स्मरण
स्मरण जपके साथ भी रहता है और अलग भी। यों तो पहले स्मृति हुए बिना न जप होता है और न कीर्तन होता है; परन्तु बीचमें स्मरण छूट जानेपर भी जप और कीर्तन होते रहते हैं। जीभका अभ्यास हो जानेपर जप होता रहता है। ठीक मन्त्रोंके अनुसार ही मालाकी मणियोंपर भी हाथ चलता रहता है; परन्तु स्मरण नहीं रहता। स्मृति मनकी वृत्ति है। वाणी अभ्यासवश एक काम करती है, मन उस समय किसी दूसरी स्मृतिमें रमता रहता है। इसलिये भगवान्ने मनसहित वाणीके जपको उत्तम बतलाया। जिस जपमें नामीकी मूर्ति, उसके गुण, उसके भाव या नामकी स्मृति रहती है वह जप स्मरणयुक्त कहलाता है। जो जप केवल जिह्वासे होता है वह जप स्मरणरहित कहा जाता है। स्मरणरहितकी अपेक्षा स्मरणयुक्तका माहात्म्य अधिक है; क्योंकि उसमें मन-वाणी दोनों एक काम करते हैं। महात्मा पुरुषोंके वचन हैं कि जिसकी जबान और मन दोनों एक-से होते हैं, वही सच्चा साधु है। स्मरणयुक्त जपमें जबान और मन दोनोंकी एकतानता हो जाती है। इसीलिये उसका फल इतना विशेष है; परन्तु स्मरण ऐसा भी होता है जो केवल स्मरण ही कहलाता है, जप नहीं। जप वही होता है, जिसकी संख्या होती है। स्मरणकी कोई संख्या नहीं होती। जहाँतक स्मरणका पूरा अभ्यास न हो वहाँतक तो स्मरणयुक्त जप ही करनेकी चेष्टा करनी चाहिये, परन्तु जब स्मरणका पूरा अभ्यास हो जाय तब फिर जपकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। ऐसे अनन्य स्मरणकी विधि और उसका फल श्रीभगवान् बतलाते हैं—
अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:।
तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:॥
(गीता ८।१४)
‘जो पुरुष अनन्य चित्त होकर सदा-सर्वदा मुझे स्मरण करता है उस मुझे निरन्तर स्मरण करनेवाले योगीके लिये मैं सुलभ हूँ।’ चित्तमें दूसरे विषयको कभी स्थान न हो, प्रतिदिन और प्रतिक्षण उसीकी स्मृति बनी रहे। इस प्रकार नित्य लगे रहनेवालेके लिये भगवान् सहज (सस्ते) हो जाते हैं, परन्तु इस स्मरणका रूप कैसा होता है। भक्तराज कबीरजी कहते हैं—
सुमिरनकी सुधि यों करो, जैसे कामी काम।
एक पलक ना बीसरे, निसिदिन आठो याम॥
सुमिरनकी सुधि यों करो, ज्यों सुरभी सुत माँहि।
कह कबीर चारो चरत, बिसरत कबहूँ नाँहि॥
सुमिरनकी सुधि यों करो, जैसे दाम कँगाल।
कह कबीर बिसरे नहीं, पल पल लेत सँभाल॥
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे नाद कुरंग।
कह कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजै तेहि संग॥
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे दीप पतंग।
प्रान तजै छिन एकमें, जरत न मोड़ै अंग॥
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे कीट भिरंग।
कबीर बिसारे आपको, होय जाय तेहि रंग॥
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे पानी मीन।
प्रान तजे पल बीछुड़े, सत कबीर कह दीन॥
जैसे कामी आठ पहरमें एक क्षणके लिये भी स्त्रीको नहीं भूलता, जैसे गौ वनमें घास चरती हुई भी बछड़ेको सदा याद रखती है, जैसे कंगाल अपने टेंटके पैसेको पल-पलमें सँभाला करता है, जैसे हरिण प्राण दे देता है; परन्तु वीणाके स्वरको नहीं भूलना चाहता, जैसे बिना संकोचके पतंग दीपशिखामें जल मरता है; परन्तु उसके रूपको भूलता नहीं, जैसे कीड़ा अपने-आपको भुलाकर भ्रमरके स्मरणमें उसीके रंगका बन जाता है और जैसे मछली जलसे बिछुड़नेपर प्राण त्याग कर देती है; परन्तु उसे भूलती नहीं। गोसाईंजी महाराजने भी कहा है—
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम॥
स्मरणका यह स्वरूप है।
इस प्रकार जिनका मन उस परमात्माके नाम-चिन्तनमें रम जाता है वे तृप्त, पूर्णकाम और अकाम हो जाते हैं। उन्हें किसी भी वस्तुकी इच्छा अवशेष नहीं रह जाती।
भगवान्ने कहा है—
न पारमेष्ठ्यं न महेन्द्रधिष्ण्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योगसिद्धीरपुनर्भवं वा
मय्यर्पितात्मेच्छति मद्विनान्यत्॥
(श्रीमद्भा० ११। १४। १४)
‘जिसने अपना चित्त मुझमें अर्पित कर दिया है, वह मुझे छोड़कर ब्रह्माजीका पद, स्वर्गका राज्य, समस्त भूमण्डलका चक्रवर्तित्व, पातालादि देशोंका आधिपत्य, अणिमादि योगकी सिद्धियाँ तथा मोक्ष—कुछ भी नहीं चाहता!’
