श्रीकृष्ण-नाम-महिमाष्टक

एक बहुत सुन्दर श्रीकृष्ण-नाम-महिमाष्टक है—उसे नीचे अनुवाद-सहित दिया जा रहा है।

निखिलश्रुतिमौलिरत्नमाला-

द्युतिनीराजितपादपंकजान्त ।

अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं

परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि॥

‘सम्पूर्ण उपनिषद्रूप रत्नमालाकी कान्तिके द्वारा तुम्हारे चरणकमलोंका नखरूप प्रान्तभाग नीराजित हो रहा है और संसारसे मुक्त (नारद-सनकादि) मुनि तुम्हारी उपासनामें लगे हैं। इस प्रकारके हे श्रीहरिनाम! मैं तुम्हारा आश्रय लेता हूँ।’

जय नामधेय मुनिवृन्दगेय

जनरंजनाय परमक्षराकृते।

त्वमनादरादपि मनागुदीरितं

निखिलोग्रपापपटली विलुम्पसि॥

‘मुनिवृन्द सदा तुम्हारा गान करते हैं और जनसमूहका सच्चा मनोरंजन करनेके लिये तुमने परम अक्षररूप शरीर धारण कर रखा है; अनादर (अश्रद्धा)-से भी कोई यदि तुम्हारा थोड़ा भी उच्चारण करता है तो तुम्हारी कृपासे उसके सम्पूर्ण उग्र पाप भी विलुप्त हो जाते हैं। अतएव हे नामधेय! तुम्हारी जय हो।’ (तुम इसी प्रकार सबकी पापराशिका नाश करते हुए सदा उत्कर्षको प्राप्त करते रहो।)

यदाभासोऽप्युद्यन् कवलितभवध्वान्तविभवो।

दृशं तत्त्वान्धानामपि दिशति भक्तिप्रणयिनीम्।

जनस्तस्योदात्तं जगति भगवन्नाम तरणे॥

कृती ते निर्वक्तुं क इह महिमानं प्रभवति॥

‘हे भगवन्नाम-सूर्य! तुम किसी भी संकेतसे यदि उच्चारित हो जाते हो तो आवागमनरूप अन्धकारका ग्रास करके तत्त्व-दृष्टिसे अंधे मनुष्योंको भी श्रीकृष्णभक्तिको प्राप्त करानेवालोंको दृष्टि दे देते हो; अतएव इस जगत‍्में ऐसा कौन विद्वान् पुरुष होगा, जो तुम्हारी उदात्त महिमाका वर्णन कर सके?’

यद् ब्रह्मसाक्षात्कृतिनिष्ठयापि

विनाशमायाति विना न भोगै:।

अपैति नाम स्फुरणेन तित्ते

प्रारब्धकर्मेति विरौति वेद:॥

‘जो प्रारब्धकर्म ब्रह्म-साक्षात्कारकी निष्ठा (दृढ़ स्थिति) हो जानेपर भी भोग किये बिना कभी नष्ट नहीं होते, वेद कहते हैं कि वे ही सब पाप-पुण्यके बुरे-भले फलरूप प्रारब्धकर्म, हे नामदेवता! जीभपर तुम्हारा स्फुरण होते ही नष्ट हो जाते हैं।’

अघदमनयशोदानन्दनौ नन्दसूनो

कमलनयन गोपीचन्द्र वृन्दावनेन्द्र।

प्रणतकरुणकृष्णावित्यनेकस्वरूपे

त्वयि मम रुचिरुच्चैर्वर्द्धतां नामधेय॥

‘अघदमन, यशोदानन्दन, नन्दसुत, कमलनयन, गोपीचन्द्र, वृन्दावनेन्द्र, प्रणतकरुण, कृष्ण—इस प्रकार अनेक स्वरूपोंमें तुम्हारा प्राकट्य हो रहा है। हे नामधेय! तुम्हारे प्रति मेरी रुचि सदा बढ़ती रहे।’

वाच्यं वाचकमित्युदेति भवतो

नाम स्वरूपद्वयं

पूर्वस्मात् परमेव हन्त करुणं

तत्रापि जानीमहे।

यस्तस्मिन् विहितापराधनिवह:

प्राणी समन्ताद्भवे-

दास्येनेदमुपास्य सोऽपि हि सदा-

नन्दाम्बुधौ मज्जति॥

‘हे नामभगवन्! वाच्य अर्थात् विभु, सच्चिदानन्दात्मक श्रीविग्रह और वाचक अर्थात् श्रीकृष्ण-राम-गोविन्द आदि वर्णात्मक—आपके दो स्वरूप इस जगत‍्में सुशोभित हैं; परंतु इनमेंसे हमलोग विभु सच्चिदानन्दस्वरूपकी अपेक्षा वाचक नाम-स्वरूपको ही दयालु जानते हैं; क्योंकि कोई प्राणी यदि विभुस्वरूपके सब ओरसे अपराध-पर-अपराध करता है तो मुखसे (उच्चारणमात्रके द्वारा) नामस्वरूपकी उपासना करके वह भी अपराधसे रहित होकर सदा आनन्द-सागरमें निमग्न हो जाता है।’

सूदिताश्रितजनार्तिराशये

रम्यचिद्घनसुखस्वरूपिणे।

नाम गोकुलमहोत्सवाय ते

कृष्ण पूर्ववपुषे नमो नम:॥

‘हे नामरूप कृष्ण! तुम आश्रितजनोंके दु:खोंका नाश करते हो; भक्तोंके हृदयमें रमणीय चिद्घन आनन्दरूपसे रहते हो तथा गोकुलवासियोंके लिये मूर्तिमान् उत्सवस्वरूप ही हो और अपने माधुर्यादिसे परिपूर्ण विग्रह हो। तुमको बार-बार नमस्कार है।’

नारदवीणोज्जीवन सुधोर्मिनिर्यासमाधुरीपूर।

त्वं कृष्णनाम काम स्फुर मे रसने रसेन सदा॥

‘हे कृष्ण-नाम! तुम नारदकी वीणाके जीवन हो, अमृत-तरंगोंके साररूप माधुर्यसे पूर्ण हो। तुम मेरी रसना (जीभ)-पर सदा रसमय होकर स्फुरित होते रहो—प्रेमोल्लासके साथ परमानन्दसुधाका अनुभव करती हुई मेरी जीभ सदा तुमको अपने अग्रभागपर नचाती रहे।’

यह एक ‘नाम-महिमाष्टक’ है। ऐसे ही और भी नाम-महिमाष्टक हैं।