श्रीभगवन्नाम-चिन्तन एवं नाम-महिमाके कुछ श्लोक

भगवान‍्का नाम भगवान‍्का ही अभिन्न स्वरूप है और वह भगवान‍्की ही शक्तिसे भगवान‍्से भी अधिक शक्तिशाली और ऐश्वर्यवान् है। जैसे किसी महान् वैभवशाली सम्राट्को अपने खजानेकी असंख्य धन-राशिकी संख्याका पता नहीं रहता, इसी प्रकार नामी भगवान् भी अपने नामकी अनन्त गुणावलियोंका पता रखना नहीं चाहते। यह भी उनका एक महान् गुण है। भगवान‍्के जिस मंगलमय नामसे पंचम पुरुषार्थरूप भगवत्प्रेमकी प्राप्ति हो सकती है, उसके बदलेमें मोक्षकी चाह करना भी प्रेमियोंने कामना माना है। अतएव लोक-परलोककी किसी भी क्षुद्र-महान् कामनामें नामका प्रयोग करना एक प्रकारसे अविवेक या मूर्खता ही है। लोक-परलोकके जो भोग हैं, सभी दु:खयोनि और विनाशी हैं, ऐसे मधुर विषरूप विषयोंकी चाह करना और नामके बदलेमें उन्हें चाहना महान् मूर्खता है।

तुलसिदास ‘हरिनाम’ सुधा तजि

सठ हठि पियत बिषय बिष माँगी।

अतएव बुद्धिमान् और अपना यथार्थ कल्याण चाहनेवाले पुरुषका यही कर्तव्य है कि वह अपने जीवनको भगवन्नाममय बना दे और नामके फलस्वरूप उत्तरोत्तर बढ़ती हुई नामनिष्ठाकी ही कामना करे। यही नामका आदर है और इसी भावसे नामका सेवन भी करना चाहिये।

परंतु जबतक यह भाव जाग्रत् न हो, तबतक किसी भी भावसे किसी भी सत्कामनाको लेकर नामका आश्रय लेनेमें कोई आपत्ति नहीं है। ऐसा करना मूर्खता होनेपर भी पाप नहीं है, वरं कर्तव्य है। अवश्य ही जिसमें किसी दूसरेका जरा भी अहित होता हो और परिणाममें अपना भी अहित होता हो, ऐसे किसी कार्यकी सिद्धिके लिये भगवान‍्के नामका प्रयोग कभी नहीं करना चाहिये।

जबतक भगवान‍्के नाममें ‘रति’ न पैदा हो जाय, तबतक ‘रुचि’ के साथ भगवान‍्का नाम लेना चाहिये, जबतक रुचि न पैदा हो तबतक भगवान‍्के नामका ‘अभ्यास’ करना चाहिये और अभ्यासकी दृढ़ता न होनेतक ‘अमोघ औषध’ के रूपमें भगवान‍्का नाम लेना चाहिये। भगवान‍्का नाम नित्य मधुर और दिव्य अमृतरूप है। उदाहरणके लिये मिश्री मीठी होनेपर भी पित्तके रोगीकी जीभ कड़वी होनेके कारण मिश्री कड़वी लगती है; परंतु मिश्री पित्त-नाशकी दवा है। मिश्रीके सेवनसे पित्तका शमन होनेपर जब जीभका कड़वापन मिट जाता है, तब मिश्री मीठी लगने लगती है; क्योंकि वह मीठी ही है। इसी प्रकार पूर्वसंचित कर्म-मलके कारण हमारी दूषित वृत्ति जबतक भगवान‍्के नामके माधुर्यका अनुभव नहीं करती, बल्कि उसे कड़वा समझती है, तबतक दवाके रूपमें जबरदस्ती उसे लेते रहना चाहिये। लेते-लेते कर्म-मलका शमन होते ही भगवान‍्की सहज नाम-माधुरीका स्वाद आने लगेगा।

परंतु यह स्मरण रखना चाहिये कि नामका आश्रय कलियुगमें सबसे बड़ा आश्रय है। इस एक ही आश्रयसे सर्वांगीण पूर्ण सफलता प्राप्त हो सकती है। अतएव नित्य-निरन्तर नामका सेवन करना चाहिये और जहाँतक बने नामका सेवन ‘नाम-प्रेमकी वृद्धि’ के लिये ही करना चाहिये; किसी भी लौकिक-पारलौकिक इच्छाकी पूर्तिके लिये नहीं। नामका फल अचिन्त्य और अमूल्य है। उनकी वास्तविकतापर ध्यान न देकर उसमें भरे वास्तविक सत्यको ग्रहण करना चाहिये।

नामका जप मानसिक, उपांशु और वाचिक—तीनों तरहसे हो सकता है। नाम-जपमें जितनी सूक्ष्मता हो, उतना ही वह श्रेष्ठ है। पर नाम-कीर्तनमें जितना ही वाणीका स्पष्ट उच्चारण और उद्घोष हो, उतना ही श्रेष्ठ है। अपनी-अपनी स्थिति और रुचिके अनुसार जप-कीर्तन करना चाहिये।

भगवान‍्के सभी नाम समान महत्त्व रखते हैं, किसी भी नाममें ऊँच-नीचका भाव न रखकर अपने लिये जो भी नाम विशेष प्रीतिकर और रुचिकर जान पड़े, उसीका जप-कीर्तन करना चाहिये।

सर्वेषां भगवन्नाम्नां समानो महिमापि चेत्।

तथापि स्वप्रियाणां तु स्वार्थसिद्धि: सुखं भवेत्॥

विभिन्नरुचिलोकानां क्रमात् सर्वेषु नामसु।

प्रियता सम्भवेत् तानि सर्वाणि स्यु: प्रियाणि हि॥

‘यद्यपि समस्त भगवन्नामोंकी महिमा समान ही है, तथापि जो नाम अपनेको प्रिय है, उनके कीर्तनसे अनायास ही अपने अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो जाती है। विभिन्न रुचिवाले लोगोंका क्रमश: सभी नामोंमें प्रेम सम्भव हो जाता है। फिर वे सभी नाम उन्हें प्रिय हो जाते हैं।’