यहाँपर कोई कह सकते हैं कि यह तो नामीके स्मरणकी कथा है। यहाँ नामकी कौन-सी बात है? इसका उत्तर यह है कि नामसे ही नामीका पता लगता है, हम यदि अपने पिताके स्वरूपका स्मरण करते हैं तो ‘पिता’ इस सम्बन्ध-नामका स्मरण पहले होता है, नाम बिना नामीकी कल्पना ही नहीं हो सकती। नाम ही नामीका परिचय कराता है। गोसाईंजीने बहुत ही सुन्दर कहा है—
देखिअहिं रूप नाम आधीना।
रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥
रूप बिसेष नाम बिनु जानें।
करतल गत न परहिं पहिचानें॥
रूप नामके अधीन ही देखा जाता है। किसीके हाथमें हीरा है; परन्तु जबतक उस हीरेको वह हीरा नहीं समझता तबतक उसे रूपका ज्ञान नहीं होता। रूपका ज्ञान हुए बिना वह उसका मूल्य नहीं जानता। जब किसी जौहरीसे उसका नाम ‘हीरा’ जान लेता है तभी उसे उसकी बहुमूल्यताका ज्ञान होता है। इससे यह सिद्ध हो गया कि नामका स्मरण हुए बिना नामीका ज्ञान नहीं होता। नामका कुछ दिनोंतक स्मरण करनेपर, साधकके अन्तरमें जो एक आनन्दका सरोवर बँधा पड़ा है उसका बाँध टूट जाता है, वह सुखकी प्रबल धारामें बह जाता है। उस समय उस नामरसके सामने उसे सब रस फीके मालूम होने लगते हैं। वह जोरसे पुकार उठता है कि—
पायो नाम चारु चिंतामनि
उर कर तें न खसैहौं।
नामकी सुन्दर चिन्तामणि मुझे मिल गयी। अब मैं इसे हृदय और हाथोंसे कभी न जाने दूँगा। वह ऐसा क्यों कहता है? इसीलिये कि उसे इसमें वह सुख मिलता है जो बड़े-बड़े विषयी सम्राटोंको भी नसीब नहीं होता।
भगवान् कहते हैं—
मय्यर्पितात्मन: सभ्य निरपेक्षस्य सर्वत:।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत् कुत: स्याद् विषयात्मनाम्॥
(श्रीमद्भा० ११। १४। १२ )
‘मुझमें चित्त लगानेवाले और समस्त विषयोंकी अपेक्षा छोड़नेवाले भक्तको मुझसे जो परम सुख मिलता है वह सुख विषयासक्तचित्त लोगोंको कहाँसे मिल सकता है?
