जपकी विधि
इससे यह सिद्ध हो गया कि स्त्री-पुरुष, ब्राह्मण, अन्त्यज, गृही-वनवासी, शुद्ध-अशुद्ध, विद्वान्-मूर्ख कोई भी किसी भी प्रकारसे इस षोडश नामके साढ़े तीन करोड़ मन्त्रोंका जप कर लेता है वह समस्त महापातकों, उनके फलस्वरूप नरकों और स्वर्गादि मोक्षमार्गके प्रतिबन्धकोंसे छूटकर परमात्माके सच्चिदानन्दघनस्वरूपको अनायास ही प्राप्त हो जाता है। कितना सहज और सस्ता उपाय है? यदि मनुष्य प्रतिदिन लगभग ६,५०० मन्त्रोंका जप करे (जो सोलह नामके मन्त्रकी लगभग ६१ मालाओंमें हो जाता है) तो केवल १५ वर्षमें साढ़े तीन कोटि जप-संख्या पूरी हो जाती है। यह तो साधारण जप-विधिकी बात है। उपांशु या मनसे जप हो तो बहुत ही शीघ्र सफलता मिल सकती है।
जिस परमात्माको प्राप्त करनेके लिये लाखों-करोड़ों जन्मोंतक प्रतीक्षा करनी पड़ती है, जिस परमात्मसुखको पानेके लिये अनन्त जन्मोंकी साधनाकी आवश्यकता होती है, वही परमात्माकी प्राप्तिरूप सिद्धि यदि पंद्रह वर्षोंमें घरमें रहते हुए, संसारका काम करते हुए, शास्त्रसे अविरुद्ध भोगोंको भोगते हुए मिल जाय तो फिर और क्या चाहिये? इससे सस्ता सौदा और क्या हो सकता है? हम सारी उम्र बिता देते हैं थोड़े-से धन-संग्रह करनेके लोभमें! जिसका संग्रह होना-न-होना भी अनिश्चित रहता है! परन्तु समस्त धनोंका मूल, समग्र धनपतियोंका एकमात्र स्वामी, समस्त देव, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, पितृ, मनुष्य और राक्षस आदिके कुल धनकी जिस अतुल धन-राशिके एक अंशके कोट्यंशके साथ भी तुलना नहीं की जा सकती ऐसा वह परमधन स्वयं यदि पंद्रह वर्षकी श्रद्धायुक्त सहज साधनासे अपने अस्तित्वके साथ तुम्हारे अस्तित्वको मिला लेता है तो बताओ फिर तुम्हें और किस वस्तुकी आवश्यकता रह जाती है? जब स्वयं सम्राट्का ही पद मिल जाय, तब छोटे-छोटे खेत तो उसमें आप ही आ जाते हैं। तुम संसारका मामूली धन चाहते हो। वह सारे खजानेका स्वामित्व ही तुम्हें सौंप देता है। फिर मामूली धनकी प्राप्तिके लिये तो कोई गारंटी भी नहीं करता। सब समझदार लोग यों ही कहते हैं, भाई! उद्योग करो, तुम्हारे भाग्यमें होगा तो मिल जायगा, परन्तु इस परमधनकी प्राप्तिके लिये तो शास्त्र जिम्मा लेते हैं। ब्रह्मा स्वयं कहते हैं। इतिहास इस बातकी सत्यताका प्रमाण दे रहे हैं। भक्तोंकी गाथाएँ उच्चस्वरसे इस ध्रुव सत्यकी घोषणा कर रही हैं। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण भी मिल सकते हैं, ऐसी स्थितिमें अविश्वासकी तो कोई बात ही नहीं रह जाती।
लोग कह सकते हैं कि ‘हम घरका काम करते हुए प्रतिदिन इतने मन्त्रोंका जप कैसे करें? इतने जपमें कम-से-कम छ: घंटेका समय चाहिये।’ परन्तु उनका ऐसा कहना भूलसे होता है; यदि हमलोग समयका उपयोग सावधानीके साथ करें तो घर और आजीविकाके काममें किसी प्रकारकी बाधा नहीं पड़कर भी इतना जप प्रतिदिन हो सकता है। उस देवमन्त्रके जपमें बाधा आती है जो स्नानकर शुद्ध हो एक समय एक जगह बैठकर किया जाता है। वैसे जपमें लगातार इतना समय लगाना कठिन होता है, परन्तु इस नाम-मन्त्रके जपमें तो उस तरहकी कोई अड़चन नहीं है। चलते, फिरते, बैठते, उठते, सोते, आजीविकाका काम करते—सब समय सभी अवस्थामें यह जप हो सकता है। यदि हमलोग हिसाब लगाकर देखें तो दिन-रातके चौबीस घंटेके समयमेंसे छ: घंटे निद्राके बाद देकर बाकीके अठारह घंटे केवल शरीर और आजीविकाके कार्योंमें