अतएव भगवान‍्के जिस नाम या जिन नामोंमें अपना मन लगता हो, उसीका जप करे; परंतु नाम-जप करनेवालोंके लिये यह परमावश्यक है कि वे प्रतिदिन नियमपूर्वक अधिक-से-अधिक संख्यामें नाम-जप अवश्य करें। इस नियमित जपके अतिरिक्त दिन-रात बिना संख्याके नाम-जप होता रहे, इसके लिये सावधानीके साथ प्रयत्नशील रहें। नियमित संख्याके नाम-जपका दृढ़ नियम होनेसे उतना जप तो प्रतिदिन पूरा हो ही जायगा; नहीं तो, नियम न रहनेपर किसी भी आवश्यक-अनावश्यक कार्यमें समय लग जायगा और जो सबसे पहले करनेयोग्य तथा सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण कर्तव्य एवं जीवनमें अत्यावश्यक कार्य है, वह ‘नाम-जप’ छूट जायगा। मन धोखा देकर समझा देगा कि ‘नियम थोड़े ही है, यह बहुत जरूरी काम है, इसे कर लेना चाहिये।’ फिर व्यर्थकी बातचीत भी जरूरी काम हो जायगी। परंतु बड़ा नियम होनेपर उतना समय नाम-जपमें अवश्य लगेगा और नाम-जप होनेसे भगवान‍्के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध—कम-से-कम एक अंग जीभका तो बना ही रहेगा। उतने समयतक वाणीका केवल संयम ही नहीं होगा, वाणीका यथार्थ सदुपयोग होगा; क्योंकि वाणीका सदुपयोग भगवान‍्के नाम-गुण-गानमें ही है। उतने समयतक प्रमादवश होनेवाले मिथ्या भाषण, पर-निन्दासे रक्षा होगी—कम-से-कम व्यर्थ भाषणसे जीभकी रक्षा होगी। प्रमादयुक्त वाणीके कारण होनेवाले दुष्परिणामोंसे बचाव होगा और नाम-जपरूप सबसे महान् लाभ प्राप्त होगा। लगातार नियमित जप होनेसे वाणीका वैसा अभ्यास हो जायगा, जिससे वाणी सहज ही अपने-आप नाम-जप करती रहेगी और इससे फिर मन भी लग जायगा। तुलसीदासजी कहते हैं—

सकल अंग पद बिमुख नाथ!

मुख नामकी ओट लई है।

‘मेरे सारे अंग आपके चरणोंसे विमुख हैं, केवल मुखने (जीभने) नामकी ओट ले रखी है।’ स्वामी श्रीहरिदासजी नियमित तीन लाख नाम-जप प्रतिदिन करते थे, इससे उनको डिगानेके लिये आयी हुई वेश्या उनका तो कुछ बिगाड़ कर ही नहीं सकी, स्वयं उसीका उद्धार हो गया। स्वर्गीय पं० श्रीमोतीलालजी नेहरूके द्वारा पूर्वाभ्यासवश मृत्युके कुछ पहलेसे ही गायत्री-जप होने लगा था। इसी प्रकार पूर्वाभ्यासवश विश्वकवि श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुरके पिता श्रीद्विजेन्द्रनाथ ठाकुर बाह्य चेतनाशून्य अवस्थामें आसन लगाकर बैठ गये थे और गायत्री-जप करने लगे थे। नामका अभ्यास होनेपर अन्तकालमें भगवान‍्का नाम आ जाता है और अन्तकालकी स्थितिके अनुसार उसे सहज ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है। अतएव प्रतिदिन नियमित संख्यामें नाम-जप अवश्य करना चाहिये। किया जाय तो आसानीसे एक लाख नाम-जप प्रतिदिन हो सकता है। मनुष्य दिनभर बोलता नहीं है, उसकी जीभ अधिकांश समय खाली रहती है। वह यदि चाहे और स्मरण रखे तो आसानीसे दिनभरमें चलते-फिरते एक लाख नाम-जप कर सकता है। नहीं तो २१,६०० की संख्या पूरी कर ही लेनी चाहिये। दिनभरमें औसत इतने श्वास आते हैं, अतएव इतना जप होनेपर प्रतिश्वास एक नामका जप हो जायगा।

यहाँ भगवन्नाम-महिमाके कुछ श्लोक दिये जा रहे हैं—

कलियुगमें नाम की विशेषता

कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुण:।

कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंग: परं व्रजेत्॥

(श्रीमद्भागवत)

‘राजन्! दोषोंके भंडार कलियुगमें यही एक महान् गुण है कि इस समय श्रीकृष्णका कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यकी सारी आसक्तियाँ छूट जाती हैं और वह परमपदको प्राप्त हो जाता है।’

यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते क्रतुशतैरपि।

फलं प्राप्नोत्यविकलं कलौ गोविन्दकीर्तनात्॥

(श्रीविष्णुरहस्य)

‘सत्ययुगमें भक्ति-भावसे सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भी श्रीहरिकी आराधना करके मनुष्य जिस फलको पाता है, वह सारा-का-सारा कलियुगमें भगवान् गोविन्दका कीर्तनमात्र करके प्राप्त कर लेता है।’

ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्।

यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्॥

(विष्णुपुराण)

‘सत्ययुगमें भगवान‍्का ध्यान, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन और द्वापरमें उनका पूजन करके मनुष्य जिस फलको पाता है, उसे वह कलियुगमें केशवका कीर्तनमात्र करके प्राप्त कर लेता है।’

कृते यद्‍ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखै:।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्॥

(श्रीमद्भागवत)

‘सत्ययुगमें भगवान् विष्णुका ध्यान करनेवालेको, त्रेतामें यज्ञोंद्वारा यजन करनेवालेको तथा द्वापरमें श्रीहरिकी परिचर्यामें तत्पर रहनेवालेको जो फल मिलता है, वही कलियुगमें श्रीहरिका कीर्तनमात्र करनेसे प्राप्त हो जाता है।’

हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम्।

कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥

‘श्रीहरिका नाम ही, नाम ही, नाम ही मेरा जीवन है। कलियुगमें इसके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है।’

ते सभाग्या मनुष्येषु कृतार्था नृप निश्चितम्।

स्मरन्ति ये स्मारयन्ति हरेर्नाम कलौ युगे॥

‘नरेश्वर! मनुष्योंमें वे ही सौभाग्यशाली तथा निश्चय ही कृतार्थ हैं, जो कलियुगमें हरिनामका स्वयं स्मरण करते हैं और दूसरोंको भी स्मरण कराते हैं।’

कलिकालकुसर्पस्य तीक्ष्णदंष्ट्रस्य मा भयम्।

गोविन्दनामदावेन दग्धो यास्यति भस्मताम्॥

(स्कन्दपुराण)

‘तीखी दाढ़वाले कलिकालरूपी दुष्ट सर्पका भय अब दूर हो जाना चाहिये, क्योंकि गोविन्द-नामके दावानलसे दग्ध होकर वह शीघ्र ही राखका ढेर बन जायगा।’

हरिनामपरा ये च घोरे कलियुगे नरा:।

त एव कृतकृत्याश्च न कलिर्बाधते हि तान्॥

‘घोर कलियुगमें जो मनुष्य हरिनामकी शरण ले चुके हैं, वे ही कृतकृत्य हैं। कलि उन्हें बाधा नहीं देता।’

हरे केशव गोविन्द वासुदेव जगन्मय।

इतीरयन्ति ये नित्यं न हि तान् बाधते कलि:॥

(बृहन्नारदीय०)

‘हरे! केशव! गोविन्द! वासुदेव! जगन्मय!—इस प्रकार जो नित्य उच्चारण करते हैं, उन्हें कलियुग कष्ट नहीं देता।’

