श्रीभगवन्नाम-महिमा
१-जिस प्रकार अग्निमें दाहिकाशक्ति स्वाभाविक है, उसी प्रकार भगवन्नाममें पापको—विषय-प्रपंचमय जगत्के मोहको जला डालनेकी शक्ति स्वाभाविक है। इसमें भावकी आवश्यकता नहीं है।
२-किसी प्रकार भी नाम जीभपर आना चाहिये, फिर नामका जो स्वाभाविक फल है, वह बिना श्रद्धाके भी मिल ही जायगा।
३-तर्कशील बुद्धि भ्रान्त धारणा करवा देती है कि बिना भावके क्या लाभ होगा। पर समझ लो ऐसा सोचना अपने हाथों अपने गलेपर छुरी चलाना है।
४-भाव हो या नहीं, हमें आवश्यकता है नाम लेनेकी। नामकी आवश्यकता है, भावकी नहीं।
५-भाव हो तो बहुत ठीक, परंतु हमें भावकी ओर दृष्टि नहीं डालनी है। भाव न हो, तब भी नाम-जप तो करना ही है।
६-देखो—नाम भगवत्स्वरूप ही है। नाम अपनी शक्तिसे, नाम अपने वस्तुगुणसे सारा काम कर देगा। विशेषकर कलियुगमें तो भगवन्नामके सिवा और कोई साधन ही नहीं है।
७-मनोनिग्रह बड़ा कठिन है—चित्तकी शान्तिके लिये प्रयास करना बड़ा ही कठिन है। पर भगवन्नाम तो इसके लिये भी सहज साधन है। बस, भगवन्नामकी जोरसे ध्वनि करो।
८-तर्क भ्रान्ति लाती है कि रोटी-रोटी करनेसे पेट थोड़े ही भरता है? पर विश्वास करो, भगवन्नाम रोटीकी तरह जड शब्द नहीं है। यह शब्द ही ब्रह्म है। नाम और नामीमें कोई अन्तर ही नहीं है।
९-आलस्य और तर्क—ये दो नाम-जपमें बाधक हैं।
१०-प्राय: आलस्यके कारण ही कह बैठते हो कि नाम-जप होता नहीं।
११-अभ्यास बना लो, नाम लेनेकी आदत डालो।
१२-‘नाम लेत भव सिंधु सुखाहीं’ इसपर श्रद्धा करो। इस विश्वासको दृढ़ करो।
१३-कंजूसकी भाँति नामको सँभालो।
१४-निश्चय समझो नामके बलसे बिना ही परिश्रम भव-सागरसे तर जाओगे और भगवान्के प्रेमको भी प्राप्त कर लोगे।
१५-निरन्तर भगवान्का नाम लो, कीर्तन करो। मेरे विचारसे सर्वोत्तम साधन यही है।
१६-‘हारेको हरिनाम’—इसी उपायसे सबका मंगल दीखता है और अन्य उपायोंमें राग-द्वेष उत्पन्न होकर फँस जानेका भय है।
१७-भगवान् पर विश्वास हो, उनकी कृपाका भरोसा हो और नाम-जप होता रहे तो अपने-आप ही निर्भयता आयेगी, साहस आयेगा। विपत्तिका टलना भी इसी उपायसे होगा।
१८-मनुष्य जब सब उपायोंसे हार जाता है, तब उसे हरिनाम सूझता है। तभी वह हरिनामको पकड़ता है और तभी उसे विजय मिलती है।
१९-बस, दो बात है—भगवान्की कृपापर विश्वास और भगवान्के नामका आश्रय। फिर कोई चिन्ता नहीं। ध्यान नहीं लगता न सही, मन वशमें नहीं होता न सही।
२०-भगवान् पापी और नीचके भी उद्धारक हैं, यह विश्वास करके केवल जीभसे भगवान्के नामका उच्चारण करते रहो।
२१-सकल अंग पद बिमुख नाथ
मुख नामकी ओट लई है।
