवामें ही संलग्न रहते हैं। सेवाके लिये ही वे जीवन धारण करते हैं। गीतामें तो भगवान् श्रीकृष्णने निष्कामभावसे निरन्तर भगवत्सेवारूप कर्म करनेकी आज्ञा दी है। मुझे बड़ा आश्चर्य है कि आप गीता-रामायणका नाम लेकर तथा राम-नामकी बात कहकर चारपाईपर पड़े सोये रहनेका तथा विषाद एवं निराशाकी तमसाच्छन्न मानसभूमिमें विचरण करते रहनेका समर्थन करते हैं और उसके लिये मुझसे भी स्वीकृति चाहते हैं। मैं तो समझता हूँ, सोना और रोना—दोनों ही राम-नाम लेनेवालेके लिये विरोधी भाव हैं। राम-नामके सेवकको निरन्तर मनसे राम-राम जपते हुए रामकी सेवासे कब अवकाश मिलेगा कि वह बारह-बारह घंटे सोनेमें बितायेगा और राम-नामके विश्वासीको विषाद और निराशाका अवसर ही कब होगा, जब वह रोयेगा। विषाद और निराशाके दु:खसे बचनेके लिये आप बारह घंटे सोते हैं या कभी जागते हैं तो सिनेमामें चले जाते हैं। कोई भी उद्योग, परिश्रम, किसी कार्यकी खोज नहीं करते—और ‘अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम’ का उदाहरण देकर अपनेको नामविश्वासी मान रहे हैं; यह आपका बुद्धिभ्रम ही है। यदि राम-नामपर इतना विश्वास है तो फिर निराशा, विषाद और रोना क्यों? आपकी स्थिति तो यह है कि आपको सोने-रोनेसे ही फुरसत नहीं मिलती, इसलिये आप राम-नामका जप भी नहीं कर पाते; थोथी बात ही करते हैं। मैं तो कहता हूँ कि राम-नामका दिन-रात जाप करनेवालेको भी रामकी सेवा-बुद्धिसे कर्तव्य-कर्मका पालन अवश्य करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको निरन्तर अपना (भगवान् का) स्मरण करनेकी स्पष्ट आज्ञा दी, पर साथ ही युद्ध करनेका भी आदेश दिया। भगवान‍्ने कहा—

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

(गीता ८।७)

‘[अन्तकालमें मेरा स्मरण करनेवालेको मेरी (भगवान् की) प्राप्ति होती है।] इसलिये तुम सब समय निरन्तर मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। इस प्रकार मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिसे युक्त होकर तुम निस्संदेह मुझको ही प्राप्त होगे।’

‘सब धर्म छोड़कर अनन्य शरणागति’ का आदेश देकर भी भगवान‍्ने अर्जुनसे युद्धरूपी भीषण कर्म ही करवाया, उन्हें हाथमें माला लेकर एकान्तमें जप करनेकी आज्ञा नहीं दी; क्योंकि अर्जुनके लिये वही उचित था। इसलिये मोहवश कर्तव्य-कर्मका त्याग करके अपनेको भक्त या विश्वासी कहना और प्रतिकूल स्थितिका अनुभव करते हुए प्रमादालस्यमें डूबे रहना तो आत्मप्रवंचनाके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

माना, भाग्यके अनुसार ही परिणाम प्राप्त होता है, पर भाग्य—प्रारब्ध भी तो पुरुषार्थ—पूर्वकृत कर्मका ही परिणाम है न? फिर मनुष्य तो कर्मयोनि है, वह ‘पंछी’ और ‘अजगर’ की तरह भोगयोनि नहीं है। उसे तो भगवान‍्ने कर्म करनेके लिये यहाँ भेजा है, उसकी भगवदर्थ निष्काम कर्मके प्रति कभी विरक्ति नहीं होनी चाहिये। विरक्ति होनी चाहिये—कर्मफलके प्रति, रागका अभाव होना चाहिये—भोग-पदार्थोंमें।

अतएव मैं दृढ़तापूर्वक आपको सलाह देता हूँ कि—

(१) आप छ: घंटेसे अधिक मत सोया कीजिये। दिनमें तो कभी नींद मत लीजिये।

(२) चित्तको विषाद-निराशाके दु:खसे बचानेके लिये नींद लेना—यह विचार भी तामसिक है। आप निश्चय कीजिये कि भगवान‍्की कृपापर तथा उनके नामपर विश्वास करके आप उनके आज्ञानुसार कर्तव्यक्षेत्रपर डट जायँगे और आलस्य-प्रमाद छोड़कर विपत्तिके नाशका प्रयत्न करेंगे तो विषाद-निराशाका कारण ही नष्ट हो जायगा और सुख-शान्तिकी आपको प्राप्ति हो जायगी। जबतक विषाद-निराशा है, तबतक तो मंगलमय भगवान् और उनके मंगलमय विधानपर आपको विश्वास ही नहीं है।

(३) विषाद-निराशासे बचनेके लिये सिनेमामें जाकर वहाँसे दुर्विचार लेकर आते हैं, यह भी आपकी भूल है। इसका त्याग कीजिये।

(४) नींद और सिनेमा तो तमोगुणके प्रधान लक्षण आलस्य और प्रमादके मूर्तरूप हैं। इनका आश्रय त्यागकर विषाद और निराशाका नाश करनेके लिये पुरुषसिंह बनकर सत्पुरुषार्थमें लगिये। भगवान‍्की कृपाका भरोसा करने और उनके आज्ञानुसार कर्तव्य-कर्ममें लगे रहनेका व्रत ले लीजिये। विजय आपके हाथमें रहेगी। यदि प्रारब्धवश लौकिक सफलता न भी मिली, जिसकी आशंका उपर्युक्त प्रकारसे करनेपर बहुत ही कम है, तो भी आपका जीवन विषाद और निराशाके दु:खपूर्ण क्षेत्रसे तो सर्वथा पृथक् हो जायगा—इसमें जरा भी संदेह नहीं है। भगवान‍्के अन्तरंग सेवक संजयने धृतराष्ट्रसे बहुत सत्य कहा है—

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्धुवा नीतिर्मतिर्मम॥

(गीता१८।७८)

‘जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और (कर्तव्यपर डटा हुआ) गाण्डीव धनुर्धारी अर्जुन है, वहींपर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है—यह मेरा मत है।’

अतएव आप कभी यह मत समझिये कि भजन करनेवाला आलसी, प्रमादी और कर्तव्यविमुख होता है। वह तो बड़ा शूर होता है, जो भगवान‍्के अमोघ कृपाबलका भरोसा करके सारी विघ्न-बाधाओंके मस्तकपर पैर रखकर उन्हें कुचलता हुआ, उनके दुर्गम दुर्गोंको ध्वस्त और धूलिसात् करता हुआ सच्ची सफलताके मार्गमें आगे बढ़ता रहता है। वह न कभी निराश-उदास होता है और न कभी कर्तव्यच्युत होकर कायरकी तरह तामसिक जीवन बिताता है।