येऽहर्निशं जगद्धातुर्वासुदेवस्य कीर्तनम्।

कुर्वन्ति तान् नरव्याघ्र न कलिर्बाधते नरान्॥

(विष्णुधर्मोत्तर)

‘नरश्रेष्ठ! जो लोग दिन-रात जगदाधार वासुदेवका कीर्तन करते हैं, उन्हें कलियुग नहीं सताता।’

ते धन्यास्ते कृतार्थाश्च तैरेव सुकृतं कृतम्।

तैराप्तं जन्मन: प्राप्यं ये कलौ कीर्तयन्ति माम्॥

(भगवान् कहते हैं—) ‘जो कलियुगमें मेरा कीर्तन करते हैं, वे धन्य हैं, वे कृतार्थ हैं, उन्होंने ही पुण्य-कर्म किया है तथा उन्होंने ही जन्म और जीवनका पानेयोग्य फल पाया है।’

सकृदुच्चारयन्त्येतद् दुर्लभं चाकृतात्मनाम्।

कलौ युगे हरेर्नाम ते कृतार्था न संशय:॥

‘जो कलियुगमें अपुण्यात्माओंके लिये दुर्लभ इस हरिनामका एक बार भी उच्चारण कर लेते हैं, वे कृतार्थ हैं—इसमें संशय नहीं है।’

नामसे सर्वपाप-नाश

पापानलस्य दीप्तस्य मा कुर्वन्तु भयं नरा:।

गोविन्दनाममेघौघैर्नश्यते नीरबिन्दुभि:॥

(गरुडपुराण)

‘लोग प्रज्वलित पापाग्निसे भय न करें; क्योंकि वह गोविन्द-नामरूपी मेघसमूहोंके जल-बिन्दुओंसे नष्ट हो जाती है।’

अवशेनापि यन्नाम्नि कीर्तिते सर्वपातकै:।

पुमान् विमुच्यते सद्य: सिंहत्रस्तैर्मृगैरिव॥

‘विवश होकर भी भगवान‍्के नामका कीर्तन करनेपर मनुष्य समस्त पातकोंसे उसी प्रकार मुक्त हो जाता है, जैसे सिंहसे डरे हुए भेड़िये अपने शिकारको छोड़कर भाग जाते हैं।’

यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलीयनमनुत्तमम्।

मैत्रेयाशेषपापानां धातूनामिव पावक:॥

‘हे मैत्रेय! भक्तिपूर्वक किया गया भगवन्नाम-कीर्तन उसी प्रकार समस्त पापोंको विलीन कर देनेवाला सर्वोत्तम साधन है, जैसे धातुओंकी सारे मैलको जला डालनेके लिये आग।’

सायं प्रातस्तथा कृत्वा देवदेवस्य कीर्तनम्।

सर्वपापविनिर्मुक्त: स्वर्गलोके महीयते॥

‘मनुष्य सायं और प्रात:काल देवाधिदेव श्रीहरिका कीर्तन करके सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है।’

नारायणो नाम नरो नराणां

प्रसिद्धचौर: कथित: पृथिव्याम्।

अनेकजन्मार्जितपापसंचयं

हरत्यशेषं श्रुतमात्र एव॥

(वामनपुराण)

‘इस पृथ्वीपर नारायण नामक एक नर (व्यक्ति) प्रसिद्ध चोर बताया गया है, जिसका नाम एवं यश कर्ण-कुहरोंमें प्रवेश करते ही मनुष्योंकी अनेक जन्मोंकी कमाई हुई समस्त पापराशिको हर लेता है।’

गोविन्देति तथा प्रोक्तं भक्त्या वा भक्तिवर्जितै:।

दहते सर्वपापानि युगान्ताग्निरिवोत्थित:॥

(स्कन्दपुराण)

‘मनुष्य भक्तिभावसे या भक्तिरहित होकर यदि गोविन्द-नामका उच्चारण कर ले तो वह नाम सम्पूर्ण पापोंको उसी प्रकार दग्ध कर देता है, जैसे युगान्तकालमें प्रज्वलित हुई प्रलयाग्नि सारे जगत‍्को जला डालती है।’

गोविन्दनाम्ना य: कश्चिन्नरो भवति भूतले।

कीर्तनादेव तस्यापि पापं याति सहस्रधा॥

‘भूतलपर जो कोई भी मनुष्य गोविन्द-नामसे प्रसिद्ध होता है,उसके भी उस नामका कीर्तन करनेसे ही पापके सहस्रों टुकड़े हो जाते हैं।’

प्रमादादपि संस्पृष्टो यथानलकणो दहेत्।

तथौष्ठपुटसंस्पृष्टं हरिनाम दहेदघम्॥

‘जैसे असावधानीसे भी छू ली गयी आगकी कणिका उस अंगको जला देती है, उसी प्रकार यदि हरिनामका ओष्ठपुटसे स्पर्श हो जाय तो वह पापको जलाकर भस्म कर देता है।’

अनिच्छयापि दहति स्पृष्टो हुतवहो यथा।

तथा दहति गोविन्दनाम व्याजादपीरितम्॥

(पद्मपुराण)

‘जैसे अनिच्छासे भी स्पर्श कर लेनेपर आग शरीरको जला देती है, उसी प्रकार किसी बहानेसे भी लिया गया गोविन्द-नाम पापको दग्ध कर देता है।’

नराणां विषयान्धानां ममताकुलचेतसाम्।

एकमेव हरेर्नाम सर्वपापविनाशनम्॥

(बृहन्नारदीय०)

‘ममतासे व्याकुलचित्त हुए विषयान्ध मनुष्योंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला एकमात्र हरिनाम ही है।’

कीर्तनादेव कृष्णस्य विष्णोरमिततेजस:।

दुरितानि विलीयन्ते तमांसीव दिनोदये॥

(पद्मपुराण)

‘अमित तेजस्वी सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्णके कीर्तनमात्रसे समस्त पाप उसी तरह विलीन हो जाते हैं, जैसे दिन निकल आनेपर अन्धकार।’

साङ्केत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा।

वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदु:॥

(श्रीमद्भागवत)

‘संकेत, परिहास, स्तोभ* या अनादरपूर्वक भी किया हुआ भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन सम्पूर्ण पापोंका नाशक है—ऐसा महात्मालोग जानते हैं।’

अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तमश्लोकनाम यत्।

संकीर्तितमघं पुंसो दहेदेधो यथानल:॥

‘जैसे अग्नि लकड़ीको जला देती है, उसी प्रकार जाने-अनजाने लिया गया भगवान् पुण्यश्लोकका नाम पुरुषकी पापराशिको भस्म कर देता है।’

नाम्नोऽस्य यावती शक्ति: पापनिर्हरणे हरे:।

तावत्कर्त्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जन:॥

(बृहद्विष्णुपुराण)