है तुलसी परतीति एक
प्रभु मूरति कृपामई है॥
—बस, विश्वास कर लो कि ‘प्रभु मूरति कृपामई है।’ और जीभसे नामका उच्चारण करते रहो।
२२-यदि हम जीभसे भगवन्नाम लेंगे तो सभी अंग पुष्ट हो जायँगे।
२३-अन्तरके मलको नाश करनेके लिये भगवन्नामसे बढ़कर दूसरा सुलभ साधन है ही नहीं। स्त्री, बच्चे, बूढ़े सभी भगवान्का नाम बड़े प्रेमसे ले सकते हैं।
२४-भगवान्के नाममें श्रद्धा नहीं हो, प्रेम नहीं हो तो दूसरेके कहनेसे ही लेना आरम्भ कर दें। अच्छा क्या हानि है, नाम लिया करेंगे, इसी भावसे लें। आदत डालें, फिर काम होगा ही। क्योंकि भगवन्नाममें वस्तुशक्ति ही ऐसी है, पाप नाश करनेकी स्वाभाविक शक्ति ऐसी है कि जीभपर नाम आते ही वह मलका नाश करेगा ही।
२५-भगवन्नाम पापोंका नाश करके ही शान्त नहीं हो जाता। पापका नाश करनेके बाद हृदयमें ज्ञानकी ज्योति पैदा करता है, ज्ञानके बाद भगवान्के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। हुआ यह कि फिर स्वयं नामी खिंच आते हैं।
२६-भगवान्के नाम, रूप, लीला, धाममें अन्तर नहीं है। ये सब भगवत्स्वरूप ही हैं।
२७-नाम भगवान्को हमारी ओर खींचता है और हमें भगवान्की ओर ले जाता है, दोनों ही काम करता है।
२८-सबसे बड़ी मूर्खता और सबसे बड़ा मोह यह है कि हम विषयोंसे सुखकी आशा करते हैं। इस मूर्खता तथा मोहको मिटानेके लिये भी भगवान्का नाम ही लेना चाहिये।
२९-यह याद कर लेनेकी बात है कि मनसे, वाणीसे, शरीरसे दिन-रात चौबीसों घंटे ही निरन्तर भजन होता रहे।
३०-निरन्तर दिन-रात भजन हो—इसके लिये कुछ समय प्रतिदिन एकान्तमें बैठकर भजनका अभ्यास करें। मान लें यदि दो घंटे एकान्तमें बैठकर लगातार भजन करेंगे तो फिर इससे शेष बाईस घंटेतक भजन करनेकी शक्ति मिलती रहेगी।
३१-भगवद्भजनका सबसे सरल प्रकार है—भगवान्के नामका स्मरण—नामका जप। स्मरण न हो सके तो जीभसे ही निरन्तर नाम लेनेका अभ्यास करें। नाम-जपके द्वारा असम्भव सम्भव होता है।
३२-प्रत्येक मनुष्यको प्रतिदिन एकान्तमें बैठकर लगातार कम-से-कम दो घंटे नाम-जपका अभ्यास अवश्य करना चाहिये।
३३-सर्वोत्तम काम है दिन-रात भजन करना।
३४-यदि मनुष्य चेष्टा रखे तो एक लाख नाम-जप, नहीं सही—पचास हजार जप तो बहुत आसानीसे कर सकता है।
३५-नाम लेते-लेते अन्तरके मलका नाश होता है फिर नामका स्वाद प्रकट होता है, नाममें स्वाद आ जानेपर तो फिर नाम छूटना कठिन हो जाता है।
३६-नामकी पूँजी खरी पूँजी है। यह जिसके पास है, उसे यमराजका भय नहीं है।
३७-जहाँ भगवान्का नाम होता है, वहाँ यमदूत नहीं आ सकते।
३८-यदि सचमुच भगवान्का नाम-जप होने लग जाय तो विपत्ति सम्पत्तिके रूपमें परिणत हो जाय।