ही नहीं व्यतीत होते। हमारा बहुत-सा समय तो असावधानीसे व्यर्थकी बातोंमें जाता है, यदि हमलोग वाणीका संयम करना सीख जायँ, बिना मतलब—बिना कार्यके बोलना छोड़ दें तो मेरी समझसे राजासे लेकर मजदूरतक सबको इतना नाम-जप प्रतिदिन करनेके लिये पूरा समय अनायास ही मिल सकता है। हम चेष्टा नहीं करते, केवल बहाना कर देते हैं। यदि चेष्टा करें, समयका मूल्य समझें तो एक क्षणको भी हरिके नाम बिना व्यर्थ नहीं जाने दें। कामके लिये जितने बोलनेकी आवश्यकता हुई, उतने शब्द बोल दिये फिर वाणीको उसी नाम-जपमें लगा दिया। इस प्रकार अभ्यास करते रहनेपर तो ऐसी आदत पड़ जाती है कि फिर नाम-जप छूटना कठिन हो जाता है, फिर तो साधककी ऐसी प्रबल इच्छा होने लगती है कि चौबीसों घंटे नाम-जप ही किया करूँ। उसे थोड़े जपमें संतोष नहीं होता। जैसे बड़े जोरकी भूख या प्यास लगनेपर मनुष्यका एक-एक क्षण कष्टसे बीतता है, इसी प्रकार नाम-प्रेमीका भी जो क्षण नामके बिना जाता है वह बड़े कष्टसे बीतता है।
जप उसीका नाम है जो संख्यासे किया जाता है। जपके तीन प्रकार पहले बतलाये जा चुके हैं। उनके सिवा साधकोंके सुभीतेके लिये और भी कई प्रकार बतलाये जाते हैं। जैसे—
(१)श्वासके द्वारा जप करना।
(२)नाड़ीसे जप करना।
(३)मानस-मूर्ति-पूजाकी भाँति नामाक्षरोंकी मनमें कल्पनाकर उनको बारंबार पढ़ना।
(४)भगवान् की मूर्तिकी कल्पना कर उसपर नामाक्षरोंकी गहनोंकी तरह कल्पना कर उनकी आवृत्ति करना।
अन्य भी कई प्रकार तथा भेद हैं, विस्तारभयसे यहाँ नहीं लिखे जाते, उपर्युक्त चारों प्रकारके जपका कुछ खुलासा कर देना आवश्यक है।
(१)प्रत्येक श्वासकी गतिकी ओर लक्ष्य रखना और श्वासके आने तथा जानेमें श्वासके शब्दके साथ ही मन्त्रकी कल्पना करना, साथ ही जिह्वासे भी उपांशुरूपसे उच्चारण करते रहना, आरम्भमें माला रखना और श्वासके साथ होनेवाले प्रत्येक जपकी गिनती रखना। यदि इस प्रकार दो-चार मालाएँ भी प्रतिदिन जपनेका अभ्यास किया जाय तो मन बहुत शीघ्र स्थिर होकर नाममें लग सकता है। श्वासका जप बिना मनके नहीं होता। साधारण और उपांशुजप तो अभ्यास होनेपर मनके अन्यत्र रहनेपर भी हो सकते हैं, परन्तु श्वासका जप मन बिना नहीं होता, मन नहीं रहता है तो श्वासकी गतिका ध्यान छूट जाता है, केवल जीभसे जप होता रहता है। इसलिये श्वाससे जप करनेवालेको श्वासकी गतिकी ओर ध्यान रखना ही पड़ता है। जहाँ मन अन्यत्र गया कि जप छूटा। कबीरने कहा है—
साँसौ साँसा नाम जप।
अरु उपाय कछु नाहिं।
(२)इसी प्रकार नाड़ीका जप है। नाड़ीकी गति श्वाससे भी सूक्ष्म है। हाथ, गले, मस्तक आदिकी नाड़ियाँ अँगुली लगानेपर चलती हुई मालूूम होती हैं, अतएव पहले-पहल नाड़ीद्वारा जप करनेवालेको अँगुलियोंसे नाड़ीकी गतिका निरीक्षण करते हुए मनको उस गतिकी ओर लगाकर नाड़ीकी गतिके साथ ही उसके प्रत्येक ठपकेपर मन्त्रकी कल्पना करनी चाहिये। जीभ और मालाका प्रयोग श्वाससे जपके समान ही करना चाहिये।
(३)आँखें मूँदकर मन्त्रके पूरे अक्षरोंकी अपने सामने आकाशमें या हृदयमें कल्पना कर उन्हें बारंबार मनसे पढ़ता रहे, साथ ही जीभका प्रयोग भी करता रहे। गिनतीके लिये हाथमें माला रखे। मन्त्रके अक्षर, हो सके तो बराबर मनमें बनाये रखे या प्रत्येक मन्त्रके जपका आरम्भ करनेके समय कल्पना कर ले और मन्त्र पूरा होते ही मिटा दे। जिस तरीकेमें सुभीता मालूम हो वही करे।
