कीर्तन

कीर्तन जोर-जोरसे होता है और इसमें संख्याका कोई हिसाब नहीं रखा जाता। यही जप और कीर्तनमें भेद है, जप जितना गुप्त होता है उतना ही उसका अधिक महत्त्व है; परन्तु कीर्तन जितना ही गगनभेदी स्वरमें होता है उतना ही उसका महत्त्व बढ़ता है। कीर्तनके साथ संगीतका सम्बन्ध है। कीर्तनमें पहले-पहल स्वरोंकी एकतानता करनी पड़ती है। कीर्तनके कई प्रकार हैं।

(१) अकेले ही भगवान‍्के किसी नामको आर्तभावसे पुकार उठना। जैसे द्रौपदी और गजराज आदिने पुकारा था।

(२) अकेले ही भगवान‍्के गुणनाम, कर्मनाम, जन्मनाम और सम्बन्धनामोंका विस्तारपूर्वक या संक्षेपमें जोर-जोरसे उच्चारण करना।

(३)भगवान‍्के किसी चरित्र या भक्तचरित्रके किसी कथा-भागका गान करना और बीच-बीचमें नाम-कीर्तन करना।

(४) कुछ लोगोंका एक साथ मिलकर प्रेमसे भगवन्नाम गान करना।

(५) अधिक लोगोंका एक साथ मिलकर एक स्वरसे नाम-कीर्तन करना।

इसके सिवा और भी अनेक भेद हैं। जब मनुष्य किसी दु:खसे घबराकर जगत‍्के सहायकोंसे निराश होकर भगवान‍्से आश्रय-याचना करता हुआ जोरसे उनका नाम लेकर पुकारता है तब भगवान् उसी समय भक्तकी इच्छाके अनुकूल स्वरूप धारण-कर उसे दर्शन देते और उसका दु:ख दूर करते हैं। श्रीभगवान‍्के रामावतार और कृष्णावतारमें असुरोंके द्वारा पीड़ित सुर-मुनियोंने मिलकर पहले आर्तस्वरसे कीर्तन ही किया था।

जिस समय एकवस्त्रा देवी द्रौपदी कौरवोंके दरबारमें केश पकड़कर लायी जाती है, दुर्योधन उसके वस्त्रहरणके लिये अमित बलशाली दु:शासनको आज्ञा देता है, उस समय द्रौपदीको यह कल्पना ही नहीं होती कि इस बड़े-बूढ़े, धर्मज्ञ, विद्वान् और वीरोंकी सभामें ऐसा अन्याय होगा; परन्तु जब दु:शासन सचमुच वस्त्र खींचने लगता है तब द्रौपदी घबराकर राजा धृतराष्ट्र, पितामह भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य आदि तथा अपने वीर पाँच पतियोंकी सहायता चाहती है; परन्तु भिन्न-भिन्न कारणोंसे जब कोई भी उस समय द्रौपदीको छुड़ानेके लिये तैयार नहीं होता तब वह सबसे निराश हो जाती है। सबसे निराश होनेके बाद ही भगवान् की अनन्य स्मृति हुआ करती है। दु:शासन बड़े जोरसे साड़ी खींचता है। एक झटका और लगते ही द्रौपदीकी लज्जा जा सकती है। द्रौपदीकी उस समयकी दीन अवस्था हमलोगोंकी कल्पनामें भी पूरी नहीं आ सकती। महलोंके अंदर रहनेवाली एक राजरानी, पृथ्वीके सबसे बड़े पाँच वीरोंद्वारा रक्षिताकुलरमणी रजस्वला-अवस्थामें बड़े-बूढ़े तथा वीर पतियोंके सामने नंगी की जाती हो, उस समय उसको कितनी मर्मवेदना होती है इस बातको वही जानती है। कवियोंकी कलम शायद कुछ कल्पना करे। खैर, द्रौपदीने निराश होकर भगवान् का स्मरण किया और वह व्याकुल होकर पुकार उठी—

गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय।

कौरवै: परिभूतां मां किं न जानासि केशव॥

हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन।

कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन॥

कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वभावन।

प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम्॥

‘हे द्वारकावासी गोविन्द! हे गोपीजनप्रिय कृष्ण! क्या मुझ कौरवोंसे घिरी हुईको तू नहीं जानता? हे नाथ, रमानाथ, व्रजनाथ, दु:खनाशक जनार्दन! मुझ कौरवरूपी समुद्रमें डूबी हुईका उद्धार कर! हे विश्वात्मा! विश्वभावन कृष्ण! हे महायोगी कृष्ण! कौरवोंके बीचमें हताश होकर तेरे शरण आनेवाली मुझको तू बचा!’

व्याकुलतापूर्ण नाम-कीर्तनका फल तत्काल होता है, जब सबकी आशा छोड़कर केवलमात्र परमात्मापर भरोसा कर उसे एक मनसे कोई पुकारता है तब वह करुणासिन्धु भगवान् एक क्षण भी निश्चिन्त और स्थिर नहीं रह सकता। उसे भक्तके कामके लिये दौड़ना ही पड़ता है। नामकी पुकार होते ही द्रौपदीके वस्त्रोंमें भगवान् आ घुसे, वस्त्रावतार हो गया! वस्त्रका ढेर लग गया। दस हजार हाथियोंका बल रखनेवाली वीर दु:शासनकी भुजाएँ फटने लगीं—‘दस हजार गज बल घटॺो, घटॺो न दस गज चीर!’

भक्त सूरदासजी कहते हैं—

दु:शासनकी भुजा थकित भइ

बसनरूप भए स्याम!

साड़ीका छोर न आया! एक कवि कहते हैं—

पाय अनुसासन दु:हसासन कै कोप धायो,

द्रुपदसुताको चीर गहे भीर भारी है।

भीषम, करन, द्रोन बैठे व्रतधारी तहाँ,

कामिनीकी ओर काहू नेक न निहारी है॥

सुनिकै पुकार धाये द्वारिकाते यदुराई,

बाढ़त दुकूल खैंचे भुजबल भारी है।

सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है,

कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है॥

दु:शासन थककर मुँह नीचा करके बैठ गया, द्रौपदीकी लाज और उसका मान रह गया। भगवन्नाम-कीर्तनका फल प्रत्यक्ष हो गया! जय भगवान‍्के पावन नामकी जय!

इसी प्रकार गजराजकी कथा प्रसिद्ध है। वहाँ भी इसी तरहकी व्याकुलतापूर्ण नामकी पुकार थी। यदि आज भी कोई यों ही सच्चे मनसे व्याकुल होकर पुकारे तो यह निश्चय है कि उसके लोक-परलोक दोनोंकी सिद्धि निश्चितरूपेण हो सकती है। इस बातका कई लोगोंको कई तरहका प्रत्यक्ष अनुभव है। अतएव प्रात:काल, सायंकाल, रातको सोते समय भगवन्नामका कीर्तन अवश्य करना चाहिये। जहाँतक हो सके कीर्तन निष्काम एवं केवल प्रेमभावसे ही करना उचित है।