३९-गोस्वामी तुलसीदासजीने तो यहाँतक कह दिया है कि—
तुलसी जाके बदन ते, धोखेहु निकसत राम।
ताके पगकी पगतरी, मोरे तनुको चाम॥
धन्य है इस नामप्रेमको।
४०-सारे साधनोंका प्राण है—भगवान्का नाम।
‘नाम राम को अंक है, सब साधन हैं सून।’
खूब भजन करो और दूसरोंसे करवाओ।
४१-मनुष्य-जन्ममें ही मनुष्य अपने मनकी गंदगी सर्वथा मिटा सकता है। वह मनुष्य-जन्म हमलोगोंको प्राप्त है। भगवन्नामरूपी अग्निसे मनकी सारी गंदगीको जला डालिये।
४२-नामचिन्तामणि: कृष्णश्चैतन्यरसविग्रह:।
पूर्ण: शुद्धो नित्यमुक्तोऽभिन्नात्मा नामनामिनो:॥
नाम-चिन्तामणि ही श्रीकृष्ण है, वह चैतन्यरसविग्रह पूर्ण पवित्र और नित्यमुक्त है, नाम और नामी दोनों अभिन्न हैं।
४३-जो मनुष्य सचमुच भगवान्के नामका आश्रय लेता है, वही भाग्यवान् है, वही सुखी है और वही सच्चा साधक है।
४४-जिसकी जीभ और चित्तवृत्ति भगवन्नाममें लगी है, वही साधु है, उसका जीवन धन्य है और उसका सत्संग सभीको वांछनीय है।
४५-जिसकी जिह्वा निरन्तर पतित-पावन हरिनामकी रट लगाती रहती है, वह चाण्डाल होनेपर भी सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि वही प्रभुका प्यारा है।
४६-भगवान्के नाम-कीर्तनसे पापोंका नाश ही नहीं होता। पापनाशके लिये तो शास्त्रोंमें अनेक प्रायश्चित्त बतलाये हैं।
४७-नामसे सायुज्यमोक्षकी आकांक्षा भी मिट जाती है; क्योंकि उस मोक्षमें प्रियतमके नाम-गुणका कीर्तन कहाँ?
४८-श्रीहरिदास महाराजने कहा था—
केह बोले नाम है ते होय पापक्षय।
केह बोले नाम है ते मोक्ष लाभ हय॥
हरिदास कहे नामेर ए दुइ फल न हे।
नामेर फले कृष्ण दे प्रेम उपजये॥
नामका फल तो है पंचम पुरुषार्थ—श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति। पापनाश और मुक्ति तो नामके आनुषंगिक फलमात्र हैं; जैसे सूर्यके उदय होनेपर प्रकाश होता ही है।
४९-जैसे जगत्के प्रकाशक प्रभाकरके प्रकट होते ही जगत्का सारा अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही नामरूपी सूर्यके उदय होते ही पापसमूह समूल नष्ट हो जाते हैं। भगवान्का नाम अज्ञान-समुद्रसे तरनेके लिये तरणिके समान है। ऐसे जगन्मंगलकारी हरिनामकी जय हो।’ ‘जयति जगन्मंगल हरेर्नाम।’
५०-भगवन्नामकी वास्तविक महिमा क्या है, कोई कह नहीं सकता। वह अचिन्त्य है, अनिर्वचनीय है। नामकी महिमा लोगोंने जो गायी है, वह तो कृतज्ञ-हृदयसे उद्गारमात्र है। अर्थात् जिन महापुरुषोंको नामसे अशेष लाभ हुए हैं, उन्होंने उन अशेष लाभोंको लक्ष्यमें रखकर भगवन्नामकी महिमा गायी है।