(४)मनकी रुचिके अनुसार भगवान् की किसी मूर्तिकी मनमें कल्पना कर मूर्तिके चरणोंमें या गलेकी मालामें या मस्तकमें, मुकुटमें या हस्त-पदादि अंगोंपर जड़े हुए नगीनोंके गहनोंके रूपमें मन्त्रके चमकते हुए सुन्दर अक्षरोंकी कल्पना कर आँखें मूँदे हुए उनका बारंबार मनसे जप करता रहे और सब बातें तीसरेके समान ही करे।
योगदर्शनकार कहते हैं—‘तज्जपस्तदर्थभावनम्’ उसके वाचक प्रणवका जप करता हुआ उसके वाच्य नामीकी ईश्वरकी भावना करे। वाणीसे जप और मनमें ध्यान दोनोंका एक साथ होना बहुत ही उत्तम साधन है। भगवान्ने भी यही कहा है—
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।
य: प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥
(गीता ८।१३)
‘जो इस ॐरूप एकाक्षर नाम-ब्रह्मका उच्चारण करता हुआ और नामी मुझ परमात्माको स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है, वह पुरुष परमगतिको प्राप्त होता है।’
मनमें भगवान् की मूर्तिका, भगवद्भावका या भगवन्नामका ध्यान-स्मरण करते हुए जीभसे जप करना सर्वोत्तम जप है, इसीके अन्तर्गत उपर्युक्त चारों प्रकार भी हैं। इससे उतरकर उपांशु और उससे उतरकर साधारण (जोर-जोरसे उच्चारण करते हुए जप करना) है, जिसको जो सुलभ, सुविधाजनक और रुचिकर प्रतीत हो, वह अभ्यास उसीका करे। भगवन्नाम ऐसी वस्तु है जो किसी भी प्रकारसे ग्रहण करनेपर भी मंगलप्रद ही है। भगवन्नाम-जपमें रुचि और विश्वास होना चाहिये, फिर बेड़ा पार है। इतना स्मरण रखना चाहिये कि जो जप निष्कामभावसे नामीके ध्यानसे युक्त, प्रेमसहित, निरन्तर और गुप्त होता है, वही उत्तम-से-उत्तम समझा जाता है, अतएव यथासाध्य कुछ मालाएँ (कम-से-कम १४ मालाएँ) प्रतिदिन जपनी चाहिये। नियमसे जो काम होता है वह अनियमसे नहीं होता।
यदि निष्काम न आ सके तो विश्वास रखकर सकामभावसे ही जप करना चाहिये। भगवन्नाम-जपकी महिमासे आगे चलकर सकाम भी निष्काम हो सकता है। प्रात:स्मरणीय भक्तराज ध्रुवजीने राज्यकी इच्छासे वनमें जाकर ध्यानसहित मन्त्र-जप किया। उन्हें राज्य भी मिला और भगवान् का परमधाम भी। उन्हें सिद्धि भी बहुत शीघ्र मिली। थोड़े-से ही समयमें काम बन गया, इतना सब क्यों हो गया? इसीलिये कि ध्रुव दृढ़विश्वासी था। जिस समय मातासे उसे उपदेश मिला उसी समय बालक ध्रुव घरसे निकल पड़ा। रास्तेमें भगवान् नारद मिले। उन्होंने सहजमें राज्य दिलवानेका लोभ और वनके भीषण कष्टोंका भय दिखलाकर ध्रुवकी परीक्षा की, जब उसे पक्का पाया तो नारदजीने दया कर उसे भगवन्नामका मन्त्र दे दिया। ध्रुव दृढ़ निश्चयके साथ तन-मनकी सारी सुधि भुलाकर मन्त्रका जप करने लगा। भगवद्भावसे उसके हृदयमें आनन्दका समुद्र उमड़ा। साक्षात् नारायणको उसके सामने मूर्तिमान् होकर प्रत्यक्ष दर्शन देना पड़ा। आज हमलोगोंको भगवद्दर्शनमें जो देरी हो रही है इसका कारण यही है कि हमें नामपर पूरा विश्वास नहीं है। जितने अंशमें विश्वास है उतने अंशमें सिद्धि भी होती है।
भक्तराज श्रीहरिदासजी बड़े जोर-जोरसे उच्चारण करके नाम-जप किया करते थे। तीन लाख नाम-जपका उनका नियम था। रामचन्द्र खाँकी भेजी हुई वेश्या उन्हें डिगाने आयी; परन्तु तीन रात्रितक हरिदासजीके पवित्र मुखारविन्दसे निकली हुई परम पुनीत हरिध्वनिको सुनकर स्वयं पापपथसे डिग गयी और उसी क्षण दुराचार छोड़कर परम वैष्णवी बन गयी। तात्पर्य यह कि विश्वास और प्रेमके साथ नाम-जप होना चाहिये। किसी भी प्रकार हो नामका फल अमोघ है।