विविध कार्योंके लिये विभिन्नभगवन्नामोंका जप-स्मरण
कामना-सिद्धिके लिये—
काम: कामप्रद: कान्त: कामपालस्तथा हरि:।
आनन्दो माधवश्चैव कामसंसिद्धये जपेत्॥
‘अभीष्ट कामनाकी सिद्धिके लिये ‘काम’, ‘कामप्रद’, ‘कान्त’, ‘कामपाल’, ‘हरि’, ‘आनन्द और ‘माधव’—इन नामोंका जप करे।’
शत्रु-विजयके लिये—
राम: परशुरामश्च नृसिंहो विष्णुरेव च।
विक्रमश्चैवमादीनि जप्यान्यरिजिगीषुभि:॥
‘शत्रुओंपर विजय पानेकी इच्छावाले लोगोंको ‘राम’, ‘परशुराम’, ‘नृसिंह’, ‘विष्णु’ तथा ‘विक्रम’ इत्यादि भगवन्नामोंका जप करना चाहिये।’
विद्या-प्राप्तिके लिये—
विद्याभ्यस्यता नित्यं जप्तव्य: पुरुषोत्तम:।
‘विद्याभ्यास करनेवाले छात्रको प्रतिदिन ‘पुरुषोत्तम’ नामका जप करना चाहिये।’
बन्धन-मुक्तिके लिये—
दामोदरं बन्धगतो नित्यमेव जपेन्नर:।
‘बन्धनमें पड़ा हुआ मनुष्य नित्य ही ‘दामोदर’ नामका जप करे।’
नेत्र-बाधा-नाशके लिये—
केशवं पुण्डरीकाक्षमनिशं हि तथा जपेत्।
नेत्रबाधासु सर्वासु...................॥
‘सम्पूर्ण नेत्र-बाधाओंमें नित्य-निरन्तर ‘केशव’ एवं ‘पुण्डरीकाक्ष’ नामोंका जप करे।’
भयनाशके लिये—
हृषीकेशं भयेषु च।
‘भयके अवसरोंपर उसके निवारणके लिये ‘हृषीकेश’ का स्मरण करे।’
औषध-सेवनके लिये—
अच्युतं चामृतं चैव जपेदौषधकर्मणि।
‘औषध-सेवनके कार्योंमें ‘अच्युत’ और ‘अमृत’ नामोंका जप करे।’
युद्धस्थलमें जाते समय—
संग्रामाभिमुखे गच्छन् संस्मरेदपराजितम्।
‘युद्धकी ओर जाते समय ‘अपराजित’ का स्मरण करे।’
पूर्व आदि दिशाओंमें जाते समय—
चक्रिणं गदिनं चैव शार्ङ्गिणं खड्गिनं तथा।
क्षेमार्थी प्रवसने नित्यं दिक्षु प्राच्यादिषु स्मरेत्॥
‘पूर्व आदि दिशाओंमें प्रवास करते (परदेश जाते या रहते) समय कल्याण चाहनेवाला पुरुष प्रतिदिन ‘चक्री’ (चक्रपाणि), ‘गदी’ (गदाधर), ‘शार्ङ्गी’ (शार्ङ्गधर) तथा ‘खड्गी’ (खड्गधर)—इन नामोंका स्मरण करे।’
सारे व्यवहारोंमें—
अजितं वाधिपं चैव सर्वं सर्वेश्वरं तथा।
संस्मरेत् पुरुषो भक्त्या व्यवहारेषु सर्वदा॥
‘समस्त व्यवहारोंमें सदा मनुष्य भक्ति-भावसे ‘अजित’, ‘अधिप’, ‘सर्व’ तथा ‘सर्वेश्वर’—इन नामोंका स्मरण करे।’
क्षुत-प्रस्खलनादि, ग्रहपीडादि और दैवी विपत्ति-निवारणके लिये—
नारायणं सर्वकालं क्षुतप्रस्खलनादिषु।
ग्रहनक्षत्रपीडासु देवबाधासु सर्वत:॥
‘छींक लेने, प्रस्खलन (लड़खड़ाने) आदिके समय, ग्रह-पीड़ा, नक्षत्र-पीड़ा तथा दैवी-बाधाओंमें सर्वतोभावसे हर समय ‘नारायण’ का स्मरण करे।’
डाकू तथा शत्रुओंकी पीड़ाके समय—
अन्धकारे समस्तीव्रे नरसिंहमनुस्मरेत्॥
‘अत्यन्त घोर अन्धकारमें डाकू तथा शत्रुओंकी ओरसे बाधाकी सम्भावना होनेपर मनुष्य बारम्बार ‘नरसिंह’ नामका स्मरण करे।’
अग्निदाहके समय—
अग्निदाहे समुत्पन्ने संस्मरेज्जलशायिनम्।
‘घर या गाँवमें आग लग जानेपर ‘जलशायी’ का स्मरण करे।’