५१-नामके विषयमें इसके आगे क्या कहूँ, तुलसीदासजीने कलम तोड़ दी—
‘राम न सकहिं नाम गुन गाई।’
५२-नाम-जपमें और मन्त्र-जपमें इतना ही अन्तर है कि मन्त्रमें विधिकी प्रधानता होती है और नाममें श्रद्धाकी। नाम किसी प्रकार भी विधि-अविधिपूर्वक लिया जाय तो लाभदायक होता है और मन्त्रका अविधिपूर्वक जप करनेसे कहीं-कहीं उससे हानि भी हो जाया करती है। अत: नाम-जपसे सदा सबका लाभ-ही-लाभ है।
५३-साधकको चाहिये कि वह व्यर्थका बोलना बन्द कर दे और उठते-बैठते, चलते-फिरते, शुद्धि-अशुद्धिमें जीभसे बराबर भगवान्का नाम लेता रहे। अपने जिम्मेका काम सब करे, पर कामभरको बोले और जीभको लगाये रखे भगवान्के नाम-जपमें। व्यर्थ बोलना बंद कर देनेसे चार लाभ होते हैं—झूठ छूटता है, परनिन्दा छूटती है, व्यर्थकी चर्चा छूटती है तथा वाणीमें शक्ति आ जाती है।
५४-जिह्वाके दोषसे बचनेके लिये यह आवश्यक है कि हम अधिक समयतक मौन रहें और इस प्रकारकी प्रतिज्ञा अवश्य कर लें कि अनिवार्य हुए बिना बोलेंगे ही नहीं तथा वह भी आवश्यकताभर, अधिक नहीं और वह भी अच्छी तरह सोच-विचारकर, जहाँ-तहाँ जैसे-तैसे नहीं। दूसरे यह निश्चय करें कि वाणी भगवान्का नाम लेनेके लिये मिली है, अतएव उसको बराबर भगवान्का नाम लेनेमें लगाये रखना है। आवश्यकता होनेपर कम-से-कम बोलकर पुन: भगवान्का नाम लेना आरम्भ कर देना है।
५५-वे लोग सचमुच बड़े भाग्यशाली हैं, जिनको बहुत कम बोलना पड़ता है और जो निरन्तर भगवान्का नाम लेते हैं।
५६-प्रात:काल उठनेसे रात्रिमें सोनेतक जीभसे निरन्तर भगवान्का नाम आता रहे—इसकी पूरी चेष्टा करनी चाहिये। इससे अपने-आप बोलना कम हो जायगा और पर-चर्चाको अवकाश ही नहीं मिलेगा। भगवान्का नाम न भूले; भूल जाय तो इसके लिये खेद हो।
५७-भगवन्नाम-जप करते समय उसे सुनते रहें। इससे मनको उसमें लगाना पड़ेगा, बिना मनको उसमें लगाये नाम सुन न सकेंगे।
५८-मनमें यह विश्वास होना चाहिये कि नाम भगवान् ही है। भगवान् जब हमारी जिह्वापर आ गये तो भगवान्के सारे दिव्य गुण हमारे अंदर आ गये। भगवान्के गुणोंको अपने अंदर उतरता देखे—करुणा, दया, प्रेम, अहिंसा, अस्तेय आदि गुण मेरेमें आ रहे हैं। नाम मुँहमें आते ही अपनेको माने—‘मैं पवित्र हूँ।’
५९-नाम-नामी एक हैं, अतएव भगवान्के नाम-जपके समय यह अनुभव करें कि ‘भगवान् मेरे हृदयमें आ रहे हैं, भगवान्की झाँकी मेरे हृदयमें उतर रही है।’