‘श्रीहरिके इस नाममें पापनाश करनेकी जितनी शक्ति है, उतना पातक पातकी मनुष्य अपने जीवनमें कर ही नहीं सकता।’

श्वादोऽपि नहि शक्नोति कर्तुं पापानि मानत:।

तावन्ति यावती शक्तिर्विष्णुनाम्नोऽशुभक्षये॥

‘भगवान् विष्णुके नाममें पापक्षय करनेकी जितनी शक्ति विद्यमान है, माप-तौलमें उतने पाप कुक्‍कुरभोजी चाण्डाल भी नहीं कर सकता।’

नामसे रोग-उत्पात-भूत-व्याधि आदिका नाश

अच्युतानन्तगोविन्दनामोच्चारणभेषजात्।

नश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्॥

‘अच्युत, अनन्त, गोविन्द—इन नामोंके उच्चारणरूपी औषधसे समस्त रोग नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ।’

न साम्ब व्याधिजं दु:खं हेयं नान्यौषधैरपि।

हरिनामौषधं पीत्वा व्याधिस्त्याज्यो न संशय:॥

‘हे साम्ब! व्याधिजनित दु:ख स्वत: छूटनेयोग्य नहीं है, इसे दूसरी ओषधियोंद्वारा भी सहसा नहीं दूर किया जा सकता, परंतु हरिनामरूपी औषधका पान करनेसे समस्त व्याधियोंका निवारण हो जाता है, इसमें संशय नहीं है।’

आधयो व्याधयो यस्य स्मरणान्नामकीर्तनात्।

तदैव विलयं यान्ति तमनन्तं नमाम्यहम्॥

‘जिनके स्मरण और नामकीर्तनसे सम्पूर्ण आधियाँ (मानसिक चिन्ताएँ) और व्याधियाँ तत्काल नष्ट हो जाती हैं, उन भगवान् अनन्तको मैं नमस्कार करता हूँ।’

मायाव्याधिसमाच्छन्नो राजव्याध्युपपीडित:।

नारायणेति संकीर्त्य निरातंको भवेन्नर:॥

‘जो मायामय व्याधिसे आच्छादित तथा राजरोगसे पीड़ित है, वह मनुष्य नारायण—इस नामका संकीर्तन करके निर्भय हो जाता है।’

सर्वरोगोपशमनं सर्वोपद्रवनाशनम्।

शान्तिदं सर्वरिष्टानां हरेर्नामानुकीर्तनम्॥

‘श्रीहरिके नामका बारम्बार कीर्तन समस्त रोगोंको शान्त करनेवाला, सारे उपद्रवोंका नाशक और सम्पूर्ण अरिष्टोंकी शान्ति करनेवाला है।’

संकीर्त्यमानो भगवाननन्त:

श्रुतानुभावो व्यसनं हि पुंसाम्।

प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषं

यथा तमोऽर्कोऽभ्रमिवातिवात:॥

‘जिनकी महिमा सर्वत्र विश्रुत (प्रसिद्ध) है, उन भगवान् अनन्तका जब कीर्तन किया जाता है, तब वे उन कीर्तनपरायण भक्तजनोंके चित्तमें प्रविष्ट हो उनके सारे संकटको उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे सूर्य अन्धकारको और आँधी बादलोंको।’

आर्ता विषण्णा: शिथिलाश्च भीता

घोरेषु च व्याधिषु वर्तमाना:।

संकीर्त्य नारायणशब्दमेकं

विमुक्तदु:खा: सुखिनो भवन्ति॥

‘पीड़ित, विषादग्रस्त, शिथिल, भयभीत तथा भयानक रोगोंमें पड़े हुए मनुष्य भी एकमात्र नारायण-नामका कीर्तन करके समस्त दु:खोंसे छूटकर सुखी हो जाते हैं।’

कीर्तनादेव देवस्य विष्णोरमिततेजस:।

यक्षराक्षसवेतालभूतप्रेतविनायका:॥

डाकिन्यो विद्रवन्ति स्म ये तथान्ये च हिंसका:।

सर्वानर्थहरं तस्य नामसंकीर्तनं स्मृतम्॥

नामसंकीर्तनं कृत्वा क्षुत्तृट्प्रस्खलितादिषु।

वियोगं शीघ्रमाप्नोति सर्वानर्थैर्न संशय:॥

‘अमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके कीर्तनसे ही यक्ष, राक्षस, भूत, वेताल, प्रेत, विनायक (विघ्न), डाकिनी-गण तथा अन्य भी जो हिंसक भूतगण हैं, वे सब भाग जाते हैं। भगवान‍्का नाम-संकीर्तन सम्पूर्ण अनर्थोंका नाशक कहा गया है। भूख-प्यासमें तथा गिरने, लड़खड़ाने आदिके समय भगवन्नाम-संकीर्तन करके मनुष्य सारे अनर्थोंसे छुटकारा पा जाता है—इसमें संशय नहीं है।’

मोहानलोल्लसज्ज्वालाज्वलल्लोकेषु सर्वदा।

यन्नामाम्भोधरच्छायां प्रविष्टो नैव दह्यते॥

‘मोहाग्निकी धधकती हुई ज्वालाओंसे सदा जलते हुए लोकोंमें जो भगवन्नामरूपी जलधरकी छायामें प्रविष्ट होता है, वह कभी नहीं दग्ध होता।’

नामसे प्रारब्धकर्म-नाश

नात: परं कर्मनिबन्धकृन्तनं

मुमुक्षतां तीर्थपदानुकीर्तनात्।

न यत् पुन: कर्मसु सज्जते मनो

रजस्तमोभ्यां कलिलं ततोऽन्यथा॥

(श्रीमद्भागवत)

‘जो लोग इस संसार-बन्धनसे मुक्त होना चाहते हैं, उनके लिये तीर्थपाद भगवान‍्के नामसे बढ़कर और कोई साधन ऐसा नहीं है, जो कर्मबन्धनकी जड़ काट सके; क्योंकि नामका आश्रय लेनेसे मनुष्यका मन फिर सकाम कर्मोंमें आसक्त नहीं होता। भगवन्नामके अतिरिक्त दूसरे किसी प्रायश्चित्तका आश्रय लेनेपर मन रजोगुण और तमोगुणसे ग्रस्त ही रहता है तथा उसके पापोंका भी पूर्णत: नाश नहीं हो पाता।’

यन्नामधेयं म्रियमाण आतुर:

पतन् स्मरन् वा विवशो गृणन् पुमान्।

विमुक्तकर्मार्गल उत्तमां गतिं

प्राप्नोति यक्ष्यन्ति न तं कलौ जना:॥

(श्रीमद्भागवत)

‘मरणोन्मुख रोगी तथा गिरता या किसीका स्मरण करता हुआ मनुष्य विवश होकर भी जिन भगवान‍्के नामका उच्चारण करके कर्मोंकी साँकलसे छुटकारा पा उत्तम गतिको प्राप्त कर लेता है, उन्हीं भगवान‍्का कलियुगके मनुष्य पूजन नहीं करेंगे (यह कितने कष्टकी बात है)।’