यह तो व्यक्तिगत नाम-कीर्तनकी बात हुई। इसके बाद समुदायमें नाम-कीर्तनका तरीका बतलाया जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात प्रान्तमें कीर्तनकारोंके अलग समुदाय हैं, जो हरिदास कहलाते हैं। ये लोग समय-समयपर मन्दिरों, धर्मसभाओं और उत्सवोंके अवसरपर बुलाये जाते हैं, इनका कीर्तन बड़ा सुन्दर होता है। भगवान् की किसी लीला-कथाको या भक्तोंके किसी चरित्रको लेकर यह लोग कीर्तन करते हैं। आरम्भमें किसी भक्तका कोई एक श्लोक या पद गाते हैं और उसीपर उनका सारा कीर्तन चलता है, अन्तमें उसी श्लोक या पदके साथ कीर्तन समाप्त किया जाता है। आरम्भमें, अन्तमें और बीच-बीचमें हरि-नामकी धुन लगायी जाती है जिसमें श्रोतागण भी साथ देते हैं। ये लोग गाना-बजाना भी जानते हैं और कम-से-कम हारमोनियम तथा तबलोंके साथ इनका कीर्तन होता है। बीच-बीचमें सुन्दर पद भी गाते हैं। इसमें दोष यही है कि इस प्रकारके अधिकांश कीर्तनकारोंका ध्यान भगवन्नामकी अपेक्षा सुर-अलापकी तरफ अधिक रहता है। गुजरातमें विवाहके अवसरपर एक दिन हरिकीर्तन करानेकी प्रथा है जो बड़ी ही सुन्दर मालूम होती है। अन्य अनेक प्रमादोंमें धनका नाश किया जाता है, वहाँ यदि इस प्रथाका प्रचार किया जाय तो लोगोंके मनोरंजनके साथ-ही-साथ बड़ा पारमार्थिक लाभ भी हो सकता है। यह भी एक तरहका संघकीर्तन है।

इसके बाद वह कीर्तन आता है जो सर्वश्रेष्ठ है। जिसका इस युगमें विशेष प्रचार महाप्रभु श्रीश्रीगौरांगदेवजीकी कृपासे हुआ। इस कीर्तनका प्रकार यह है। बहुत-से लोग एक स्थानपर एकत्रित होते हैं। एक आदमी एक बार पहले बोलता है, उसके पीछे-पीछे और सब बोलते हैं, पर आगे चलकर सभी एक साथ बोलने लगते हैं। किसी एक नामकी धुनको सब एक स्वरसे बोलते हैं। ढोल, करताल, झाँझ और तालियाँ बजाते हुए गला खोलकर, लज्जा छोड़कर बोलते हैं। जब धुन जम जाती है तब स्वरका ध्यान आप ही छूट जाता है। कीर्तन करनेवाला दल धुनमें मस्त हो जाता है, फिर कीर्तनकी मस्तीमें नृत्य आरम्भ होता है। रग-रग नाचने लगती है, आँखोंसे अश्रुओंकी धारा बहने लगती है, शरीर-ज्ञान नष्ट हो जाता है। नवद्वीप, वृन्दावन, अयोध्या और पण्ढरपुरमें ऐसे कीर्तन बहुत हुआ करते हैं। यह कीर्तन किसी एक स्थानमें भी होता है और घूमते हुए भी होता है। लेखकका विश्वास है कि ऐसे प्रेमभरे कीर्तनमें कीर्तनके नायक भगवान् स्वयं उपस्थित रहते हैं। उनका यह प्रण है—

नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।

मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥

(आदिपु० १९।३५)

‘मैं वैकुण्ठमें या योगियोंके हृदयमें नहीं रहता। मेरे भक्त जहाँ मिलकर मेरा गान करते हैं मैं वहीं रहता हूँ।’

इस प्रकारके कीर्तनमें प्रेमका सागर उमड़ता है, जो जगत् भरको पावन कर देता है। इस कीर्तनमें ब्राह्मण-चाण्डाल सभी शामिल हो सकते हैं। जिसको प्रेम उपजा, वही सम्मिलित हो गया, कोई रुकावट नहीं। ‘जाति-पाँति पूछै नहिं कोई। हरिको भजै सो हरिका होई॥’ वही बड़ा है, वही श्रेष्ठ है जो प्रेमसे नाम-कीर्तनमें मतवाला होकर स्वयं पावन होता है और दूसरोंको पावन करता है। इस कीर्तनसे एक बड़ा लाभ और होता है। हरिनामकी तुमुल ध्वनि पापी, पतित, पशु, पक्षीतकके कानोंमें जाकर सबको पवित्र और पापमुक्त करती है। जिसके श्रवणरन्ध्रसे भगवन्नाम उसके हृदयके अंदर चला जाता है उसीके पाप-मलको वह धो डालता है।

