श्रीभगवन्नाम-स्मरण

वंशीविभूषितकरान्नवनीरदाभात्

पीताम्बरादरुणबिम्बफलाधरोष्ठात्।

पूर्णेन्दुसुन्दरमुखादरविन्दनेत्रात्

कृष्णात्परं किमपि तत्त्वमहं न जाने॥

भगवान‍्का नाम कितना पवित्र है, कैसा पावन है, उसमें कितनी शान्ति है, कैसी शक्ति है और उससे क्या हो सकता है? यह कोई नहीं बतला सकता। अथाहकी थाह कौन ले? जिसके माहात्म्यका आरम्भ बुद्धिसे परे पहुँचनेपर होता है, उसका वाणीसे कैसे वर्णन हो सकता है? जिस प्रकार भगवान् अनिर्वचनीय हैं, उसी प्रकार उनके नामका माहात्म्य भी अनिर्वचनीय है। शास्त्रोंमें जो भगवन्नाम-माहात्म्य लिखा है वह वास्तविक माहात्म्यका प्रकाशक नहीं है, वह तो नाम-जपसे लाभ उठानेवाले महानुभावोंके कृतज्ञ हृदयका उद्‍गारमात्र है। वास्तविक माहात्म्य तो कोई कह ही नहीं सकता। जो जिस भावसे भगवान‍्के नामको जपता है उसे अपने उस भावके अनुसार ही लाभ होता है। आज भी भगवन्नामसे लाभ उठानेवाले बहुत लोग हैं। इस विषयमें केवल धार्मिक क्षेत्रके ही नहीं, राजनीतिक क्षेत्रके भी कितने ही महानुभावोंसे मेरी बातें हुई हैं, उन्होंने कहा ही नहीं लिखकर भी दिया है कि ‘हमें भगवन्नामसे परम लाभ हुआ।’

आजकल एक ऐसी शंका होती है कि ‘जहाँ भगवन्नामके माहात्म्यके विषयमें इतना कहा जाता है वहाँ देखनेमें उसके विपरीत क्यों आता है? यदि भगवन्नाममें कोई वास्तविक शक्ति होती तो निरन्तर और अधिक संख्यामें नाम-जप करनेवाले लोगोंमें विशेष परिवर्तन क्यों नहीं देखा जाता? शंका कई अंशोंमें ठीक है, परन्तु बहुत-से कर्म ऐसे होते हैं जिनका परोक्षमें भारी फल होनेपर भी प्रत्यक्षमें नहीं देखा जाता अथवा तत्काल न दीखकर देरसे दीखता है। कई बार पूर्ण फल न होनेके कारण आंशिक रूपमें होनेवाले फलका पता नहीं लगता। एक आदमी बीमार है और उसके कई रोग हैं, दवासे पेटका दर्द दूर हो गया पर अभी ज्वर नहीं छूटा। इससे क्या यह समझना चाहिये कि उसे दवासे कोई लाभ ही नहीं हो रहा है? लाभ होनेमें जो विलम्ब होता है उसमें कुपथ्य ही प्रधान कारण है। हम नाम-जप करनेके साथ ही नामापराध भी बहुत करते हैं। इसके अतिरिक्त श्रद्धा और विश्वासपूर्वक नाम-जप नहीं करते। कहीं बहुत थोड़े मूल्यमें उसे बेच देते हैं। मामूली सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्ति अथवा मान-बड़ाईके बदलेमें उसे खो देते हैं। हम कीर्तन करते हैं और फिर पूछते हैं कि ‘क्यों जी! आज मैंने कैसा कीर्तन किया?’ इस प्रकार अश्रद्धा, अविश्वास, सकामभाव अथवा लोगोंमें बड़ाई पानेके लिये किये जानेवाले नाम-जप-कीर्तनसे वास्तविक फल देरमें हो तो क्या आश्चर्य? नाम-कीर्तनका एक सुन्दर क्रम और स्वरूप श्रीमद्भागवतमें बतलाया गया है—