नामसे मुक्ति और परमधामकी प्राप्ति

इष्टापूर्तानि कर्माणि सुबहूनि कृतान्यपि।

भवे हेतूनि तान्येव हरेर्नाम तु मुक्तिदम्॥

(बोधायनसंहिता)

‘इष्ट (यज्ञ-यागादि) और आपूर्त (कूप-वाटिका-निर्माण आदि) कर्म कितनी ही अधिक संख्यामें क्यों न किये जायँ, वे ही भव-बन्धनके कारण बनते हैं। परंतु श्रीहरिका नाम लिया जाय तो वह भव-बन्धनसे छुटकारा दिलानेवाला होता है।’

किं करिष्यसि सांख्येन किं योगैर्नरनायक।

मुक्तिमिच्छसि राजेन्द्र कुरु गोविन्दकीर्तनम्॥

(गरुडपुराण)

‘नरेन्द्र! सांख्य और योगका अनुष्ठान करके क्या करोगे? राजेन्द्र! यदि मुक्ति चाहते हो तो गोविन्दका कीर्तन करो।’

सकृदुच्चारितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम्।

बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥

(स्कन्दपुराण)

‘जिसने एक बार भी ‘हरि’ इन दो अक्षरोंका उच्चारण कर लिया, उसने मोक्षतक पहुँचनेके लिये कमर कस ली।’

अप्यन्यचित्तोऽशुद्धो वा य: सदा कीर्तयेद्धरिम्।

सोऽपि दोषक्षयान्मुक्तिं लभेच्चेदिपतिर्यथा॥

(ब्रह्मपुराण)

‘जो अन्यमनस्क तथा अशुद्ध रहकर भी सदा हरि-नामका कीर्तन करता है, वह भी अपने दोषोंका नाश हो जानेके कारण उसी तरह मोक्ष प्राप्त कर लेता है, जैसे चेदिराज शिशुपालने प्राप्त किया था।’

सकृदुच्चारयेद् यस्तु नारायणमतन्द्रित:।

शुद्धान्त:करणो भूत्वा निर्वाणमधिगच्छति॥

(पद्मपुराण)

‘जो आलस्य छोड़कर एक बार नारायण-नामका उच्चारण कर लेता है, उसका अन्त:करण शुद्ध हो जाता है और वह निर्वाण पदको प्राप्त होता है।’

यथा कथञ्चिद् यन्नाम्नि कीर्तिते वा श्रुतेऽपि वा।

पापिनोऽपि विशुद्धा: स्यु: शुद्धा मोक्षमवाप्नुयु:॥

(बृहन्नारदीय०)

‘भगवान‍्के नामका जिस किसी तरह भी उच्चारण या श्रवण कर लेनेपर पापी भी विशुद्ध हो जाते हैं और शुद्ध पुरुष मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं।’

नव्यं नव्यं नामधेयं पुरारे-

र्यद्यच्चैतद् गेयपीयूषपुष्टम्।

ये गायन्ति त्यक्तलज्जा: सहर्षं

जीवन्मुक्ता: संशयो नास्ति तत्र॥

(नारदपुराण)

‘पुरारि (या मुरारि)-का जो नया-नया नाम है और जो इनके गुणगान-रूपी अमृतसे पुष्ट हुआ है, उसका जो लोग लज्जा छोड़कर हर्षोल्लासके साथ गान करते हैं, वे जीवन्मुक्त हैं—इसमें संशय नहीं है।’

आपन्न: संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन्।

तत: सद्यो विमुच्येत यद्विभेति स्वयं भयम्॥

(श्रीमद्भागवत)

‘घोर संसार-बन्धनमें पड़ा हुआ मनुष्य विवश होकर भी यदि भगवन्नामका उच्चारण करता है तो वह तत्काल उस बन्धनसे मुक्त हो जाता है और उस पदको प्राप्त होता है, जिससे भय स्वयं भय मानता है।’

एतावतालमघनिर्हरणाय पुंसां

संकीर्तनं भगवतो गुणकर्मनाम्नाम्।

विक्रुश्य पुत्रमघवान् यदजामिलोऽपि

नारायणेति म्रियमाण इयाय मुक्तिम्॥

(श्रीमद्भागवत)

‘मनुष्योंके पापका नाश करनेके लिये इतने बड़े साधनकी आवश्यकता नहीं कि भगवान‍्के गुण, कर्म और नामोंका कीर्तन किया जाय; क्योंकि अजामिल-जैसा पापी भी मरते समय ‘नारायण’ शब्दसे अपने पुत्रको पुकारकर मुक्ति पा गया।’

यन्नामस्मरणादेव पापिनामपि सत्वरम्।

मुक्तिर्भवति जन्तूनां ब्रह्मादीनां सुदुर्लभा॥

(पद्मपुराण, उत्तरखण्ड)

‘उन भगवान‍्के नामका स्मरण करते ही पापी जीवोंको भी तत्काल ऐसी मुक्ति सुलभ हो जाती है, जो ब्रह्मा आदि देवताओंके लिये भी परम दुर्लभ है।’

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्।

विष्णुलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥

(बृहन्नारदीय०)

‘जिसकी जिह्वाके अग्रभागपर ‘हरि’ ये दो अक्षर विद्यमान हैं, वह पुनरावृत्तिरहित विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है।’

तदेव पुण्यं परमं पवित्रं

गोविन्दगेहे गमनाय पत्रम् ।

तदेव लोके सुकृतैकसत्रं

यदुच्यते केशवनाममात्रम्॥

(पद्मपुराण)

‘भगवान् केशवके नाममात्रका जो उच्चारण किया जाता है, वही परम पवित्र पुण्यकर्म है। वही गोविन्दगेह (गोलोकधाम)-में जानेके लिये वाहन है और वही इस लोकमें सुकृतका एकमात्र सत्र है।’

एवं संग्रहणीपुत्राभिधानव्याजतो हरिम्।

समुच्चार्यान्तकालेऽगाद् धाम तत्परमं हरे:॥

(ब्रह्मवैवर्त०)

‘इस प्रकार अन्तकालमें अपने अधर्मज पुत्रके नामके बहाने हरिका उच्चारण करके वह श्रीहरिके परमधाममें जा पहुँचा।’

नारायणमिति व्याजादुच्चार्य कलुषाश्रय:।

अजामिलोऽप्यगाद् धाम किमुत श्रद्धया गृणन्॥

(ब्रह्मवैवर्त०)

‘पुत्रके बहाने नारायण—इस नामका उच्चारण करके पापका भण्डार अजामिल भी भगवद्धाममें चला गया। फिर जो श्रद्धापूर्वक भगवान‍्का नाम लेता है, उसकी मुक्तिके लिये तो कहना ही क्या है।’