वामनपुराणका वचन है—

नारायणो नाम नरो नराणां

प्रसिद्धचौर: कथित: पृथिव्याम्।

अनेकजन्मार्जितपापसंचयं

हरत्यशेषं श्रुतमात्र एव॥

‘पृथ्वीमें नारायण-नामरूपी नर प्रसिद्ध चोर कहा जाता है; क्योंकि वह कानोंमें प्रवेश करते ही मनुष्योंके अनेक जन्मार्जित पापोंके सारे संचयको एकदम चुरा लेता है।’

जिस हरि-नाम-कीर्तनका ऐसा प्रताप है, जो पुरुष जीभ पाकर भी उसका कीर्तन नहीं करते वे निश्चय ही मन्दभागी हैं—

जिह्वां लब्ध्वापि यो विष्णुं कीर्तनीयं न कीर्तयेत्।

लब्ध्वापि मोक्षनि:श्रेणी स नारोहति दुर्मति:॥

‘जो जिह्वाको पाकर भी कीर्तनीय भगवन्नामका कीर्तन नहीं करते, वे दुर्मति मोक्षकी सीढ़ियोंको पाकर भी उनपर चढ़नेसे वंचित रह जाते हैं।’

कुछ लोग कहा करते हैं कि हमें जोर-जोरसे भगवन्नाम लेनेमें संकोच होता है। मैंने ऐसे बहुत-से अच्छे-अच्छे लोगोंको देखा है कि जिन्हें पाँच आदमियोंके सामने या रास्तेमें हरिनामकी पुकार करनेमें लज्जा आती है। झूठ बोलनेमें, कठोर वाणीके प्रयोगमें, परनिन्दा-परचर्चामें, अनाचार-व्यभिचारकी बातें करनेमें लज्जा नहीं आती, परंतु भगवन्नाममें लज्जा आती है। यह बड़ा ही दुर्भाग्य है! यदि भगवन्नामसे सभ्यतामें बट्टा लगता हो तो ऐसी विषमयी शुष्क सभ्यताको दूरसे ही नमस्कार करना चाहिये। धन्य वही है जिसके भगवन्नामके कीर्तनमात्रसे, श्रवण और स्मरणमात्रसे रोमांच हो जाता है। नेत्रोंमें आँसू भर आते हैं, कण्ठ रुक जाता है। वास्तवमें वही पुरुष मनुष्य नामके योग्य है। ऐसे पुरुष ही जगत‍्को पावन करते हैं। भगवान् कहते हैं—

वाग् गद‍्गदा द्रवते यस्य चित्तं

रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचिच्च।

विलज्ज उद‍्गायति नृत्यते च

मद्भक्तियुक्तो भुवनं पुनाति॥

(श्रीमद्भा० ११। १४। २४)

‘जिसकी वाणी गद‍्गद हो जाती है, हृदय द्रवित हो जाता है, जो बारंबार ऊँचे स्वरसे नाम ले-लेकर मुझे पुकारता है, कभी रोता है, कभी हँसता है और कभी लज्जा छोड़कर नाचता है, ऊँचे स्वरसे मेरा गुणगान करता है ऐसा भक्तिमान् पुरुष अपनेको पवित्र करे इसमें तो बात ही क्या है; परंतु वह अपने दर्शन और भाषणादिसे जगत‍्को पवित्र कर देता है।’

यही कारण था कि कीर्तनपरायण भक्तराज नारदजी और श्रीगौरांगदेव आदिके दर्शन और भाषण आदिसे ही अनेकों जीवोंका उद्धार हो गया।

महाप्रभुके कीर्तनको सुनकर वनमें रहनेवाले भीषण सिंह, भालू आदि हिंस्र पशुु भी प्रेममें निमग्न होकर नाम-कीर्तन करते हुए नाचने लगे थे। भगवान् कहते हैं—हे अर्जुन!