सर्प-विषसे रक्षाके लिये—
गरुडध्वजानुस्मरणाद् विषवीर्यं व्यपोहति।
‘‘गरुडध्वज’ नामके बारम्बार स्मरणसे मनुष्य सर्प-विषके प्रभावको दूर कर देता है।’
स्नान, देवार्चन, हवन, प्रणाम तथा प्रदक्षिणा करते समय—
कीर्तयेद् भगवन्नाम वासुदेवेति तत्पर:॥
‘स्नान, देव-पूजा, होम, प्रणाम तथा प्रदक्षिणा करते समय मनुष्य भगवत्परायण हो ‘वासुदेव’—इस भगवन्नामका कीर्तन करे।’
वित्त-धान्यादिके स्थापनके समय—
कुर्वीत तन्मनो भूत्वा अनन्ताच्युतकीर्तनम्।
‘धन-धान्यादिकी स्थापनाके समय मनुष्य भगवान्में मन लगाकर ‘अनन्त’ और ‘अच्युत’—इन नामोंका कीर्तन करे।’
संतानके लिये—
जगत्पतिमपत्यार्थे स्तुवन् भक्त्या न सीदति।
‘संतानकी प्राप्तिके लिये भक्तिपूर्वक ‘जगत्पति’ (जगदीश या जगन्नाथ)-की स्तुति करनेवाला पुरुष कभी दु:खी नहीं होता।’
सर्व प्रकारके अभ्युदयके लिये—
श्रीशं सर्वाभ्युदयिके कर्मण्याशु प्रकीर्तयेत्॥
‘सम्पूर्ण अभ्युदय-सम्बन्धी कर्मोंमें शीघ्रतापूर्वक ‘श्रीशं’ (श्रीपति)-का उच्च स्वरसे कीर्तन करे।’
अरिष्ट-निवारणके लिये—
अरिष्टेषु ह्यशेषेषु विशोकं च सदा जपेत्।
‘सम्पूर्ण अरिष्टोंके निवारणके लिये सदा ‘विशोक’ नामका जप करे।’
निर्जन स्थानमें तथा आँधी-तूफान आदि उपद्रवोंमें मृत्युके समय—
मरुत्प्रपाताग्निजलबन्धनादिषु मृत्युषु।
स्वतन्त्रपरतन्त्रेषु वासुदेवं जपेद् बुध:॥
‘स्वेच्छा या परेच्छावश अथवा स्वाधीन या पराधीन अवस्थामें किसी निर्जन स्थानमें पहुँचनेपर आँधी-तूफान (ओला-वर्षा), अग्नि (दावानल), जल (अगाध जलराशिमें निमज्जन) तथा बन्धन आदिके कारण मृत्यु या प्राणसंकटकी अवस्था प्राप्त हो तो बुद्धिमान् मनुष्य ‘वासुदेव’ नामका जप करे। ऐसा करनेसे बाधाएँ दूर हो जाती हैं।’
कलियुगके दोष-नाशके लिये—
तन्नास्ति कर्मजं लोके वाग्जं मानसमेव वा।
यन्न क्षपयते पापं कलौ गोविन्दकीर्तनात्॥
‘कलियुगमें इस जगत्के भीतर ऐसा कोई कर्मज (शारीरिक), वाचिक और मानसिक पाप नहीं है, जिसे मनुष्य ‘गोविन्द’ नामका कीर्तन करके नष्ट न कर दे।’
शमायालं जलं वह्नेस्तमसो भास्करोदय:।
शान्त्यै कलेरघौघस्य नामसंकीर्तनं हरे:॥
‘जैसे आग बुझा देनेके लिये जल और अन्धकारको नष्ट कर देनेके लिये सूर्योदय समर्थ है, उसी प्रकार कलियुगकी पापराशिका शमन करनेके लिये ‘श्रीहरि’ का नाम-कीर्तन समर्थ है।’
पराकचान्द्रायणतप्तकृच्छ्रै-
र्न देहशुद्धिर्भवतीति तादृक्।
कलौ सकृन्माधवकीर्तनेन
गोविन्दनाम्ना भवतीह यादृक्॥
‘कलियुगमें एक बार ‘माधव’ या ‘गोविन्द’ नामके कीर्तनसे यहाँ जीवकी जैसी शुद्धि होती है, वैसी इस जगत्में पराक, चान्द्रायण तथा तप्तकृच्छ्र आदिसे प्रायश्चित्तोंद्वारा भी नहीं होती।’
सकृदुच्चारयन्त्येतद् दुर्लभं चाकृतात्मनाम्।
कलौ युगे हरेर्नाम ते कृतार्था न संशय:॥