ये कीर्तयन्ति वरदं वरपद्मनाभं

शङ्खाब्जचक्रशरचापगदासिहस्तम्।

पद्मालयावदनपंकजषट्पदाक्षं

नूनं प्रयान्ति सदनं मधुघातिनस्ते॥

(वामनपुराण)

‘जो लोग शंख, चक्र, गदा, पद्म, बाण-धनुष और खड्ग धारण करनेवाले, लक्ष्मीके मुखारविन्दका मकरन्द पीनेके लिये भ्रमररूप नेत्रवाले वरदायक एवं श्रेष्ठ भगवान् पद्मनाभका कीर्तन करते हैं, वे अवश्य उन मधुसूदनके धाममें जाते हैं।’

वासुदेवेति मनुज उच्चार्य भवभीतित:।

तन्मुक्त: पदमाप्नोति विष्णोरेव न संशय:॥

(अंगिरसपुराण)

‘जो मनुष्य संसारभयसे भीत हो ‘वासुदेव’ इस नामका उच्चारण करता है, वह उस भयसे मुक्त हो भगवान् विष्णुके ही पदको प्राप्त होता है—इसमें संशय नहीं है।’

नामसे सब त्रुटियोंकी पूर्णता

मन्त्रतस्तन्त्रतश्छिद्रं देशकालार्हवस्तुत:।

सर्वं करोति निश्छिद्रं नामसंकीर्तनं तव॥

(श्रीमद्भागवत)

‘मन्त्र, तन्त्र (विधि), देश, काल, पात्र और द्रव्य आदिकी दृष्टिसे भी छिद्र (न्यूनता)-को प्राप्त हुए कर्मोंको आप (भगवान्)-का कीर्तन त्रुटिरहित (परिपूर्ण) कर देता है।’

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।

न्यूनं सम्पूर्णतामेति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥

(स्कन्दपुराण)

‘जिनके स्मरण तथा नामोच्चारणसे तप तथा यज्ञादि कर्मोंमें तत्काल न्यूनताकी पूर्ति हो जाती है, उन भगवान् अच्युतको मैं नमस्कार करता हूँ।’

नामसे भगवान‍्का वशमें होना

ऋणमेतत् प्रवृद्धं मे हृदयान्नापसर्पति।

यद् गोविन्देति चुक्रोश कृष्णा मां दूरवासिनम्॥

(महाभारत)

‘द्रुपदकुमारी कृष्णाने कौरवसभामें वस्त्र खींचे जाते समय जो मुझ दूरवासी (द्वारकानिवासी) श्रीकृष्णको ‘गोविन्द’ कहकर पुकारा था, उसका यह ऋण मुझपर बहुत बढ़ गया है। यह हृदयसे कभी दूर नहीं होता।’

गीत्वा च मम नामानि नर्तयेन्मम संनिधौ।

इदं ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोऽहं तेन चार्जुन॥

‘अर्जुन! जो मेरे नामोंका गान करके मेरे निकट नाचने लगता है, उसने मुझे खरीद लिया है—यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ।’

गीत्वा च मम नामानि रुदन्ति मम संनिधौ।

तेषामहं परिक्रीतो नान्यक्रीतो जनार्दन:॥

(आदिपुराण)

‘जो मेरे नामोंका गान करके मेरे समीप प्रेमसे रो उठते हैं, उनका मैं खरीदा हुआ गुलाम हूँ, यह जनार्दन दूसरे किसीके हाथ नहीं बिका है।’

जितं तेन जितं तेन जितं तेनेति निश्चितम्।

जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

‘जिसकी जिह्वाके अग्रभागपर ‘हरि’—ये दो अक्षर विद्यमान हैं, उसकी जीत हो गयी, उसने विजय पा ली, निश्चय ही उसकी विजय हो गयी।’

भगवन्नाममें देश-काल-अवस्थाकी कोई बाधा नहीं

न देशनियमस्तस्मिन् न कालनियमस्तथा।

नोच्छिष्टेऽपि निषेधोऽस्ति श्रीहरेर्नाम्नि लुब्धक॥

‘व्याध! श्रीहरिके नाम-कीर्तनमें न तो किसी देश-विशेषका नियम है और न काल-विशेषका ही। जूठे अथवा अपवित्र होनेपर भी नामोच्चारणके लिये कोई निषेध नहीं है।’

चक्रायुधस्य नामानि सदा सर्वत्र कीर्तयेत्।

नाशौचं कीर्तने तस्य स पवित्रकरो यत:॥

‘चक्रपाणि श्रीहरिके नामोंका सदा और सर्वत्र कीर्तन करें। उनके कीर्तनमें अशौच बाधक नहीं है; क्योंकि वे भगवान् स्वयं ही सबको पवित्र करनेवाले हैं।’

न देशकालावस्थासु शुद्‍ध्यादिकमपेक्षते।

किंतु स्वतन्त्रमेवैतन्नाम कामितकामदम्॥

‘यह भगवन्नाम किसी भी देश, काल और अवस्थामें शुद्धि आदिकी अपेक्षा नहीं रखता, यह तो स्वतन्त्र ही रहकर अभीष्ट कामनाओंको देनेवाला है।’

न देशकालनियमो न शौचाशौचनिर्णय:।

परं संकीर्तनादेव राम रामेति मुच्यते॥

‘कीर्तनमें देश-कालका नियम नहीं है, शौचाशौचका निर्णय भी आवश्यक नहीं है। केवल ‘राम-राम’ ऐसा कीर्तन करनेसे ही परम मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है।’

न देशनियमो राजन् न कालनियमस्तथा।

विद्यते नात्र संदेहो विष्णोर्नामानुकीर्तने॥

‘राजन्! भगवान् विष्णुके इस नाम-कीर्तनमें देश और कालका नियम नहीं है—इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं करना चाहिये।’

कालोऽस्ति दाने यज्ञे च स्नाने कालोऽस्ति मज्जने।

विष्णुसंकीर्तने कालो नास्त्यत्र पृथिवीतले॥

‘दान और यज्ञके लिये कालका नियम है, स्नान और मज्जन (नदी, सरोवर आदिमें गोता लगाने)-के लिये भी समयका नियम है, परंतु इस भूतलपर भगवान् विष्णुका कीर्तन करनेके लिये कोई काल निश्चित नहीं है। उसे हर समय किया जा सकता है।’

श्रीरामनामकी महिमा

रामेति द्वॺक्षरजप: सर्वपापापनोदक:।

गच्छंस्तिष्ठञ्शयानो वा मनुजो रामकीर्तनात् ॥

इह निर्वर्तितो याति चान्ते हरिगणो भवेत् ।

रामेति द्वॺक्षरो मन्त्रो मन्त्रकोटिशताधिक:॥

न रामादधिकं किञ्चित् पठनं जगतीतले।

रामनामाश्रया ये वै न तेषां यमयातना॥

रमते सर्वभूतेषु स्थावरेषु चरेषु च।

अन्तरात्मस्वरूपेण यच्च रामेति कथ्यते॥

रामेति मन्त्रराजोऽयं भवव्याधिनिषूदक:।

रामचन्द्रेति रामेति रामेति समुदाहृत:॥

द्वॺक्षरो मन्त्रराजोऽयं सर्वकार्यकरो भुवि।

देवा अपि प्रगायन्ति रामनाम गुणाकरम्॥

तस्मात् त्वमपि देवेशि रामनाम सदा वद।

रामनाम जपेद् यो वै मुच्यते सर्वकिल्बिषै:॥

(स्कन्दपुराण, नागरखण्ड)