शृण्वन् सुभद्राणि रथांगपाणे-

र्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके।

गीतानि नामानि तदर्थकानि

गायन् विलज्जो विचरेदसंग:॥

एवंव्रत: स्वप्रियनामकीर्त्या

जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चै:।

हसत्यथो रोदिति रौति गाय-

त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्य:॥

(११।२।३९-४०)

‘चक्रपाणिभगवान‍्के प्रसिद्ध जन्म, कर्म और गुणोंको सुनकर और उनकी ही लीलाओंके अनुरूप नामोंको लज्जा छोड़कर गान करता हुआ, अनासक्तभावसे संसारमें विचरे। इस प्रकारके निश्चयसे प्रियतम प्रभुके नाम-कीर्तनमें प्रेम उत्पन्न होता है, तब वह भाग्यवान् पुरुष प्रेमावेशमें कभी खिलखिलाकर हँसता है, कभी सुबकियाँ भरता है, कभी जोर-जोरसे रोने लगता है, कभी ऊँचे स्वरसे गाने लगता है और कभी उन्मत्तकी भाँति नाच उठता है।’

अपने प्रियतम भगवान‍्के नाम-कीर्तनमें प्रेमावेशके कारण इस प्रकार निर्लज्ज होकर नाच उठना चाहिये, परन्तु उसमें कहीं भी दिखावट या विषयासक्ति नहीं होनी चाहिये। भगवान‍्का नाम हमें आनन्द नहीं देता, इसका कारण यही है कि वह हमें प्रिय नहीं है और नाम प्रिय इसलिये नहीं है कि हमारा भगवान‍्में प्रेम नहीं है। भगवान‍्में प्रेम होता तो नाम-जप प्यारा लगता। प्यारेकी प्रत्येक चीज प्यारी होती है। कहीं-कहीं तो उससे बढ़कर प्यारी होती है। लौकिक सम्बन्धमें भी हम देखते हैं कि जब किन्हीं लड़के-लड़कीका सम्बन्ध हो जाता है, तब घरमें किसीसे एक-दूसरेका नाम सुनकर या उनके विषयमें कोई बात सुनकर वे अपने हृदयमें एक प्रकारकी गुदगुदी-सी अनुभव करने लगते हैं। प्यारेका वस्त्र, प्यारेका भोजन यहाँतक कि प्यारेकी फटी जूती भी प्यारी होती है। जब लौकिक प्रेमकी ऐसी बात है,तब भगवत्प्रेमके विषयमें तो कहना ही क्या है। शृंगवेरपुरमें भरतजी भगवान‍्के शयनके स्थानमें उनके अंगसे स्पर्शित ‘कुशसाथरी’ को देखकर प्रेमानन्दमें मग्न हो गये थे। अक्रूरजी भगवान‍्के चरणचिह्नोंको देखकर तन-मनकी सुधि भूल गये थे। आज भी जब हम व्रजभूमिको देखते हैं, तब स्वत: ही हमें भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति हो आती है और उसमें एक अनोखा आनन्द मिलता है। प्रेम और आनन्दका अविनाभावी सम्बन्ध है, जहाँ प्रेम है वहाँ आनन्द है ही। इसीसे गोपियोंके प्रेमका महत्त्व है। भगवान् श्रीकृष्ण और श्रीमतीराधारानी इसी प्रेम और आनन्दके मूर्तिमान् रूप हैं। भगवान‍्का जो आनन्दस्वरूप है वही श्रीमतीराधा हैं। राधारानीके प्रेमास्पद भगवान् हैं और भगवान‍्की प्रेमास्पदा श्रीराधा हैं। प्रेमका स्वभाव है ‘तत्सुखे सुखित्वम्’ प्रेमास्पदके सुखमें सुखी होना, यही काम और प्रेमका अन्तर है। काममें अपने सुखकी इच्छा है और प्रेममें प्रियतमके सुखकी। राधाजी श्रीकृष्णको सुख पहुँचानेके लिये ही अवतीर्ण हुई हैं और अपनी सेवासे श्रीकृष्णको आनन्द होता देखकर परम सुखी होती हैं। इधर राधाजीको सुखी देखकर श्रीकृष्णके सुखकी वृद्धि होती है और श्रीकृष्णके सुखकी वृद्धिसे राधाजीका सुख और भी बढ़ जाता है। इस प्रकार एक-दूसरेके आनन्दसे दोनोंका आनन्द उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है। यह उत्तरोत्तर बढ़नेवाला आनन्द ही भगवान‍्का नित्यरास है। प्रेममें यही तो विलक्षणता है। इसमें कहीं ‘अलम्’ नहीं होता। प्रेमका स्वरूप ही है—‘प्रतिक्षणवर्धमानम्’। प्रेमास्पदका सुख ही अपना सुख है। चाहे उसका वह सुख प्रेमीके लिये लोक-दृष्टिसे कितना ही कष्टकर क्यों न हो। प्रेमी चातककी भावना है—

जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास।

तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस॥

रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग।

तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग॥

बरषि परुष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक।

तुलसी परी न चाहिए चतुर चातकहि चूक॥

चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष।

तुलसी प्रेम पयोधि की तातें नाप न जोष॥

हम जो संसारके दु:खोंसे घबरा उठते हैं इसका कारण क्या है? यही कि हम उनमें प्रेमास्पद भगवान‍्की रुचिको, उनके विधानको नहीं देखते। कठोर आघातमें उनके सुकोमल करकमलका स्पर्श नहीं पाते। परंतु भगवान‍्का प्रेमी भक्त किसी कष्टसे नहीं घबराता, क्योंकि वह प्रत्येक वस्तुमें भगवान‍्का स्पर्श पाता है। वास्तवमें भगवान‍्का प्रेमी भक्त सब कष्टोंसे परे पहुँचा हुआ होता है, उसका जीवन भगवत्सेवामय होता है। वह सेवाको छोड़कर मुक्ति भी नहीं चाहता। मुक्ति तो वह चाहता है जो किसी बन्धनका अनुभव करता हो। भगवत्प्रेमका बन्धन तो सारे बन्धनोंके छूट जानेपर होता है और इस प्रेमबन्धनसे भक्त कभी मुक्त होना चाहता नहीं। जो इस प्रेमबन्धनसे मुक्ति चाहता है वह भक्त कैसा? इसीसे कहा गया है—

दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जना:॥

(श्रीमद्भा०३।२९।१३)

अर्थात् ‘भक्तजन देनेपर भी मेरी सेवाको छोड़कर मुक्ति आदिको स्वीकार नहीं करते। इस प्रेमसाधनाके सम्बन्धमें गीताके दो श्लोक बड़े महत्त्वके हैं। श्रीभगवान् कहते हैं—

मच्चित्ता मद्‍गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।

कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

(१०।९-१०)

‘जिनका चित्त मुझमें लगा है, जिनके प्राण मुझमें फँसे हैं, जो नित्य आपसमें मेरी ही महत्ताको समझते-समझाते प्रेम करते हैं, जो मेरी ही बात कहते हैं, मुझमें संतुष्ट हैं और निरन्तर मुझमें ही रमण करते हैं, उन निरन्तर मुझमें लगे हुए प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं अपना वह बुद्धियोग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।’

इन श्लोकोंमें जिस साधनाकी ओर संकेत है, प्रेमियोंके जीवनका वह स्वभाव होता है। इसीसे भगवान‍्ने भागवतमें इस बातको स्वीकार किया है कि गोपियोंने अपना मन मुझे अर्पण कर दिया, गोपियोंके प्राण मद्‍गतप्राण हैं, गोपियाँ मेरी ही चर्चा करती हैं, मैं ही एकमात्र उनका इष्ट हूँ, मुझमें ही उनकी एकान्त प्रीति है।