गीत्वा तु मम नामानि नर्तयेन्मम सन्निधौ।

इदं ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोऽहं तेन चार्जुन॥

‘जो मेरे नामोंका गान करता हुआ मुझे अपने समीप मानकर मेरे सामने नाचता है मैं सत्य कहता हूँ कि मैं उसके द्वारा खरीदा जाता हूँ।’

कीर्तनकी महिमा क्या कही जाय? जो कभी कीर्तन करता है उसी भाग्यवान‍्को इसके आनन्दका पता है। जिसको यह आनन्द प्राप्त करना हो वह स्वयं करके देख ले। वाणी इस आनन्दके रूपका वर्णन नहीं कर सकती। क्योंकि यह ‘मूकास्वादनवत्’ (नारद-भक्ति० ५२) गूँगेके गुड़के समान केवल अनुभवकी वस्तु है।

यहाँतक बहुत संक्षेपसे नाम, जप, स्मरण और कीर्तनसम्बन्धी कुछ बातें कही गयीं। साधकोंके सुभीतेके लिये यह भेद-कल्पना है। नहीं तो जप, स्मरण या कीर्तन सब एक ही वस्तु है। श्रीभगवान‍्के परम पावन नामका किसी तरहसे भी ग्रहण हो, वह कल्याणकारी ही है। नामके ही प्रतापसे प्रह्लादने जड़मेंसे चेतनरूप होकर भगवान् को अवतार लेनेके लिये बाध्य कर दिया। नामके प्रतापसे वह अग्नि, साँप आदिसे बच गया, जहर पीकर भी नहीं मरा। नामके ही प्रतापसे मीराके लिये जहर हरिचरणामृत हो गया। नामके ही प्रतापसे नारद, व्यास, शुकदेवादि जगत्-पूज्य हैं। नामके ही प्रतापसे ब्रह्माजी सृष्टि रचनेमें समर्थ हुए। नामके ही प्रतापसे पानीपर पत्थर तैर गये। नामके ही प्रतापसे हनुमान‍्जी चार सौ योजनका सागर अल्पायाससे लाँघ गये। नामके ही प्रतापसे श्रीशंकर, रामानुज, वल्लभ, मध्व, निम्बार्क, चैतन्य आदि आचार्योंने भगवद्भावको प्राप्त किया और उसीके प्रतापसे आज उनके शिष्य और वंशज पूजित हो रहे हैं। नामकी महिमा कहाँतक कही जाय! शेष, महेश, गणेश, शारदा भी जिसका वर्णन नहीं कर सकते, उसका वर्णन मैं क्षुद्रमति क्या करूँ? जो एक बार नामका मजा चख लेता है, वह पागल हो जाता है, उसके सारे पाप-ताप मिट जाते हैं। वह स्वयं मुक्त होकर दूसरोंके लिये मुक्तिका मार्ग प्रशस्त कर देता है। संतोंने इसीके बलसे जनताको मुक्तिकी राह बतलानेमें सफलता प्राप्त की थी। नाम ही जीवन है, नाम ही धन है, नाम ही परिवार है, नाम ही इज्जत है, नाम ही कीर्ति है, नाम ही स्वर्ग है, नाम ही अमृत है।

