भगवन्नामके मूल्यपर एक दृष्टान्त

एक श्रद्धालु भक्त प्रतिदिन गाँवके बाहर एक महात्माके पास जाया करता था। जब महात्माकी सेवा करते-करते उसे बहुत दिन बीत गये तब महात्माने उसे अधिकारी समझकर कहा कि ‘वत्स! तेरी मति भगवान‍्में है, तू श्रद्धालु है, गुरुसेवापरायण है, कुतार्किक नहीं है, साधनमें आलसी नहीं है, शास्त्रके वचनोंमें विश्वासी है, किसीका बुरा नहीं चाहता, किसीसे घृणा और द्वेष नहीं करता, सरलचित्त है काम, क्रोध, लोभसे डरता है, संतोंका उपासक है और जिज्ञासु है; इसलिये तुझे एक ऐसा गोपनीय मन्त्र देता हूँ जिसका पता बहुत ही थोड़े लोगोंको है। यह मन्त्र परम गुप्त और अमूल्य है, किसीसे कहना नहीं।’ यों कहकर महात्माने उसके कानमें धीरेसे कह दिया ‘राम’। श्रद्धालु भक्त मन्त्रराज ‘राम’ का जप करने लगा। वह एक दिन गंगा नहाकर लौट रहा था तो उसका ध्यान उन लोगोंकी तरफ गया जो हजारोंकी संख्यामें उसीकी तरह गंगा नहाकर जोर-जोरसे ‘राम-राम’ पुकारते चले आ रहे थे। सुनता तो रोज ही था। परन्तु कभी इस ओर उसका ध्यान नहीं गया था। आज ध्यान जाते ही उसके मनमें यह विचार आया कि महात्मा तो राममन्त्रको बड़ा गुप्त बतलाते थे, मुझसे कह भी दिया था कि किसीसे कहना नहीं; परन्तु इसको तो सभी जानते हैं, हजारों मनुष्य ‘राम-राम’ पुकारते हुए चलते हैं। उसके मनमें कुछ संशय उत्पन्न हो गया। वह अपने घर न जाकर सीधा गुरुके समीप गया। महात्माने कहा कि ‘वत्स! आज इस समय कैसे आया!’ उसने अपना संशय सुनाकर कहा कि ‘प्रभो! मेरे समझनेमें भ्रम हुआ है या इसका और कोई मतलब है। अपनी दिव्य वाणीसे मेरा संदेह दूर करनेकी कृपा कीजिये!’ महात्माने उसके मनकी बात जान ली और कहा कि ‘भाई! तेरे प्रश्नका उत्तर पीछे दिया जायगा। पहले तू मेरा एक काम कर!’ महात्माने झोलीमेंसे एक चमकती हुई काँचकी-सी गोली निकाली और उसे भक्तके हाथमें देकर कहा कि—‘बाजारमें जाकर इसकी कीमत करवाके लौट आ। बेचना नहीं है, सिर्फ कीमत जाननी है। सावधान! कीमत आँकानेमें कहीं भूल न हो जाय!’ भक्त श्रद्धालु था, आजकल-सा कोई होता तो पहले ही गुरु महाराजको आड़े हाथों लेता और कहता कि मैं तुम्हारे काँचके टुकड़ेकी कीमत जँचवाने नहीं आया हूँ, तुम्हारा कोई गुलाम नहीं हूँ। पहले मेरे प्रश्नका उत्तर दो, नहीं तो मेरे साथ छल करनेके अपराधमें तुमपर कोर्टमें नालिश की जायगी।’ वह समय दूसरा था। भक्त अपना प्रश्न वहीं छोड़कर गुरुका काम करनेके लिये बाजारमें गया। सबसे पहले एक शाक बेचनेवाली मिली। भक्तने गुरुकी चीज उसे दिखाकर कहा कि ‘इसकी क्या कीमत देगी?’ शाक बेचनेवालीने पत्थरकी चमक और सुन्दरता देखकर सोचा कि बच्चोंके खेलनेके लिये काँचकी बड़ी सुन्दर गोली है। बाजारमें कहीं ऐसी नहीं मिलती। उसने कहा—‘सेर-दो-सेर आलू और बैगन ले लो।’ वह आगे बढ़ा, एक सोनारकी दूकान थी, वहाँ ठहरा। सुनारको गोली दिखाकर पूछा—‘भाई! इसकी क्या कीमत दोगे?’ सुनारने हाथमें लेकर देखा और उसे अच्छा पुखराज (नकली हीरा)समझकर सौ रुपये देनेको कहा। भक्तकी भी दिलचस्पी बढ़ी, वह और आगे बढ़ा, एक महाजनके यहाँ गया। महाजनने गोली देखकर मनमें विचार किया कि इतना बड़ा और ऐसा अच्छा हीरा तो जगत‍्में कहाँसे होगा? है तो पुखराज ही, परन्तु हीरा-सा लगता है। बड़े घरमें नकली भी असली ही समझा जाता है, उसने हजार रुपयोंमें माँगा। भक्तने सोचा कि हो न हो, है तो कोई बड़ी मूल्यवान् वस्तु, वह और आगे बढ़ा और एक जौहरीकी दूकानपर गया। जौहरीने परीक्षा की तो उसे हीरा ही मालूम दिया, परंतु इतना बड़ा और ऐसा हीरा कभी उसने देखा ही न था; इसलिये उसे कुछ सन्देह रहा तथापि उसने एक लाख रुपयोंमें उसे माँगा। भक्त ‘बेचना नहीं है’ कहकर एक सबसे बड़े जौहरीकी दूकानपर गया। जब गुरुके पाससे आया था तब तो उसे जौहरियोंके पास जानेका साहस ही नहीं था। वह स्वयं उसे मामूली काँच समझता था, परन्तु ज्यों-ज्यों कीमत बढ़ती गयी त्यों-त्यों उसका भी साहस बढ़ता गया। बड़े जौहरीने हीरा देखकर कहा कि ‘भाई! यह तो अमूल्य है। इस देशकी सारी जवाहरात इसके मूल्यमें दे दी जाय तब भी इसका मूल्य पूरा नहीं होता। इसे बेचना नहीं।’ यह सुनकर भक्तने विचार किया कि अब तो सीमा हो चुकी।