गोपियोंने भगवान‍्का नाम रखा था—चित्तचोर। क्या मधुर नाम है? अहा! हम सबकी भी यही इच्छा रहनी चाहिये कि भगवान् हमारा चित्त चुरा लें। कुछ सज्जनोंको भगवान‍्के लिये इस ‘चोर’ शब्दपर बड़ी आपत्ति है। उनके विचारसे श्रीमद्भागवतमें जो माखन चोरी आदिकी बात है वह भगवान‍्के चरित्रमें कलंकरूप ही है। पर असलमें बात ऐसी नहीं प्रतीत होती। पहली बात तो यह है, उस समय भगवान् बालकस्वरूप थे, इसलिये उनकी चोरी आदिकी प्रवृत्ति किसी दूषित बुद्धिके कारण नहीं मानी जाती, वह केवल उनकी बाल-सुलभ लीला ही थी; परन्तु वास्तवमें सच पूछा जाय तो क्या कोई यह कह सकता है कि भगवान् श्रीकृष्णने कभी किसी ऐसी गोपीका माखन चुराया था जो ऐसा नहीं चाहती थी। गोपियाँ तो इसीलिये अच्छे-से-अच्छा माखन रखती थीं और ऐसी जगह रखती थीं जहाँ भगवान‍्का हाथ पहुँच सके और वह हृदयकी अत्यन्त उत्कट इच्छाके साथ यह प्रतीक्षा करती रहती थीं कि कब श्यामसुन्दर आवें और हमारी इस समर्पणपद्धतिको स्वीकारकर मित्रोंसहित माखनका भोग लगावें और कब हम उस मधुर झाँकीको देखकर कृतार्थ हों। यही तो उनकी प्रेमसाधना थी। इन गोपियोंके माहात्म्यको कौन कह सकता है, जो निरन्तर चित्तचोरकी श्यामसुन्दर-मूर्तिकी झाँकीके लिये उत्सुक रहती थीं और पलकोंका अदर्शन असह्य होनेके कारण पलक बनानेवाले ब्रह्माजीको कोसा करती थीं। गोपियोंकी इस प्रेमनिष्ठाके विषयमें श्रीमद्भागवत (१०। ४४।१५) में कहा है—

या दोहनेऽवहनने मथनोपलेप-

प्रेङ्खेङ्खनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ।

गायन्ति चैनमनुरक्तधियोऽश्रुकण्ठ्यो

धन्या व्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना:॥

‘जो व्रजयुवतियाँ गौओंको दूहते समय, धान आदि कूटते समय, दही बिलोते समय, आँगन लीपते समय, बालकोंको पालना झुलाते समय, रोते हुए बच्चोंको लोरी देते समय, घरोंमें झाड़ू देते समय प्रेमपूर्ण मनसे आँखोंमें आँसू भरकर गद्‍गद वाणीसे श्रीकृष्णका नाम-गुणगान किया करती हैं उन श्रीकृष्णमें चित्त निवेशित करनेवाली गोपरमणियोंको धन्य है।’

इस प्रकार गोपियोंका चित्त हर समय श्रीश्यामसुन्दरमें ही लगा रहता था। घरके सारे धंधोंको करते हुए भी उन्हें अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी एक क्षणको भी विस्मृति नहीं होती थी। उद्धवने जब गोपियोंको योगकी शिक्षा दी, तब उस समय उन्होंने उद्धवसे यही कहा कि आप उन्हें योग सिखाइये जिन्हें वियोग हो, हमारा तो श्रीश्यामसुन्दरके साथ नित्यसंयोग है। वे बोलीं—

स्याम तन, स्याम मन, स्याम है हमारो धन,

आठों जाम ऊधो हमें स्याम ही सो काम है।

स्याम हिये, स्याम जिये, स्याम बिनु नाहिं तिये,

आँधेकी-सी लाकरी अधार स्याम नाम है॥

स्याम गति, स्याम मति, स्याम ही है प्रानपति,

स्याम सुखदाई सो भलाई सोभाधाम है।

ऊधो तुम भये बौरे, पाती लैके आये दौरे,

जोग कहाँ राखैं, यहाँ रोम-रोम स्याम है॥

गोपियाँ हर समय सब कुछ श्याममय ही देखती थीं। इस सम्बन्धमें एक प्रसंग है। एक बार कई गोपियाँ मिलकर बैठीं। उस समय यह प्रश्न हुआ कि श्रीकृष्ण श्याम क्यों हैं? माता यशोदा और बाबा नन्द दोनों ही गौरवर्ण हैं। बलदेवजी भी गौरवर्ण हैं, फिर ये साँवले क्यों हुए? इसपर किसीने कुछ कहा और किसीने कुछ। अन्तमें एक व्रजनागरी बोली—

