श्रीभगवन्नाम-महिमाके कुछ पद
(१)
(राग जोगिया-ताल मूल)
वन्दन नित्य हृदयसे ‘भगवन्नाम’
मोह-नाशक सुख-धाम।
परमहंस-ऋषि-मुनि-तापसजन
सिद्ध-योगियोंका विश्राम॥
भक्तोंके-प्रेमीजन-मनके
जीवनका शुचि परमाधार।
पाप-ताप-नाशक जन-जनका
परम पुण्यमय शान्ताकार॥
सभी साधनोंका परमाश्रय
सर्व-सिद्धिदायक शुभ-मूल।
स्पर्शमात्रसे जल जाते सब
अघ जैसे पावकसे तूल॥
पिता-पितामह-माता-धाता,
भर्ता, त्राता, गुरु, आचार्य।
जो जैसे भजता, उसका बन
वैसे ही करता सब कार्य॥
करता सिद्ध सहज ही सत्वर
जनके धर्म, काम, शुचि अर्थ।
देता मोक्ष, सिद्ध करता फिर
प्रेम दिव्य पंचम पुरुषार्थ॥
(२)
(श्रीभगवन्नामाष्टक)
मधुरन महँ सब तें मधुर,
सुभ महँ अति सुभ धाम।
पावन महँ पावन परम,
केवल हरि को नाम॥
ब्रह्म तें तृणतक सकल
जग माया को काम।
सत्य सत्य पुनि सत्य जग,
केवल हरि को नाम॥
मात-पिता, गुरु-बन्धु सो,
सब बिधि प्रानाराम।
जो सिखवै सुमिरन सदा,
केवल हरि को नाम॥
स्वासन को विश्वास नहिं
कब ह्वै जायँ बिराम।
प्रथमहि ते कीर्तन करो,
केवल हरि को नाम॥
बसहिं सदा तेहि स्थान महँ
श्रीहरि पूरन-काम।
हरि-जन नित जहँ गावहीं,
केवल हरि को नाम॥
अहो दु:ख अति दु:ख यहि
परम दु:ख दुख-ठाम।
काँच-हेतु भूल्यो रतन,
केवल हरि को नाम॥
भरो श्रवन महँ, जपो नित,
श्रीहरि-नाम ललाम।
गावो गावो नित्य प्रति,
केवल हरि को नाम॥
तृन-सम कर सब विश्व कहँ,
राजत सब को स्याम।
चिदानंदमय, सुद्ध-घन,
केवल हरि को नाम॥
(३)
(राग-बिहाग)
राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम।
जगविश्राम! मंगलधाम! पूरणकाम! सुन्दर नाम॥
योग-जप-तप-व्रत नियम-यम, यज्ञ-दान अपार।
राम-सम नहिं एक साधन, राम सब आधार॥
सब मिल कहो जय जय राम॥
राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम।
राम गुरु, पितु-मातु रामहि, राम सुहृद उदार।
राम स्वामी, सखा रामहि, राम प्रिय परिवार॥
सब मिल कहो जय जय राम॥
राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम।
राम जीवन, राम तन-मन, राम धन-जन दार।
राम सुत, सुख-साज रामहि, राम प्राणाधार॥
सब मिल कहो जय जय राम॥
राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम।
राम राग, विराग रामहि, राम स्नेहागार।
राम प्रेमद, राम प्रेमिक, प्रेम-पारावार॥
सब मिल कहो जय जय राम॥
राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम।
राम बिधि, शिव राम, पालक विष्णु विश्वाधार।
राममय जग, राम जगमय, रामही विस्तार॥
सब मिल कहो जय जय राम॥
राम राम राम राम राम राम राम
राम राम राम राम राम राम राम।
