श्रीराधा-नामकी महिमा
परमप्रिय श्रीराधा-नामकी महिमाका स्वयं श्रीकृष्णने यों गान किया है—
‘रा’ शब्दं कुर्वतस्त्रस्तो ददामि भक्तिमुत्तमाम्।
‘धा’ शब्दं कुर्वत: पश्चाद् यामि श्रवणलोभत:॥
‘जिस समय मैं किसीके मुखसे ‘रा’ सुन लेता हूँ, उसी समय उसे अपनी उत्तम भक्ति—प्रेम दे देता हूँ और ‘धा’ शब्दका उच्चारण करनेपर तो मैं प्रियतमा श्रीराधाका नाम-श्रवण करनेके लोभसे उसके पीछे-पीछे चलने लगता हूँ।’
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श्रुतियाँ इनके निम्नांकित नामोंका गान करती हैं—
राधा, रासेश्वरी, रम्या, कृष्णमन्त्राधिदेवता, सर्वाद्या, सर्ववन्द्या, वृन्दावन-विहारिणी, वृन्दाराध्या, रमा, अशेषगोपीमण्डलपूजिता, सत्या, सत्यपरा, सत्यभामा, श्रीकृष्णवल्लभा, वृषभानुसुता, गोपी, मूलप्रकृति, ईश्वरी, गन्धर्वा, राधिका, आरम्या, रुक्मिणी, परमेश्वरी, परात्परतरा, पूर्णा, पूर्णचन्द्रनिभानना, भुक्तिमुक्तिप्रदा, भवव्याधिविनाशिनी।
—इन अट्ठाईस नामोंका जो पाठ करते हैं, वे जीवन्मुक्त हो जाते हैं—
ऐसा भगवान् श्रीब्रह्माजीने कहा है।
(श्रीराधिकोपनिषद्)
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श्रीदेवीभागवतमें श्रीराधाजीके मन्त्र, उपासना, स्वरूप और भगवान् नारायणके द्वारा उनकी स्तुतिका वर्णन है, जो संक्षेपमें इस प्रकार है—
भगवती श्रीराधाका वाञ्छाचिन्तामणि सिद्ध मन्त्र है—‘ॐ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा’। असंख्य मुख और असंख्य जिह्वावाले भी इस मन्त्रका माहात्म्य वर्णन करनेमें असमर्थ हैं। मूल-प्रकृति श्रीराधाके आदेशसे सर्वप्रथम भगवान् श्रीकृष्णने भक्तिपूर्वक इस मन्त्रका जप किया था और फिर उन्होंने विष्णुको, विष्णुने विराट् ब्रह्माको, ब्रह्माने धर्मको और धर्मने मुझ नारायणको इसका उपदेश किया। तबसे मैं निरन्तर इस मन्त्रका जप करता हूँ, इसीसे ऋषिगण मेरा सम्मान करते हैं। ब्रह्मा आदि समस्त देवता नित्य प्रसन्नचित्तसे श्रीराधाकी उपासना करते हैं।
कृष्णार्चाया नाधिकारो यतो राधार्चनं विना।
वैष्णवै: सकलैस्तस्मात् कर्तव्यं राधिकार्चनम्॥
कृष्णप्राणाधिका देवी तदधीनो विभुर्यत:।
रासेश्वरी तस्य नित्यं तया हीनो न तिष्ठति।
राध्नोति सकलान् कामांस्तस्माद् राधेति कीर्तिता॥
(श्रीदेवीभागवत९।५०।१६—१८)
‘‘क्योंकि श्रीराधाकी पूजा किये बिना मनुष्य श्रीकृष्णकी पूजाके लिये अनधिकारी माना जाता है, इसलिये वैष्णवमात्रका कर्तव्य है कि वे श्रीराधाकी पूजा अवश्य करें। श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्राणाधिका देवी हैं। कारण, भगवान् इनके अधीन रहते हैं। ये नित्य-रासेश्वरी भगवान्के रासकी नित्य-स्वामिनी हैं। इनके बिना भगवान् रह ही नहीं सकते। ये सम्पूर्ण कामनाओंको सिद्ध करती हैं, इसीसे ये ‘राधा’ नामसे कही जाती हैं।’’