६०-नामकी शरण हो जाय—दूसरे किसी साधनकी उपेक्षा एवं अपेक्षा न करे; भगवान्के नामपर अपनेको निर्भर कर दे। नाम सर्वशक्तिमान् है—यह विश्वास करके उसीपर निर्भर हो जाय। अर्थात् अपनेको उसपर छोड़कर निश्चिन्त हो जाय। अपना भला कब कैसे होगा, इसके विषयमें निश्चिन्त हो जाय। शरणागत कुछ माँगता नहीं; वह कुछ चाहता नहीं; वह भगवान् पर ही निर्भर रहता है—सब प्रकारसे। अपना भला किसमें है, इसका निश्चय भी वह नहीं करता। वह भगवान्से कहता है—
‘मेरा भला किसमें है तथा कैसे उसे प्राप्त करना है—यह आप जानें। नाथ! आपकी शक्तिसे ही सब काम होगा और वही काम होगा जो आप चाहेंगे।’
६१-वाणीको भगवान्के नाममें लगा दे। कम-से-कम जितनी बात, जब, जिस रूपमें बोलनी आवश्यक हो, उतनी ही उस रूपमें बोले, बाकी समयमें अपनेको मौन-सा करके भगवान्के नामका जप करता रहे। जीभसे भगवान्का नाम लेता रहे और अपने कानोंद्वारा उसे सुनता रहे—यह मानसिक जप है। इसका बड़ा महत्त्व है।
६२-वाणीका संयम करनेका एक ही उपाय है—भगवन्नाम-जप एवं स्वाध्यायको वाणीका विषय बना ले। जीभके लिये भगवान्के नामका जप ही एकमात्र काम रह जाय, दूसरे किसी भी कामके लिये उसमेंसे समय निकालना न पड़े। जो व्यक्ति इस प्रकारका जीवन बना लेता है, वह जहाँ रहता है, वहीं उसके द्वारा जगत्को एक बहुत बड़ी चीज अपने-आप अनायास ही मिलती रहती है।
६३-जीभ स्थूल अंग है, कर्मेन्द्रिय है पर यदि यह भगवान्के नामके साथ लगी रही तो यह जीवनको खींच ले जायगी और जीवनके अन्तमें भगवान्का नाम आया कि काम बना।
६४-भगवान्के नाम-जपका अभ्यास होनेके बाद मनसे सोचते और हाथसे काम करते रहनेपर भी जीभसे नाम अपने-आप निकलता रहेगा। सारे शास्त्रोंके सत्संगका फल यही है कि ‘भगवान्के नाममें रुचि हो जाय।’
६५-श्रीभगवान्के एक भी गुणका रहस्य, एक भी नामकी महिमा, एक भी चरित्रका प्रभाव, एक भी शक्तिका तत्त्व जान लिया जाय अथवा एक भी रूपकी जरा-सी भी झाँकीका ज्ञान हो जाय तो फिर भगवान्से क्षणभरके लिये भी चित्त न हटे।
६६-मेरी समझसे सबसे सरल साधन है नामका अभ्यास। मुखसे निरन्तर भगवान्के नामका उच्चारण होता रहे और हाथोंसे काम। अभ्यास होनेपर ऐसा होना खूब सम्भव है—बस, ‘मुख नामकी ओट लई है।’ विश्वास होगा तो इस नामोच्चारणमात्रसे ही कल्याण हो जायगा।
६७-श्रीभगवान् पर विश्वास रखकर उनका नाम-जप करना चाहिये और उनकी कृपापर भरोसा करके अपनेको सर्वतोभावसे उन्हींपर छोड़ देना चाहिये। ऐसा न हो सके तो भी नाम-जप करना चाहिये। जैसा भाव हो, उसीसे कल्याण होगा—आंशिक कृपाके दर्शन होंगे और सांसारिक वासनाएँ किसी अंशमें पूर्ण होंगी। परन्तु इसमें घाटा यही रह जायगा कि शीघ्र ही भगवत्प्रेमकी प्राप्ति नहीं होगी।