(४)
(राग ईमन-ताल त्रिताल)
नारायण शुभ नाम दिव्य है
मंगलमय कल्याणाऽधार।
आर्ति-विपत्ति-ताप-अघ-तम-हर
दिव्य सुख-सुधा-पारावार॥
हो यदि कहीं, किसी भी कारण,
शुभ नारायण नामोच्चार।
हरि-पार्षद आयें, हो भीत
भगें यम-दूत भीषणाकार॥
नारायण शुभ नाम दीन-जन-
आश्रय मधुमय मोक्ष-द्वार।
भुक्ति-मुक्ति शुचि-शान्ति नित्य पर-
धाम-सुदायक सहज उदार॥
भाव-कुभाव-अनख, आतुरता-
भय-संकेत-हास-मनुहार।
किसी हेतु ‘नारायण’ कहने-
पर हो संकटसे उद्धार॥
(५)
(राग आसावरी-ताल रूपक)
साधन नाम-सम नहिं आन।
जपत सिव-सनकादि, सारद-नारदादि सुजान॥
नाम के बल मिटत भीषन असुभ भाग्य-बिधान।
नाम-बल मानव लहत सुख सहज मन-अनुमान॥
नाम टेरत टरत दारुन बिपति, सोक महान।
आर्त्त करि, नर-नारि, ध्रुव सब रहे सुचि सहिदान॥
नाम के परताप तें जल पर तरे पाषान।
नाम-बल सागर उलाँघ्यो सहज ही हनुमान॥
नाम-बल संभव सकल जे कछु असंभव जान।
धन्य ते नर, रहत जिनके नाम-रट की बान॥
पाप-पुंज प्रजारिबे-हित प्रबल पावक-खान।
होत छिन महँ छार, निकसत नाम जान-अजान॥
नाम-सुरसरि में निरंतर करत जे जन न्हान।
मिटत तीनों ताप, मुख नहिं होत कबहुँ मलान॥
नाम-आश्रित जनन के मन बसत नित भगवान।
जरत खरत कु-बासना सब तुरत लज्जा-मान॥
नाम-जीवन, नाम अमरित, नाम सुख को थान।
नाम-रत जे नाम-पर ते पुरुष अति मतिमान॥
नाम नित आनंद-निरझर, अति पुनीत पुरान।
मुक्त सत्वर होत जे जन करत सादर पान॥
नाम जपत सुसिद्ध जोगी बनत समरथवान।
नाम तें उपजत सु-भगति, बिराग सुभ बलवान॥
नाम के परताप दीखत प्रकृति-दीप बुझान।
नाम-बल ऊगत प्रभामय भानु तत्त्व-ज्ञान॥
नाम की महिमा अमित, को सकै करि गुन-गान।
राम तें बड़ नाम, जेहि बल बिकत श्रीभगवान॥
(६)
(राग आसावरी)
भली है राम-नाम की ओट।
जिन्ह लीन्हीं तिनके मस्तक तें
पड़ी पाप की पोट॥
राम-नाम सुमिरन जिन्ह कीन्हो
लगी न जम की चोट।
अन्त:करन भयो अति निरमल,
रही तनिक नहिं खोट॥
राम-नाम लीन्हें तें जर गइ
माया-ममता-मोट।
राम-नाम तें मिले राम, जग
रह गयो फोकट-फोट॥
(७)
(होरी काफी-ताल दीपचन्दी)
भूल जग के विषयन कों,
जप मन हरि को नाम॥
दीनबंधु हरि करुना-सागर,
पतितन के विश्राम।
आपद-अंधकार महँ श्रीहरि
पूरन-चंद्र ललाम॥
पाप-ताप सब मिटै नाम तें,
नास होहिं सब काम।
जम के दूत भयातुर भागैं,
सुनत नाम सुख-धाम॥
भाग्यवान जे जपत निरंतर
नाम सदा निष्काम।
निरख सुखी सत्वर हों मूरति
हरि की जग-अभिराम॥
भाग्यहीन जिन्ह के मन-मुख महँ
बसत न हरिको नाम।
नरक-रूप जग जीवन तिन्ह को
भूमि-भार अघ-धाम॥
(८)
(राग भैरवी-ताल झपताल)
कर मन हरि को ध्यान, राम-गुन गाइये।