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श्रीराधारानीके प्रसिद्ध सोलह नाम पुराणोंमें आते हैं। यहाँ हम उन नामोंका जयघोष करें तथा उनका अर्थ समझनेका किंचित् प्रयास करें—
जय जय ‘राधा’ ‘रासेश्वरि’, जय
‘रासवासिनी’, जय जय जय।
‘रसिकेश्वरी’, जयति जय ‘कृष्ण-
प्राणाधिका’ नित्य जय जय॥
‘कृष्णस्वरूपिणि’, ‘कृष्णप्रिया’, जय
‘परमानन्दरूपिणी’ जय।
‘कृष्ण-वाम-अँग-सम्भूता’,
जय ‘कृष्णा’ ‘वृन्दा’ जय जय जय॥
‘वृन्दावनी’ जयति, जय ‘वृन्दा-
वनविनोदिनी’, जय जय जय।
‘चन्द्रावति’, ‘शतचन्द्रनिभमुखी’,
‘चन्द्रकान्ता’ जय जय जय॥
श्रीराधाजीके राधा, रासेश्वरी, रासवासिनी, रसिकेश्वरी, कृष्णप्राणाधिका, कृष्णप्रिया, कृष्णस्वरूपिणी, कृष्णा, परमानन्दरूपिणी, कृष्णवामांगसम्भूता, वृन्दावनी, वृन्दा, वृन्दावनविनोदिनी, चन्द्रावती, चन्द्रकान्ता और शतचन्द्रप्रभानना—ये सोलह नाम प्रसिद्ध हैं। इन्हें साररूप मानते हैं।
ये सम्पूर्णरूपसे सहज ही कृतकृत्य हैं, सिद्ध हैं, इससे उनका नाम, ‘राधा’ है। अथवा ‘रा’ का अर्थ है देना और ‘धा’ का अर्थ है—निर्वाण। अत: वे मोक्ष—निर्वाण देनेवाली हैं, इससे राधा कहलाती हैं। वे रासेश्वरी रासेश्वर श्यामसुन्दरकी अर्धांगिनी हैं अथवा रासकी सारी लीला उन्हींके मधुरतम ऐश्वर्यका प्रकाश है, इसलिये वे ‘रासेश्वरी’ कहलाती हैं। नित्य-रासमें उनका नित्य निवास है, अतएव उनको ‘रासवासिनी’ कहते हैं। वे समस्त रसिक देवियोंकी सर्वश्रेष्ठ स्वामिनी हैं, अथवा रसिकशिरोमणि श्रीकृष्ण उनको अपनी स्वामिनी मानते हैं। इसलिये वे ‘रसिकेश्वरी’ कहलाती हैं। सर्वलोकमहेश्वर, सर्वमय और सर्वातीत परमात्मा श्रीकृष्णको वे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, इसलिये उन्हें ‘कृष्णप्राणाधिका’ कहा जाता है। वे श्रीकृष्णकी परम वल्लभा हैं या श्रीकृष्ण उन्हें सदा परम प्रिय हैं, अतएव उन्हें ‘कृष्णप्रिया’ कहते हैं। वे स्वरूपत:—तत्त्वत: श्रीकृष्णसे सर्वथा अभिन्न हैं, समग्ररूपसे श्रीकृष्णके समान हैं एवं लीलासे ही वे श्रीकृष्णका यथार्थ स्वरूप धारण करनेमें भी समर्थ हैं, इसलिये वे ‘कृष्णस्वरूपिणी’ कहलाती हैं। वे परम सती एक समय श्रीकृष्णके वाम अर्धांगसे प्रकट हुई थीं, इसलिये उनको ‘कृष्णवामांगसम्भूता’ कहते हैं। भगवत्स्वरूपा परमानन्दकी राशि ही उन परम सतीशिरोमणिके रूपमें मूर्तिमती हुई हैं तथा भगवान्की अभिन्न परम-आनन्द स्वरूपा आह्लादिनी शक्ति हैं, इसीसे उनका एक नाम ‘परमानन्दरूपिणी’ प्रसिद्ध है। ‘कृष्’ धातु मोक्षवाचक है, ‘न’ उत्कृष्टका द्योतक है और ‘आ’ देनेवालीका बोधक है; इस प्रकार वे श्रेष्ठ मोक्ष प्रदान करती हैं अथवा वे श्रीकृष्णकी ही तत्त्वत: नित्य अभिन्न परन्तु लीलासे भिन्नस्वरूपता हैं। अत: उनको ‘कृष्णा’ कहते हैं। ‘वृन्द’ शब्द सखियोंके समुदायका वाचक है और ‘अ’ सत्ताका बोधक है। सखीवृन्द उनका है—वे सखीवृन्दकी स्वामिनी हैं, इसलिये ‘वृन्दा’ कहलाती हैं। वृन्दावन उनकी मधुर लीलास्थली है। विहारभूमि है, इससे उन्हें ‘वृन्दावनी’ कहा जाता है। वृन्दावनमें उनका विनोद (मनोरंजन) होता है अथवा उनके कारण वृन्दावनको आमोद प्राप्त होता है, इसीलिये वे ‘वृन्दावन-विनोदिनी’ कहलाती हैं। उनकी नखावली चन्द्रमाओंकी पंक्तिके समान सुशोभित है अथवा उनका मुख पूर्णचन्द्रके सदृश है, इससे उनको ‘चन्द्रावती’ कहते हैं। उनके दिव्य शरीरपर अनन्त चन्द्रमाओंकी-सी कान्ति सदा-सर्वदा जगमगाती रहती है, इसीलिये वे ‘चन्द्रकान्ता’ कही जाती हैं और उनके मुखपर नित्य-निरन्तर सैकड़ों चन्द्रमाओंकी ज्योत्स्ना झलमल करती रहती है, इसीसे उनका नाम है ‘शतचन्द्रनिभानना’।
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श्रीकृष्ण कहते हैं—राधा मुझे इतनी अधिक प्रिय हैं कि—
राधासे भी लगता मुझको
अधिक मधुर प्रिय राधा-नाम।
‘राधा’ शब्द कानमें पड़ते
ही खिल उठती हिय-कली तमाम॥
मूल्य नित्य निश्चित है मेरा
प्रेम-प्रपूरित राधा-नाम।
चाहे जो खरीद ले, ऐसा,
मुझे सुनाकर राधा-नाम॥
नारायण, शिव, ब्रह्मा, लक्ष्मी,
दुर्गा, वाणी मेरे रूप।
प्राण-समान सभी प्रिय मेरे,
सबका मुझमें भाव अनूप॥
पर राधा प्राणाधिक मेरी
अतिशय, प्रिय प्रियजन सिरमौर।
राधा-सा कोई न कहीं है
मेरा प्राणाधिक प्रिय और॥
अन्य सभी ये देव, देवियाँ
बसते हैं नित मेरे पास।
प्रिया राधिकाका है मेरे
वक्ष:स्थलपर नित्य निवास॥
—उन राधासे भी उनका ‘राधा’ नाम मुझे अधिक मधुर और प्यारा लगता है। ‘राधा’ शब्द कानमें पड़ते ही मेरे हृदयकी सम्पूर्ण कलियाँ खिल उठती हैं। प्रेमसे परिपूरित ‘राधा’ नाम मेरा नित्य निश्चित—सदा बँधा-बँधाया मूल्य है। कोई भी ऐसा प्रेम-परिपूर्ण राधा-नाम सुनाकर मुझे खरीद ले सकता है। नारायण, शिव, ब्रह्मा, लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती—ये सब मेरे ही रूप हैं। ये सभी मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं और इन सबका भी मुझमें बड़ा अनुपम भाव है। परन्तु राधा तो मुझे प्राणोंसे भी अतिशय अधिक प्यारी है। वह समस्त प्रिय प्रेमीजनोंकी मुकुटमणि है। राधाके सदृश प्राणाधिकप्रिय दूसरा कहीं कोई भी नहीं है। ये अन्यान्य सभी देव-देवियाँ नित्य मेरे समीप रहती हैं, पर मेरी प्रियतमा राधिका तो सदा-सर्वदा मेरे वक्ष:स्थलपर ही निवास करती है।
इस ‘राधा’ नामका अर्थ और महत्त्व बतलाते हुए शास्त्र कहते हैं—
रेफो हि कोटिजन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम्।
आकाराद् गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् ॥
धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम्।