‘जो कलियुगमें अपुण्यात्माओंके लिये दुर्लभ इस ‘हरि’ नामका एक बार उच्चारण कर लेते हैं, वे कृतार्थ हो गये हैं, इसमें संशय नहीं।’
विष्णुधर्मोत्तरमें मार्कण्डेय-वज्र-संवादमें कहा गया है—
जल-प्रतरणके समय—
कूर्मं वराहं मत्स्यं वा जलप्रतरणे स्मरेत्।
‘जलसे पार होते समय भगवान् ‘कूर्म’ (कच्छप), ‘वराह’ अथवा ‘मत्स्य’ का स्मरण करे।’
अग्निदाहके समय—
भ्राजिष्णुमग्निजनने जपेन्नाम त्वखण्डितम्।
‘कहीं आग लग गयी हो उसकी शान्तिके लिये ‘भ्राजिष्णु’ इस नामका अखण्ड जप आरम्भ कर दे।’
आपत्ति-विपत्ति, ज्वर, शिरोरोग तथा विषवीर्यमें—
गरुडध्वजानुस्मरणादापदो मुच्यते नर:।
ज्वरजुष्टशिरोरोगविषवीर्यं च शाम्यति॥
‘‘गरुडध्वज’ का नाम बारम्बार स्मरण करके मनुष्य आपत्तिसे छूट जाता है, साथ ही वह ज्वररोग, सिरदर्द तथा विषके प्रभावको भी शान्त कर देता है।’
युद्धके समय—
बलभद्रं तु युद्धार्थी।
‘युद्धार्थी मनुष्य ‘बलभद्र’ का स्मरण करे।’
कृषि, व्यापार और अभ्युदयके लिये—
कृष्यारम्भे हलायुधम्।
उत्तारणं वणिज्यार्थी राममभ्युदये नृप॥
‘नरेश्वर! खेतीके आरम्भमें किसान ‘हलायुध’ का स्मरण करे। व्यापारकी इच्छावाला ‘उत्तारण’ को याद करे और अभ्युदयके लिये ‘राम’ का स्मरण करे।’
मंगलके लिये—
मंगल्यं मंगले विष्णुं मंगल्येषु च कीर्तयेत्।
‘मांगलिक कर्मोंमें मंगलकारी एवं मंगलमय ‘श्रीविष्णु’ का कीर्तन करे।’
सोकर उठते समय—
उत्तिष्ठन् कीर्तयेद् विष्णुम्।
‘सोकर उठते समय ‘विष्णु’ का कीर्तन करे।’
निद्राकालमें—
प्रस्वपन् माधवं नर:।
‘सोते समय मानव ‘माधव’ का स्मरण करे।’
भोजनके समय—
भोजने चैव गोविन्दं सर्वत्र मधुसूदनम्॥
‘भोजनकालमें ‘गोविन्द’ का और सर्वत्र सदा ‘मधुसूदन’ का चिन्तन करे।’
विविध सोलह कार्योंमें विविध सोलह नाम—
औषधे चिन्तयेद् विष्णुं भोजने च जनार्दनम्।
शयने पद्मनाभं च विवाहे च प्रजापतिम्॥
युद्धे चक्रधरं देवं प्रवासे च त्रिविक्रमम्।
नारायणं तनुत्यागे श्रीधरं प्रियसंगमे॥
दु:स्वप्ने स्मर गोविन्दं संकटे मधुसूदनम्।
कानने नारसिंहं च पावके जलशायिनम्॥
जलमध्ये वराहं च पर्वते रघुनन्दनम्।
गमने वामनं चैव सर्वकार्येषु माधवम्॥
षोडशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोके महीयते॥
‘औषध-सेवनके समय ‘विष्णु’ का, भोजनमें ‘जनार्दन’ का, शयनमें ‘पद्मनाभ’ का, विवाहमें ‘प्रजापति’ का, युद्धमें ‘चक्रधर’ का, प्रवासमें ‘त्रिविक्रम’ का, शरीरत्यागके समय ‘नारायण’ का, प्रिय-मिलनमें ‘श्रीधर’ का, दु:स्वप्न-दोषनाशके लिये ‘गोविन्द’ का, संकटमें ‘मधुसूदन’ का, जंगलमें ‘नृसिंह’ का, अग्नि लगनेपर ‘जलशायी’ भगवान् का, जलमें ‘वराह’ का, पर्वतपर ‘रघुनन्दन’ का, गमनमें ‘वामन’ का और सभी कार्योंमें ‘माधव’ का स्मरण करना चाहिये। जो प्रात:काल उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोक (वैकुण्ठ)-में पूजित होता है।’