प्रेम-मगन सब देह सुरति बिसराइये॥
हरि-संकीर्तन करत अश्रुधारा बहै।
गदगद होवे कंठ, परम सुख सो लहै॥
पुलकित तनु हरि-प्रेम हृदय जो नाचहीं।
सुर-मुनि ताकी अनुपम गति नित जाचहीं॥
नाम लेत मुख हँसत, कबहुँ कर रुदनहीं।
ताको हिय नित करहिं दयामय सदनहीं॥
(९)
(राग पीलू-बरवा-ताल धुमाली)
बन्धुगणो! मिल कहो प्रेमसे
‘यदुपति व्रजपति श्यामा-श्याम।’
मुदित चित्तसे घोष करो पुनि
‘पतीतपावन राधेश्याम॥’
जिह्वा-जीवन सफल करो कह—
‘जय यदु-नन्दन, जय-घनश्याम।’
हृदय खोल बोलो, मत चूको—
‘रुक्मिणि-वल्लभ श्यामा-श्याम॥’
नव-नीरद-तनु, गौर मनोहर,
‘जय श्रीमाधव जय बलराम।’
उभय सखा मोहनके प्यारे—
‘जय श्रीदामा, जयति सुदाम॥’
परमभक्त निष्काम-शिरोमणि—
‘उद्धव-अर्जुन शोभा-धाम।’
प्रेम-भक्ति-रस-लीन निरन्तर
‘विदुर, विदुर-गृहिणी अभिराम॥’
अति उमंगसे बोलो सन्तत—
‘यदुपति व्रजपति श्यामा-श्याम।’
मुक्तकंठसे सदा पुकारो—
‘पतीतपावन राधेश्याम॥’
(१०)
(राग पीलू-बरवा)
बन्धुगणो! मिल कहो प्रेमसे—
‘रघुपति राघव राजाराम।’
मुदित चित्तसे घोष करो पुनि—
‘पतीतपावन सीताराम॥’
जिह्वा-जीवन सफल करो कह—
‘जय रघुनन्दन, जय सियाराम।’
हृदय खोल बोलो मत चूको—
‘जानकिवल्लभ सीताराम॥’
गौर रुचिर, नव घनश्याम छबि,
‘जय लक्ष्मण, जय जय श्रीराम।’
अनुगत परम अनुज रघुबरके—
‘भरत-शत्रुहन शोभा-धाम॥’
उभय सखा राघवके प्यारे—
‘कपिपति, लंकापति अभिराम।’
परम भक्त निष्काम-शिरोमणि
‘जय श्रीमारुति पूरण-काम॥’
अति उमंगसे बोलो संतत—
‘रघुपति राघव राजाराम।’
मुक्तकंठ हो सदा पुकारो—
‘पतीतपावन सीताराम॥’
(११)
(राग भैरवी ताल-दादरा)
राम राम राम भजो, राम भजो, भाई।
राम-भजन-हीन जनम सदा दुखदाई॥
अति दुरलभ मनुज-देह सहजही में पाई।
मूरख रह्यो राम भूल विषयन मन लाई॥
बालकपन दुख अनेक भोगत ही बिताई।
स्त्री-सुत-धन की अपार चिंता तरुनाई॥
रात-दिवस पसु की ज्यों इत-रह्यो धाई।
तृसना की बेलि बढ़ी पाप-बारि पाई॥
बात-पित्त-कफहु बढ्यो, दुखद जरा आई।
इंद्रिन की शक्ति घटी, सिर धुनि पछिताई॥
इतनेहि में कठिन काल घेरि लियो आई।
मृत्यु-निकट देखि-देखि अति ही भय पाई॥
सोच करत मन-ही-मन अतिसै पछिताई।
हाय मैं न भज्यो राम, कहा करॺो माई॥
मृत्यु प्रान-हरन करत कुटुँब तें छुड़ाई।
महादु:ख रह्यो छाय, बिफल सब उपाई॥
पापन के फल-स्वरूप बुरी जोनि पाई।
दु:ख-भोग करत पुनि नरकन महँ जाई॥
बार-बार जनम-मृत्यु, ब्याधि अरु बुढ़ाई।
झेलत अति कठिन कष्ट, शांति नाहिं पाई॥
यहि विधि भव-दुख अपार बरने नहिं जाई।
भव-भेषज राम-नाम, श्रुति-पुरान गाई॥