श्रवणस्मरणोक्तिभ्य: प्रणश्यन्ति न संशय:॥
‘राधा’ नामके पहले अक्षर ‘र’ का उच्चारण करते ही करोड़ों जन्मोंके संचित पाप और शुभ-अशुभ-कर्मोंके भोग नष्ट हो जाते हैं। आकार (।) के उच्चारणसे गर्भवास (जन्म), मृत्यु और रोग आदि छूट जाते हैं। ‘ध’ के उच्चारणसे आयुकी वृद्धि होती है और आकार (।) के उच्चारणसे जीव भव-बन्धनसे मुक्त हो जाता है। इस प्रकार ‘राधा’ नामके श्रवण, स्मरण और उच्चारणसे कर्मभोग, गर्भवास और भव-बन्धनादि एक ही साथ नष्ट हो जाते हैं—इसमें कोई संदेह नहीं—
रेफो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे।
सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्ध्योघमीश्वरम्॥
धकार: सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च।
ददाति सार्ष्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरे: समम्॥
आकारस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरे यथा।
योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम्॥
श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम्।
रोगशोकमृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशय:॥
‘राधा’ नामके अन्तर्गत राकारके उच्चारणसे मनुष्य श्रीकृष्ण-चरण-कमलमें निश्चला भक्ति और भगवान्के दासत्वको प्राप्त करके समस्त अभिलषित पदार्थ, सदानन्द और समस्त सिद्धियोंकी खान ईश्वरकी प्राप्ति करता है तथा धकारका उच्चारण उसे सार्ष्टि, सारूप्य, भगवान्के स्वरूपका तत्त्वज्ञान और समानकाल—उनके साथ रहनेकी स्थिति प्रदान करता है। आकार उच्चारित होनेपर शिवके समान औढर-दानीपन, तेजोराशि, योगशक्ति, योगमें मति और सर्वकालमें श्रीहरिकी स्मृति प्राप्त होती है। इस प्रकार ‘राधा’ नामके श्रवण, उच्चारण, स्मरण और संयोगसे मोह-जाल तथा पापराशिका नाश हो जाता है और रोग-शोक-मृत्यु तथा यमराज उसके भयसे काँपने लगते हैं।
‘रा’ शब्दोच्चारणादेव स्फीतो भवति माधव:।
‘धा’ शब्दोच्चारणात् पश्चाद्धावत्येव ससम्भ्रम:॥
‘रा’ शब्दका उच्चारण करनेपर उसे सुनते ही माधव हर्षसे फूल जाते हैं और ‘धा’ शब्दका उच्चारण करनेपर बड़े सत्कारके साथ उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगते हैं।
‘रा’ शब्दोच्चारणाद्भक्तो राति मुक्तिं सुदुर्लभाम्।
‘धा’ शब्दोच्चारणाद्दुर्गे धावत्येव हरे: पदम्॥
‘रा’ इत्यादानवचनो ‘धा’ च निर्वाणवाचक:।
यतोऽवाप्नोति मुक्तिं च सा च राधा प्रकीर्तिता॥
‘रा’ शब्दके उच्चारणसे भक्त परम दुर्लभ मुक्ति-पदको प्राप्त करता है और ‘धा’ शब्दके उच्चारणसे निश्चय ही वह दौड़कर श्रीहरिके धाममें पहुँच जाता है।
‘रा’ का अर्थ है ‘पाना’ और ‘धा’ का अर्थ है निर्वाण—मोक्ष, भक्तजन उनसे निर्वाण—मुक्ति प्राप्त करते हैं, इसलिये उन्हें ‘राधा’ कहा गया है।