वह लौटकर महात्माके पास गया और बोला कि ‘महाराज! इसकी कीमत कोई कर ही नहीं सकता, यह तो अमूल्य वस्तु है, गुरुने पूछा कि ‘तुमको यह किसने बताया?’ भक्तने कहा कि ‘प्रभो! मैंने यहाँसे बाजारमें जाकर पहले शाकवालीसे पूछा तो सेर-दो-सेर शाक देना स्वीकार किया, सुनारने सौ रुपये कहे, महाजनने हजार, जौहरीने लाख और अन्तमें सबसे बड़े जौहरीने इसे अमूल्य बतलाते हुए यह कहा कि ‘यदि देशकी सारी जवाहरात इसके बदलेमें दे दी जाय तब भी इसका मूल्य पूरा नहीं होता।’ महात्माने उससे रत्न लेकर अपनी झोलीमें रख लिया। भक्तने कहा कि ‘महाराज! अब मेरी शंका-निवारण कीजिये।’ महात्माने कहा—‘भाई! मैं तो तुझे शंका-निवारणके लिये दृष्टान्तसहित उपदेश दे चुका। तूने अभी नहीं समझा, इसलिये फिर समझाता हूँ। इस रत्नकी कीमत करानेमें ही तेरी शंका दूर होनी चाहिये थी। रत्न अमूल्य था; परंतु उसकी असली पहचान केवल सबसे बड़े जौहरीको ही हुई, दूसरे नहीं पहचान सके। यदि मैंने तुझे बेचनेके लिये आज्ञा दे दी होती तो तू दो सेरके बदले पाँच-सात सेर शाकके मूल्यपर इसे बेच ही देता, आगे बढ़ता ही नहीं। अमूल्य वस्तु कौड़ीके मूल्य चली जाती। कितना बड़ा नुकसान होता? इसी प्रकार श्रीराम-नाम भी गुप्त और अमूल्य पदार्थ है, इसकी पहचान सबको नहीं है और न इसका मूल्य ही सब कोई जानते हैं। चीज हाथमें होनेपर भी जबतक उसकी पहचान नहीं होती, तबतक उसका असलीपन गुप्त ही रहता है। इसी तरह राम-नामके असली महत्त्वको भी बहुत कम लोग जानते हैं। जो राम-नामका व्यवसाय करते हैं वे बेचारे बड़े दयाके पात्र हैं; क्योंकि वे इस अमूल्य धन राम-नामको कौड़ीके मूल्यपर बेच देते हैं। इसीसे परम मूल्यवान् रत्नको दो सेर शाकके बदलेमें बेच देनेवाले मूर्खके समान वे सदा ही भक्ति और प्रेममें दरिद्री ही रहते हैं। भक्ति और प्रेमके हुए बिना परमात्मा नहीं मिलते और परमात्माको प्राप्त किये बिना दु:खोंसे कभी छुटकारा नहीं हो सकता। दु:खोंकी आयन्तिक निवृत्ति परमात्माको प्राप्त करनेमें ही है और उस—