भगवान् श्रीशंकरजी देवी पार्वतीसे कहते हैं—

‘‘राम’ यह दो अक्षरोंका मन्त्र जपनेपर समस्त पापोंका नाश करता है। चलते, खड़े हुए अथवा सोते (जिस किसी भी समय) जो मनुष्य रामनामका कीर्तन करता है, वह यहाँ कृतकार्य होकर जाता है और अन्तमें भगवान् हरिका पार्षद बनता है ‘राम’ यह दो अक्षरोंका मन्त्र शतकोटि मन्त्रोंसे भी अधिक महत्त्व रखता है। रामनामसे बढ़कर जगत‍्में जप करनेयोग्य कुछ भी नहीं है। जिन्होंने रामनामका आश्रय लिया है, उनको यमयातना नहीं भोगनी पड़ती। जो मनुष्य अन्तरात्मस्वरूपसे रामनामका उच्चारण करता है, वह स्थावर-जंगम सभी भूतप्राणियोंमें रमण करता है। ‘राम’ यह मन्त्रराज है, यह भय तथा व्याधिका विनाश करनेवाला है। ‘रामचन्द्र’, ‘राम’, ‘राम’—इस प्रकार उच्चारण करनेपर यह दो अक्षरोंका मन्त्रराज पृथ्वीमें समस्त कार्योंको सफल करता है। गुणोंकी खान इस रामनामका देवतालोग भी भलीभाँति गान करते हैं। अतएव हे देवेश्वरि! तुम भी सदा रामनामका उच्चारण किया करो। जो रामनामका जप करता है, वह सारे पापोंसे (पूर्वकृत एवं वर्तमानकृत सूक्ष्म और स्थूल पापोंसे और समस्त पापवासनाओंसे सदाके लिये) छूट जाता है।’

विष्णोरेकैकनामापि सर्ववेदाधिकं मतम्।

तादृङ्नामसहस्रेण रामनाम समं स्मृतम्॥

(पद्मपुराण)

‘भगवान् विष्णुका एक-एक नाम भी सम्पूर्ण वेदोंसे अधिक माहात्म्यशाली माना गया है। ऐसे एक सहस्र नामोंके तुल्य रामनाम कहा गया है।’

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।

सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥

(पद्मपुराण)

‘भगवान् शंकर कहते हैं—‘मेरे मनमें रमनेवाली सुमुखि शिवे! मैं ‘राम, राम, राम’ इस प्रकार कीर्तन करता हुआ राममें ही रमता हूँ। दूसरे सहस्र नामोंके समान एक रामनामकी महिमा है।’

श्रीकृष्णनामकी महिमा

अलमलमियमेव प्राणिनां पातकानां

निरसनविषये या कृष्ण कृष्णेति वाणी।

यदि भवति मुकुन्दे भक्तिरानन्दसान्द्रा

विलुठति चरणाब्जे मोक्षसाम्राज्यलक्ष्मी:॥

(सर्वज्ञमुनि)

‘कृष्ण, कृष्ण’ इस प्रकार उच्चारण करनेवाली जो वाणी है, यही प्राणियोंके पातकोंको दूर करनेमें पूर्णत: समर्थ है। यदि मुकुन्दमें आनन्दघनस्वरूपा भक्ति हो जाती है तो मोक्ष-साम्राज्यकी लक्ष्मी उस भक्तके चरणकमलमें स्वयं आकर लोटने लगती है।’

क: परेतनगरीपुरन्दर:

को भवेदथ तदीयकिंकर:।

कृष्णनाम जगदेकमंगलं

कण्ठपीठमुररीकरोति चेत्॥

‘यदि जगत‍्का एकमात्र मंगल करनेवाला श्रीकृष्ण-नाम कण्ठके सिंहासनको स्वीकार कर लेता है तो यमपुरीका स्वामी उस कृष्णभक्तके सामने क्या है? अथवा यमराजके दूतोंकी क्या हस्ती है?’

ब्रह्माण्डानां कोटिसंख्याधिकाना-

मैश्वर्यं यच्चेतना वा यदंश:।

आविर्भूतं तन्मह: कृष्णनाम

तन्मे साध्यं साधनं जीवनं च॥

‘करोड़ोंकी संख्यासे भी अधिक ब्रह्माण्डोंका जो ऐश्वर्य अथवा जो चेतना है, वह जिसका अंशमात्र है, वही तेज:पुंज ‘कृष्ण’ नामके रूपमें प्रकट हुआ है। वह ‘कृष्ण’ नाम ही मेरा साध्य, साधन और जीवन है।’

स्वर्गार्थीया व्यवसितिरसौ

दीनयत्येव लोकान्

मोक्षापेक्षा जनयति जनं

केवलं क्लेशभाजम्।

योगाभ्यास: परमविरस-

स्तादृशै: किं प्रयासै:

सर्वे त्यक्त्वा मम तु रसना

कृष्ण कृष्णेति रौतु॥

‘स्वर्गकी प्राप्तिके लिये जो व्यवसाय (निश्चय अथवा उद्योग) है, वह लोगोंको दीन ही बनाता है। मोक्षकी जो अभिलाषा है, वह मनुष्यको केवल क्लेशका भागी बनाती है और योगाभ्यास तो अत्यन्त नीरस वस्तु है। अत: वैसे प्रयासोंसे मेरा क्या प्रयोजन है। मेरी जिह्वा तो सब कुछ छोड़कर केवल ‘कृष्ण, कृष्ण’ की रट लगाती रहे।’

आकृष्टि: कृतचेतसां सुमहता-

मुच्चाटनं चांहसा-

माचाण्डालमभूल्लोकसुलभो

वश्यश्च मोक्षश्रिय:।

नो दीक्षां न च दक्षिणां न च पुर-

श्चर्यां मनागीक्षते

मन्त्रोऽयं रसनास्पृगेव फलति

श्रीकृष्णनामात्मक:॥

‘यह कृष्णनामरूपी मन्त्र शुद्धचेता महात्माओंके चित्तको (हठात्) अपनी ओर आकृष्ट करनेवाला तथा बड़े-से-बड़े पापोंका मूलोच्छेद करनेवाला है। मोक्षरूपिणी लक्ष्मीके लिये तो यह वशीकरण ही है। इतना ही नहीं, यह केवल गूँगोंको छोड़कर चाण्डालसे लेकर उत्तम जातितकके सभी मनुष्योंके लिये सुलभ है। दीक्षा, दक्षिणा और पुरश्चरणका यह तनिक भी विचार नहीं करता। यह मन्त्र जिह्वाका स्पर्श करते ही सभीके लिये पूर्ण फलद होता है।’