मन जितना ही विषयोंका चिन्तन करता है उतना ही संसारमें बँधता है; क्योंकि विषय-चिन्तनसे ही क्रमश: संग, काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रंश, बुद्धिनाश और अन्तमें सर्वनाश होता है। मनमें पहले-पहल जब स्फुरणा उठती है तो वह तरंगके सदृश होती है, परन्तु वही आगे जाकर समुद्र बन जाती है। इसलिये अपना कल्याण चाहनेवाले लोगोंको चाहिये कि वे मनमें विषयोंके बदले धीरे-धीरे भगवान् को स्थान दें। उपर्युक्त युक्तियोंके द्वारा नाम-स्मरण करें। एक दृढ़ अभ्यासका नाश करनेके लिये उसके विरोधी दूसरे अभ्यासकी ही आवश्यकता होती है। अनभ्यस्त विषयके चिन्तनमें पहले-पहल मन ऊबता, अकुलाता और झल्लाता है; परन्तु दृढ़ताके साथ अभ्यास करते रहनेपर अन्तमें वह तदाकार बन ही जाता है। इसलिये हठसे भी मनको परमात्माके नाम-स्मरणमें लगाना चाहिये। नियम कर लेना चाहिये कि मनसे इतने नाम-जप प्रतिदिन अवश्य करेंगे। कम-से-कम उतना जप तो प्रतिदिन हो ही जाना चाहिये। स्मरणसे ही मनमें प्रेमकी उत्पत्ति होती है। एक स्त्री अपने नैहरमें है, उसका पति वहाँ नहीं है। पतिका रूप उसके सामने नहीं है; परन्तु पतिका नाम-स्मरण होते ही उसका मन प्रेमसे भर जाता है।
नाम-स्मरण करते-करते जब स्मरणकी बान पड़ जाती है तब तो मन कभी उसे छोड़ता ही नहीं। स्मरणसे क्या नहीं होता? यदि अन्तकालमें परमात्माके नामका स्मरण हो जाय तो उसके मोक्षमें जरा-सा भी सन्देह नहीं रह जाता। भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि—
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
य: प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशय:॥
(गीता ८। ५)
‘जो पुरुष मृत्युकालमें मुझे स्मरण करता हुआ शरीर त्याग कर जाता है वह मुझे ही प्राप्त होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं!’ परन्तु अन्तकालमें परमात्माकी स्मृति किसे होती है जो ‘सदा तद्भावभावित:’ होता है, अर्थात् सदा जिस भावका चिन्तन करता है अन्तकालमें भी प्राय: उसीका स्मरण हुआ करता है। इसीलिये भगवान्ने अर्जुनसे कहा कि हे पार्थ!
तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥
(गीता ८। ७)
‘तू सदा-सर्वदा मेरा स्मरण करता हुआ युद्ध कर, इस प्रकार मुझमें मन-बुद्धि अर्पित हो जानेसे तू निस्सन्देह मुझे ही प्राप्त होगा।’
ब्राह्मण हो तो वेदाध्ययन करे, क्षत्रिय हो तो रणमें जाय, वैश्य हो तो व्यापार करे, शूद्र हो तो सेवा करे। सब अपना-अपना काम करें, परन्तु करें, उसे याद रखते हुए। वैसे ही जैसे कि दुराचारिणी उपपतिको, सती पतिको, कृपण धनको और विषयी विषयको निरन्तर याद रखता है। पनिहारी सिरपर दो घड़े उठाकर चलती है, रास्तेमें दूसरोंसे बात भी करती है, परन्तु उसकी स्मृति रहती है सिरपर उठाये हुए उन दोनों घड़ोंमें! इस प्रकार क्षणमात्रके स्मरणसे ही बड़ा काम होता है। आजकल लोग माला फेरते हैं, हाथ रहता है गौमुखीमें, परंतु मन डोला करता है विषयोंमें। मन्त्र-जपमें गौणता होती है और विषयोंमें मुख्यता। इसीसे जप करते-करते बीच-बीचमें वे बोल उठते हैं।
एक सेठजी जप कर रहे थे, माला हाथमें थी, मुँहसे भी मन्त्रका उच्चारण करते थे; परन्तु उनका मन और ही अनेक बातोंके चिन्तनमें लगा हुआ था। पुत्र भी पास बैठा सन्ध्या कर रहा था। सेठजी माला फेरते-फेरते ही बीचमें बोल उठे ‘अरे! कल सब ग्राहकोंके रुपये आ गये? राम राम राम राम। देख! तू बड़ा मूर्ख है, कहीं व्यापारमें भी सचाईसे कमाई होती है? राम राम राम राम! हाथीके दाँत दिखानेके दूसरे और खानेके दूसरे होते हैं—राम राम राम राम! नहीं तो व्यापारमें रस-कस कैसे बैठे? राम राम राम राम। माप-तौलमें जरा कस बैठना चाहिये—राम राम राम राम। मैं तो मर जाऊँगा फिर तेरा काम कैसे चलेगा? राम राम राम राम।’
इस तरह राम राम करनेवाले ढोंगी लोगोंके कारण ही नामपरसे लोगोंकी रुचि घटती है; परन्तु नामप्रेमियोंको इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिये। यदि कोई मूर्ख रत्नका दुरुपयोग भी करता है तो इससे रत्नका रत्नपना और उसकी बहुमूल्यता थोड़े ही घट जाती है। कहनेका तात्पर्य केवल इतना ही है कि स्मरण सच्चा होनेसे ही शीघ्र फलप्रद होता है।
स्मरणके बाद आता है—