कजरारी अँखियानमें, बसो रहत दिन-रात।

प्रीतम प्यारो हे सखी, ताते साँवर गात॥

‘अहो! आठों पहर काजलभरी आँखोंमें रहनेके कारण ही वह काला हो गया है। कितना ऊँचा सिद्धान्त है? ऐसे महात्माको गीता भी परम दुर्लभ बतलाती है—‘वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥’ किंतु यहाँ तो वह सिद्धान्त ही नहीं, प्रत्यक्ष प्रकट स्वरूप था। गोपियोंकी आँखोंमें श्यामके सिवा और किसीका प्रतिबिम्ब ही नहीं पड़ता था। उनकी आँखोंके सामने आते ही सब कुछ साकार श्यामस्वरूप हो जाता था।

बावरी वे अँखियाँ जरि जायँ

जो साँवरो छाँड़ि निहारति गोरो।

गोपियोंका भगवान‍्के प्रति प्रियतमभाव था। उनसे बढ़कर ‘मच्चित्ता मद्‍गतप्राणा:’ और कौन हो सकता है? चित्त भगवन्मय हो जाय, उसपर भगवान‍्का स्वत्व हो जाय। यह नहीं कि हम उसके द्वारा भगवान‍्का भजन करें। उसपर भगवान‍्का ही पूरा अधिकार हो जाना चाहिये। ऐसी स्थिति उन व्रजसुन्दरियोंको ही प्राप्त हुई थी। इसीसे उद्धवको गोपिकाओंके पास भेजते समय भगवान् उनसे कहते हैं—

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिका:।

ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थे तान्बिभर्म्यहम्॥

(श्रीमद्भा०१०।४६।४)

वे करती क्या थीं? वे जहाँ बैठतीं अपने प्रियतम भगवान‍्की ही चर्चा किया करती थीं। उसीका गान करती थीं, उसीमें संतुष्ट रहती थीं और एकमात्र उसीमें रमती थीं। यह भगवत्प्रेमियोंका संग बहुत दुर्लभ है। एक सत्संग वह है जिससे चित्त शुद्ध होता है, फिर शुद्ध चित्तमें ज्ञानोदय होता है और उसके पश्चात् भगवत्प्राप्ति होती है; किंतु यह वह सत्संग है जिसके लवमात्रके साथ मोक्षकी भी तुलना नहीं होती। श्रीमद्भागवत (१।१८।१३)-में कहा है—

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्।

भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिष:॥

अर्थात् ‘भगवत्प्रेमियोंका जो लवमात्रका संग है उसके साथ हम स्वर्ग और मोक्षकी भी तुलना नहीं कर सकते, फिर साधारण मानव-भोगोंके विषयमें तो कहना ही क्या है?’ इसीसे भक्तजन कभी मोक्ष नहीं चाहते। उनकी तो यही इच्छा रहती है कि भगवत्प्रेमी मिलकर सदा प्रियतम भगवान‍्की मधुर चर्चा किया करें। यही गोपियोंका भी सत्संग था।