कृष्णस्य नानाविधकीर्तनेषु

तन्नामसंकीर्तनमेव मुख्यम्।

तत्प्रेमसम्पज्जनने स्वयं द्राक्-

शक्तं तत: श्रेष्ठतमं मतं तत्॥

‘श्रीकृष्णके नाना प्रकारके कीर्तनोंमें उनका नामकीर्तन ही मुख्य है। वह श्रीकृष्ण-प्रेमरूपा सम्पत्तिको शीघ्र उत्पन्न करनेमें स्वयं समर्थ है। इसलिये वह सब साधनोंसे श्रेष्ठतम माना गया है।’

नामसंकीर्तनं प्रोक्तं कृष्णस्य प्रेमसम्पदि।

बलिष्ठं साधनं श्रेष्ठं परमाकर्षमन्त्रवत्॥

‘श्रीकृष्णका नामकीर्तन प्रेमसम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये प्रबल एवं श्रेष्ठ साधन कहा गया है। वह श्रेष्ठ आकर्षण-मन्त्रकी भाँति चित्तको अत्यन्त आकृष्ट करनेवाला है।’

तदेव मन्यते भक्ते: फलं तद्रसिकैर्जनै:।

भगवत्प्रेमसम्पत्तौ सदैवाव्यभिचारत:॥

‘अत: नामरसिक भक्तजन उन कृष्णनामको ही भक्तिका फल मानते हैं; क्योंकि भगवत्प्रेमकी प्राप्तिमें वह कभी व्यभिचरित (असफल) नहीं हुआ।’

सल्लक्षणं प्रेमभरस्य कृष्णे

कैश्चिद् रसज्ञैरुत कथ्यते तत्।

प्रेम्णो भरेणैव निजेष्टनाम-

संकीर्तनं हि स्फुरति स्फुटं तत्॥

‘कितने ही रसज्ञजन उस कृष्णनामको ही कृष्णविषयक अत्यन्त प्रेमका उत्तम लक्षण बताते हैं; क्योंकि अधिक प्रेमसे ही अपने इष्टदेवके नामका संकीर्तन स्पष्टरूपसे स्फुरित होता है।’

कृष्ण: शरच्चन्द्रमसं कौमुदी कुमुदाकरम्।

जगौ गोपीजनस्त्वेकं कृष्णनाम पुन: पुन:॥

(विष्णुपुराण५।१३।५२)

‘रासके समय श्रीकृष्णचन्द्र शरत्कालीन चन्द्रमा, उसकी चाँदनी और कुमुदसमूहका गुणगान करने लगे। परंतु गोपियोंने तो बारम्बार केवल एक श्रीकृष्णनामका ही गान किया।’

रासगेयं जगौ कृष्णो यावत्तारतरध्वनि:।

साधु कृष्णेति कृष्णेति तावता द्विगुणं जगु:॥

(विष्णुपुराण ५।१३।५६)

‘श्रीकृष्णचन्द्र जितने उच्चस्वरसे रासोचित गान गाते थे, उससे दूने स्वरमें गोपियाँ केवल ‘साधु कृष्ण! धन्य कृष्ण!’ के गीत गाती थीं।’

सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा

भृगुवर नरमात्रं तारयेत् कृष्णनाम।

‘श्रद्धासे, अवहेलनासे—कैसे भी एक बार भी किया हुआ कृष्णनामका कीर्तन मनुष्यमात्रको तार देता है।’

श्रीकृष्णनामामृतमात्मह्लादं

प्रेम्णा समास्वादनमङ्गिपूर्वम्।

यत् सेव्यते जिह्विकयाविरामं

तस्यातुलं जल्पतु को महत्त्वम्॥

‘(फिर) अपने मनको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले श्रीकृष्णनामामृतका प्रेमसे रसास्वादनकी चेष्टाके साथ जो जिह्वाद्वारा अविराम सेवन किया जाता है, उसकी अनुपम महत्ताका कौन वर्णन कर सकता है।’

सर्वमंगलमंगल्यमायुष्यं व्याधिनाशनम्।

भुक्तिमुक्तिप्रदं दिव्यं वासुदेवस्य कीर्तनम्॥

‘वासुदेव’ नामका दिव्य कीर्तन सम्पूर्ण मंगलोंमें भी परम मंगलकारी, आयुकी वृद्धि करनेवाला, रोगनाशक तथा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

परिहासोपहास्याद्यैर्विष्णोर्गृह्णन्ति नाम ये।

कृतार्थास्तेऽपि मनुजास्तेभ्योऽपीह नमो नम:॥

‘जो परिहास और उपहास आदिके द्वारा भगवान् विष्णुके नाम लेते हैं, वे मनुष्य भी कृतार्थ हैं। उनके प्रति भी यहाँ मेरी ओरसे बारम्बार नमस्कार है।’

सर्वत्र सर्वकालेषु येऽपि कुर्वन्ति पातकम्।

नामसंकीर्तनं कृत्वा यान्ति विष्णो: परं पदम्॥

‘जो सर्वत्र और सर्वदा पापाचरण करते हैं, वे भी हरिनामसंकीर्तन करके विष्णुके परमधाममें चले जाते हैं।’

नारायणाच्युतानन्त वासुदेवेति यो नर:।

सततं कीर्तयेद् भूमिं यान्ति मल्लयतां स हि॥

‘जो मनुष्य नारायण, अच्युत, अनन्त और वासुदेव आदि नामोंका सदा कीर्तन करता है, वह मुझमें लीन होनेवाले भक्तोंकी भूमिको प्राप्त होता है।’

प्राणप्रयाणपाथेयं संसारव्याधिभेषजम्।

दु:खशोकपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम्॥

‘हरि’ यह दो अक्षरोंका नाम प्राणप्रयाणके पथका पाथेय है, संसाररूपी रोगकी ओषधि है तथा दु:ख और शोकसे सबकी सदा रक्षा करनेवाला है।’

विचेयानि विचार्याणि विचिन्त्यानि पुन: पुन:।

कृपणस्य धनानीव त्वन्नामानि भवन्तु न:॥

‘हे भगवन्! जैसे कृपण मनुष्य बारम्बार धनका संचय, विचार एवं चिन्तन करता है, उसी तरह हमारे लिये आपके नाम ही पुन:-पुन: संग्रहणीय, विचारणीय एवं चिन्तनीय हों।’

सहस्रनाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम्।

एकवृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति॥

‘पवित्र सहस्रनामोंकी तीन आवृत्तियाँ करनेसे जो फल मिलता है, उसे कृष्ण-नाम एक ही बारके उच्चारणसे सुलभ कर देता है।’