६८-भगवान्को याद रखनेका उपदेश, घंटे-दो-घंटे या अधिक नियमित कालके लिये नाम-जपकी आज्ञा, इतनी संख्या पूरी करनेपर सिद्धि हो जायगी, इस लोभसे संख्यायुक्त जप या संख्याकी गणनासे जप हो जाता है, यों भूल रह जाना सम्भव है, इसलिये संख्याकी अवधि बाँधकर जप करना चाहिये, यह आदेश तो उन आरम्भिक साधकोंके लिये है, जो भगवान्के प्रेमी नहीं हैं। न करनेकी अपेक्षा ऐसा करना बहुत उत्तम है।
६९-प्रेमीजनोंको तो अपने प्रेमास्पदका नाम इतना प्यारा होता है कि स्वयं तो वे उसे कभी भूल ही नहीं सकते, दूसरेको कभी भूले-भटके उच्चारण करते सुन लेते हैं, तो उसकी चरण-धूलि लेने दौड़ते हैं।
७०-श्रीभगवान्के नामका जप जैसे बने, वैसे ही करते रहिये। करते-करते नामके प्रतापसे विश्वास बढ़ेगा, न घबराइये, न हार मानिये।
७१-मैं तो एक श्रीभगवन्नामको जानता हूँ। उसका पूरा महत्त्व तो नहीं जानता, परंतु विश्वास है कि भगवन्नामसे सब कुछ हो सकता है और आपको भी उसीका आश्रय लेनेकी नम्र सलाह देता हूँ।
७२-उपदेश देनेका तो मैं अधिकारी नहीं हूँ। सलाहके तौरपर यही कह सकता हूँ कि आलस्य, असंयम और अविश्वासका त्याग करके श्रीभगवान्का नाम-जप करना चाहिये तथा नाम-जप करते हुए ही भगवत्सेवाके भावसे कर्तव्यकर्म करनेकी आदत डालनी चाहिये।
७३-सीधे तीन काम हैं—
(१) भगवान्का नाम-जप,
(२) बाहरी पापोंका बिलकुल त्याग और
(३) भगवान्की दयापर विश्वास।
इनसे सारी बातें आप ही ठीक हो जायँगी। इनमें भी तीनों न हों तो दो करें; नहीं तो कम-से-कम एक भगवन्नामका जप-स्मरण निरन्तर करते रहनेकी कोशिश करना चाहिये। कलियुगमें केवल क्रियासे तारनेवाला, महान् फल देनेवाला भगवन्नाम ही है और सारे साधनोंमें भावकी आवश्यकता है। नाम भावसे, कुभावसे कैसे भी लिया जाय, कल्याणकारी ही है। अवश्य ही भावका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। प्रत्येक क्रियामें, जहाँतक हो ऊँचे-से-ऊँचे भावमें, पूरी विधि तथा बाहरी क्रिया—तीनोंका ही खयाल रखकर तीनों ही करते रहना चाहिये। ‘हारेको हरिनाम’ है।
७४-श्रीभगवान्का नाम-जप करते रहिये और कम-से-कम यह दृढ़ चेष्टा रखिये, जिसमें वाणी और शरीरसे कोई पाप न हो। मानसिक पापोंसे बचनेकी यथासाध्य कोशिश कीजिये। नामका आश्रय होगा तो पाप आप ही नष्ट हो जायँगे।
७५-एक उपाय बहुत उत्तम है—प्रतिज्ञा कर लीजिये प्रतिक्षण—लगातार नाम-जपकी। नाम-जपका तार यदि जाग्रत्-अवस्थामें कभी नहीं टूटेगा तो निश्चय ही सब पाप मर जायँगे। यह महात्माओंका अनुभूत सरल प्रयोग है।
७६-रही मेरे बल देनेकी बात सो मेरे पास एक ही बल है—‘हारेको हरिनाम’ और आपसे भी यही कहता हूँ, उसका आश्रय लीजिये। सारे पाप-तापोंसे छुड़ानेमें वह पूरा समर्थ है।