—परमात्माकी प्राप्तिका परम साधन श्रीभगवन्नाम है—

इसलिये भगवन्नामका किसी भी दूसरे काममें प्रयोग नहीं करना चाहिये। भगवन्नाम लेना चाहिये केवल भगवन्नामके लिये। भगवन्नामके लिये भी नहीं, उसके प्रेमके लिये—प्रेमके लिये भी नहीं परंतु इसलिये कि लिये बिना रहा नहीं जाता। मनकी वृत्तियाँ ऐसी बन जानी चाहिये कि जिससे भजन हुए बिना एक क्षण भी चैन नहीं पड़े। जैसे श्वास रुकते ही गला घुट जाता है—प्राण अत्यन्त व्याकुल होकर छटपटाने लगते हैं, इसी प्रकार भजनमें जरा-सी भूल होनेसे, क्षणभरके लिये भी भजन छूटनेमें प्राण छटपटाने लगें। इसीलिये भगवान् नारद कहते हैं—

अव्यावृतभजनात्।

(भक्तिसूत्र ३६)

—तैलधारावत् निरन्तर भजन करनेसे ही प्रेमकी प्राप्ति होती है। भजनमें सबसे पहले नामकी आवश्यकता है। जिसका भजन करना होता है, सर्वप्रथम उसका नाम जानना पड़ता है इसलिये नाम ही भजनका मूल है। इस—

—नाम-भजनके कई प्रकार—

—हैं—जप, स्मरण और कीर्तन! इनमें सबसे पहले जपकी बात कही जाती है। परमात्माके जिस नाममें रुचि हो, जो अपने मनको रुचिकर हो, उसी नामकी परमात्माकी भावनासे बारंबार आवृत्ति करनेका नाम जप है। जपकी शास्त्रोंमें बड़ी महिमा है। जपको यज्ञ माना है और श्रीगीताजीमें भगवान‍्के इस कथनसे कि ‘यज्ञानां जपज्ञोऽस्मि’ (यज्ञोंमें जपयज्ञ मैं हूँ) जपका महत्त्व बहुत ही बढ़ गया है। जपके तीन प्रकार हैं साधारण, उपांशु और मानस। इनमें पूर्व-पूर्वसे उत्तर-उत्तर दस गुण अधिक फलदायक है। भगवान् मनु कहते हैं—

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणै:।

उपांशु: स्याच्छतगुण: साहस्रो मानस: स्मृत:॥

‘दर्श-पौर्णमासादि विधियज्ञोंसे (यहाँ मनु महाराजने भी विधियज्ञोंसे जपयज्ञको ऊँचा मान लिया है) साधारण जप दस गुण श्रेष्ठ है, उपांशु जप सौ गुण श्रेष्ठ है और मानस जप हजार गुण श्रेष्ठ है।’

जो फल साधारण जपके हजार मन्त्रोंसे होता है वही फल उपांशु जपके सौ मन्त्रोंसे और मानस जपके एक मन्त्रसे हो जाता है। उच्च-स्वरसे होनेवाले जपको साधारण जप कहते हैं (परंतु यह कीर्तन नहीं है), जिसमें जीभ और होंठ तो हिलते हैं; परंतु शब्द अंदर ही रहता है, वह उपांशु जप है और जिसमें न जीभके हिलानेकी आवश्यकता होती है और न होंठके, वह मानस जप कहलाता है। उच्चस्वरसे उपांशु उत्तम और उपांशुसे मानसिक उत्तम है। यह मन्त्रजपकी विधि है, किसी भी देवताका कैसा ही मन्त्र क्यों न हो, यह विधि सबके लिये एक-सी है। यह विधि असलमें मन्त्रकी दृष्टिसे है। भगवन्नाम मन्त्र भी है। अतएव जहाँ मन्त्रकी भावना है, वहाँ इस विधिकी आवश्यकता है। नामकी दृष्टिमें यह बात नहीं है, वहाँ तो चाहे जैसे भी जपे—सभी प्रकार मंगलमय है, कोई विधि-निषेध है ही नहीं। यह नामकी अलौकिक महिमा है। भगवन्नाममें शुद्धि-अशुद्धिकी भी कोई बात नहीं है।

अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।

य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तर: शुचि:॥

अपवित्र हो, पवित्र हो, किसी भी अवस्थामें क्यों न हो, भगवान् पुण्डरीकाक्षका स्मरण करते ही बाहर और भीतरकी शुद्धि हो जाती है। जल-मृत्तिकासे केवल बाहरकी ही शुद्धि होती है; परंतु भगवन्नाम अन्तरके मलोंको भी अशेषरूपसे धो डालता है, इसका किसीके लिये किसी अवस्थामें भी कोई निषेध नहीं है।

पुरुष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ॥

कलिसन्तरणोपनिषद्—

—में नाम-जपकी विधि और उसके फलका बड़ा सुन्दर वर्णन है, पाठकोंके लाभार्थ उसे यहाँ उद्‍धृत किया जाता है।

हरि: ॐ। द्वापरान्ते नारदो ब्रह्माणं जगाम कथं भगवन् गां पर्यटन् कलिं सन्तरेयमिति॥१॥

द्वापरके समाप्त होनेके समय श्रीनारदजीने ब्रह्माजीके पास जाकर पूछा कि ‘हे भगवन्! मैं पृथ्वीकी यात्रा करनेवाला कलियुगको कैसे पार करूँ?’

स होवाच ब्रह्मा साधु पृष्टोऽसि सर्वश्रुतिरहस्यं गोप्यं तच्छृणु येन कलिसंसारं तरिष्यसि। भगवत आदिपुरुषस्य नारायणस्य नामोच्चारणमात्रेण निर्धूतकलिर्भवति॥२॥

‘ब्रह्माजी बोले कि तुमने बड़ा उत्तम प्रश्न किया है। सम्पूर्ण श्रुतियोंका जो गूढ़ रहस्य है, जिससे कलि-संसारसे तर जाओगे, उसे सुनो। उस आदिपुरुष भगवान् नारायणके नामोच्चारणमात्रसे ही कलिके पातकोंसे मनुष्य मुक्त हो सकता है।’

नारद: पुन: पप्रच्छ। तन्नाम किमिति। स होवाच हिरण्यगर्भ:।

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नात: परतरोपाय: सर्ववेदेषु दृश्यते॥ इति षोडशकलावृतस्य पुरुषस्य आवरणविनाशनम्॥ तत: प्रकाशते परं ब्रह्म मेघापाये रविरश्मिमण्डलीवेति॥३॥

‘श्रीनारदजीने फिर पूछा कि वह भगवान् का नाम कौन-सा है?’ ब्रह्माजीने कहा वह नाम है—

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥*

इन सोलह नामोंके उच्चारण करनेसे कलिके सम्पूर्ण पातक नष्ट हो जाते हैं। सम्पूर्ण वेदोंमें इससे श्रेष्ठ और कोई उपाय नहीं देखनेमें आता। इन सोलह कलाओंसे मुक्त पुरुषका आवरण (अज्ञानका परदा) नष्ट हो जाता है और मेघोंके नाश होनेसे जैसे सूर्यकिरणसमूह प्रकाशित होता है वैसे ही आवरणके नाशसे ब्रह्मका प्रकाश हो जाता है।

पुनर्नारद: पप्रच्छ भगवन् कोऽस्य विधिरिति। तं होवाच नास्य विधिरिति। सर्वदा शुचिरशुचिर्वा पठन् ब्राह्मण: सलोकतां समीपतां सरूपतां सायुज्यतामेति॥४॥

‘नारदजीने फिर पूछा कि हे भगवन्! इसकी क्या विधि है?’ ब्रह्माजीने कहा कि (कोई विधि नहीं है। सर्वदा शुद्ध हो या अशुद्ध, नामोच्चारणमात्रसे ही सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य-मुक्ति मिल जाती है।’

यदास्य षोडशकस्य सार्धत्रिकोटिर्जपति तदा ब्रह्महत्यां तरति। स्वर्णस्तेयात् पूतो भवति। वृषलीगमनात् पूतो भवति। सर्वधर्मपरित्यागपापात् सद्य: शुचितामाप्नुयात्। सद्यो मुच्यते सद्यो मुच्यते इत्युपनिषत्॥५॥

ब्रह्माजी फिर कहने लगे कि यदि कोई पुरुष इन सोलह नामोंके साढ़े तीन करोड़ जप कर ले तो वह ब्रह्महत्या, स्वर्णकी चोरी, शूद्र-स्त्री-गमन और सर्वधर्मत्यागरूपी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह तत्काल मुक्तिको प्राप्त होता है। तत्काल ही मुक्तिको प्राप्त होता है।’