न नामसदृशं ज्ञानं न नामसदृशं व्रतम्।

न नामसदृशं ध्यानं न नामसदृशं फलम्॥

न नामसदृशस्त्यागो न नामसदृश: शम:।

न नामसदृशं पुण्यं न नामसदृशी गति:॥

नामैव परमा मुक्तिर्नामैव परमा गति:।

नामैव परमा शान्तिर्नामैव परमा स्थिति:॥

नामैव परमा भक्तिर्नामैव परमा मति:।

नामैव परमा प्रीतिर्नामैव परमा स्मृति:॥

नामैव कारणं जन्तोर्नामैव प्रभुरेव च।

नामैव परमाराध्यो नामैव परमो गुरु:॥

‘नामके समान न ज्ञान है, न व्रत है, न ध्यान है, न फल है, न दान है, न शम है, न पुण्य है और न कोई आश्रय है। नाम ही परम मुक्ति है, नाम ही परम गति है, नाम ही परम शान्ति है, नाम ही परम निष्ठा है, नाम ही परम भक्ति है, नाम ही परम बुद्धि है, नाम ही परम प्रीति है, नाम ही परम स्मृति है, नाम ही जीवका कारण है, नाम ही प्रभु है, नाम ही परम आराध्य है और नाम ही परम गुरु है!’ भगवान् कहते हैं, हे अर्जुन—

नामयुक्ताञ्जनान् दृष्ट्वा स्निग्धो भवति यो नर:।

स याति परमं स्थानं विष्णुना सह मोदते॥

तस्मान्नामानि कौन्तेय भजस्व दृढमानस:।

नामयुक्त: प्रियोऽस्माकं नामयुक्तो भवार्जुन॥

‘नामयुक्त पुरुषोंको देखकर जो मनुष्य प्रसन्न होता है, वह परमधामको प्राप्त होकर मुझ विष्णुके साथ आनन्द करता है। अतएव हे कौन्तेय! दृढ़ चित्तसे नाम-भजन करो। नामयुक्त व्यक्ति मुझे बड़ा प्रिय है। हे अर्जुन! तुम नामयुक्त होओ।’

यदि भारतीय हिंदू-जातिमें कभी एकता हो सकती है, यदि जगत‍्का सारा आस्तिक-समाज कभी प्रेमके एक सूत्रमें बँध सकता है, यदि कभी जगत‍्में विश्वप्रेमका पूरा प्रसार हो सकता है तो मेरी समझसे वह भगवन्नामसे ही सम्भव है! आज भगवान् को भूलकर लोग कार्य करते हैं, इसीलिये तो उन्हें सफलता नहीं मिलती। मैं तो सबसे यही प्रार्थना करता हूँ कि वैर-विरोध, हिंसा-मत्सर, काम-क्रोध, असत्य, स्तेयका यथासाध्य परित्याग कर सब श्रीभगवन्नामके साधनमें लग जायँ। मेरी समझमें इसीसे लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। (१) नामप्रेमियोंका संग, (२) प्रतिदिन नाम-जपका कुछ नियम, (३) भोगोंमें वैराग्यकी भावना और (४) संतोंके जीवनचरित्रका अध्ययन—ये नाम-साधनमें बड़े सहायक होते हैं। इन चारोंकी सहायतासे नाम-साधनमें सभीको लगना चाहिये। मेरा तो यह दृढ़ विश्वास है कि नामसे असम्भव भी सम्भव हो सकता है और इसके साधनमें किसीके लिये कोई रुकावट नहीं है। ऊँचे वर्णका हो, नीचेका हो, पण्डित हो, मूर्ख हो सभी इसके अधिकारी हैं, बल्कि ऊँचा वही है, बड़ा वही है, जो भगवन्नामपरायण है, जिसके मुख और मनसे निरन्तर विशुद्ध प्रेमपूर्वक श्रीभगवन्नामकी ध्वनि निकलती है।

गोसाईंजी महाराज कहते हैं—

धन्य धन्य माता पिता, धन्य पुत्रवर सोइ।

तुलसी जो रामहि भजें, जैसेहु कैसेहु होइ॥

तुलसी जाके बदनते, धोखेहु निकसत राम।

ताके पगकी पगतरी, मोरे तनुको चाम॥

तुलसी भक्त श्वपच भलो, भजै रैन दिन राम।

ऊँचो कुल केहि कामको, जहाँ न हरि को नाम॥

अति ऊँचो भूधरनपर, भुजगनके अस्थान।

तुलसी अति नीचे सुखद, ऊख अन्न अरु पान॥