एक वैष्णव-ग्रन्थमें श्रीमती राधाजी कहती हैं कि ‘ऐसा मन होता है, मेरे लाखों आँखें हों तो श्यामसुन्दरके दर्शनका कुछ आनन्द आवे। लाखों कान हों तो श्यामनामके श्रवणका सुख मिले।’ यह कोई कल्पना नहीं है। प्रेम चीज ही ऐसी है। जिस दिन हमें भगवान‍्में प्रेम हो जायगा, उस दिन उनका नाम हमें इतना प्राणप्यारा होगा कि वह हमारे जीवनकी सबसे बढ़कर आवश्यक चीज बन जायगा। जबतक हमारा भगवान‍्में प्रेम नहीं होता तभीतक हमें माला आदिकी आवश्यकता है। प्रेम होनेपर तो प्रियतमके नामोच्चारणमात्रसे हमारी नस-नस नाच उठेगी। हम अपने प्रियतमके प्रेममें इतना उन्मत्त हो जायँगे कि हमारे रोम-रोमसे भगवन्नामकी ध्वनि होने लगेगी। फिर यह जाननेकी इच्छा कभी नहीं होगी कि मैंने कैसा कीर्तन किया। यथार्थ कीर्तनका यही स्वरूप है। मेरा यह कथन नहीं है कि वर्तमान कीर्तन करनेवाले सभीको ऐसी लोकैषणा रहती है। मेरा अभिप्राय केवल यही है कि कीर्तन करते समय हमारा यह लक्ष्य नहीं होना चाहिये कि सुननेवाले लोग हमारे कीर्तनको अच्छा कहें, बल्कि यही लक्ष्य हो कि हम उसमें तन्मय हो जायँ। द्रौपदीके एक नामपर ही भगवान् प्रकट हो गये थे; परन्तु हुए उसी समय थे जब उसने सबका आश्रय छोड़कर परम निर्भरतासे भगवान‍्को पुकारा था।

एक कसौटी और है, भगवन्नामका आश्रय लेनेवालेको यह देखते रहना चाहिये कि हमारे अन्दर दैवी सम्पत्ति बढ़ रही है या नहीं? यदि दैवी सम्पत्तिकी वृद्धि दिखायी न दे तो समझना चाहिये कि हमारा भगवन्नाम-कीर्तन नामापराधसहित है। भगवद्भजनसे दैवी सम्पत्तिकी वृद्धि होनी ही चाहिये। जिस प्रकार भगवत्प्रेमीमें दैवी सम्पत्ति होना अनिवार्य है उसी प्रकार दैवी सम्पत्ति भी बिना भगवत्प्रेमके टिक नहीं सकती। देवर्षि नारदने कहा है कि भगवन्नाममें एक विलक्षण शक्ति है। उससे भगवत्प्रेमकी स्वाभाविक ही वृद्धि होती है और भगवत्प्रेममें दैवी सम्पदाका पूरा प्राकट्य होना ही चाहिये। आजकल ऐसा नहीं होता, इससे जान पड़ता है कि हमारे भजनमें कोई दोष है। श्रीचैतन्यमहाप्रभुमें यह विलक्षण शक्ति बहुत अधिक देखी जाती थी। बड़े-बड़े दिग्गज विद्वान् इसलिये उनके कीर्तनके समीप होकर निकलनेमें डरते थे कि वे कहीं उसी रंगमें न रँग जायँ और यदि कोई उनके कीर्तनको देख लेता, उनका स्पर्श पा लेता तो वह उन्मत्त हुए बिना रहता नहीं। परंतु महाप्रभुको भी बड़ी सावधानीसे यह शक्ति अर्जन करनी पड़ी थी। एक बार श्रीवासके घर कीर्तन होता था। उस दिन उसमें आनन्दकी स्फूर्ति नहीं हुई। तब श्रीमहाप्रभुजीने कहा, ‘देखो यहाँ कोई बाहरका आदमी तो नहीं है।’ इधर-उधर देखनेपर एक ब्राह्मणदेवता मिले, जो कीर्तनके प्रेमी नहीं थे। तब सब लोगोंने प्रार्थना करके उन्हें विदा किया। उसके पश्चात् कीर्तन किया गया। तब रस आया। कीर्तनके श्रवणसे वे ब्राह्मणदेवता भी पवित्र हो गये। अत: भक्तको सब प्रकारके कुसंगसे बचना चाहिये।

हमलोगोंको भी इस बातका संकल्प करना चाहिये कि हम तन्मय होकर श्रद्धा-विश्वाससहित निष्कामभावसे प्रेमपूर्वक भगवन्नामका जप, स्मरण और कीर्तन करें। निष्कामभाव यहाँतक हो कि हमें तो बस भगवन्नामका जप और कीर्तन ही करना है, यह नहीं देखना है कि इससे भगवान् भी रीझते हैं या नहीं।