राम-नाम जपत त्रिबिध ताप जग-नसाई।
राम-नाम मँगल-करन सब बिधि सुखदाई॥
प्रेम-मगन मन तें सकल कामना बिहाई।
जोइ जपत राम-नाम सोई मुकति पाई॥
(१२)
(राग बिहाग-ताल दादरा)
प्रेम-मुदित मन से कहो राम राम राम।
श्री राम राम राम, श्री राम राम राम॥
पाप कटैं, दु:ख मिटैं, लेत राम-नाम।
भव-समुद्र सुखद नाव एक राम-नाम॥
परम सांति-सुख-निधान नित्य राम-नाम।
निराधार को अधार एक राम-नाम॥
परम गोप्य, परम इष्ट मंत्र राम-नाम।
संत-हृदय सदा बसत एक राम-नाम॥
महादेव सतत जपत दिव्य राम-नाम।
कासि मरत मुक्त करत कहत राम-नाम॥
मात-पिता, बंधु-सखा, सबहि राम-नाम।
भक्त-जनन-जीवन-धन एक राम-नाम॥
(१३)
(राग आसावरी-तीन ताल)
भजौ नित राधा नाम उदार।
जाहि स्याम नित रटत रहत हिय भरि उल्लास अपार॥
चौदह भुवन-लोकत्रय-स्वामी अखिल जगत-आधार।
सोइ नित जाके हाथ बिकानो, करत रहत मनुहार॥
जाके दरस हेतु मुनि तरसत जानि सार-कौ-सार।
सुमिरौ सोइ राधा-पद-पंकज निसि-दिन बारंबार॥
(१४)
(होरी काफी-ताल दीपचन्दी)
और सब भूल भले ही,
श्रीहरिनाम न भूल॥
श्रीहरिनाम सुधामय सब के
हित, सबके अनुकूल।
श्रीहरिनाम-भजन तें पहुँचत
भव-सागर पर-कूल॥
रोग, सोक, संताप, पाप सब,
जैसे सूखी तूल।
भगवन्नाम प्रबल पावक तें
जरैं सकल जड़-मूल॥
जिन्ह हरिनाम-भजन नहिं कीन्हों
जीवन तिन को धूल।
भक्ति रसाल मिलै नहिं कबहूँ,
बोये विषय-बबूल॥
श्रीहरिनाम भयो जिनके मन
जग-जीवन को मूल।
तिन्ह को धन्य जगत महँ जीवन
पातक-पथ-प्रतिकूल॥
(१५)
(राग सोहनी)
चाहता जो परम सुख तू,
जाप कर हरिनामका।
परम पावन, परम सुन्दर,
परम मंगलधामका॥
लिया जिसने है कभी
हरि-नाम भय-भ्रम-भूलसे।
तर गया वह भी तुरत,
बन्धन कटे जड़-मूलसे॥
हैं सभी पातक पुराने
घास सूखेके समान।
भस्म करनेको उन्हें
हरिनाम है पावक महान॥
सूर्य उगते ही अँधेरा
नाश होता है यथा।
सभी अघ हैं नष्ट होते
नामकी स्मृतिसे तथा॥
जाप करते जो चतुर नर
सावधानीसे सदा।
वे न बँधते भूलकर
यम-पाश दारुणमें कदा॥
बात करते, काम करते,
बैठते-उठते समय।
राह चलते नाम लेते
बिचरते हैं वे अभय॥
साथ मिलकर प्रेमसे
हरि-नाम करते गान जो।
मुक्त होते मोहसे
कर प्रेम-अमृत पान सो॥
(१६)
(राग आसावरी-ताल धुमाली)
मेरे एक राम-नाम आधार।
ढूँढ थक्यो पर मिल्यो न दूजो,
भीर परेको यार॥
देखे-सुने अनेक महीपति,
पंडित, साहूकार।
जद्यपि नीति-धरम-धन-संयुत,
नहिं अस परम उदार॥
मात-पिता, भ्राता, नारी, सुत,
सेवक बंधु अपार।
बिपद-काल महँ कोउ न संगी,
स्वारथमय संसार॥
करि करुना दयालु गुरु दीन्हों,
राम-नाम सुख-सार।
दुस्तर भव-सागर महँ अटक्यो
बेरो उतरॺो पार॥