१ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग मालकोस—तीन ताल)

राधिके! तुम मम जीवन-मूल।

अनुपम अमर प्रान-संजीवनि,

नहिं कहुँ कोउ समतूल॥१॥

हे प्यारी राधिके! तुम मेरे जीवनकी मूल हो, मेरे प्राणोंकी अनुपम, अमर संजीवनी हो। तुम्हारे समान दूसरी कोई कहीं नहीं है॥ १॥

जस सरीरमें निज-निज थानहिं

सबही सोभित अंग।

किंतु प्रान बिनु सबहि ब्यर्थ,

नहिं रहत कतहुँ कोउ रंग॥२॥

तस तुम प्रिये! सबनिके सुखकी

एक मात्र आधार।

तुम्हरे बिना नहीं जीवन-रस,

जासौं सब कौ प्यार॥३॥

जैसे शरीरमें अपनी-अपनी जगह सभी अंग शोभा देते हैं, परंतु प्राणोंके बिना सभी व्यर्थ हैं, किसीमें कहीं कोई शोभा नहीं रह जाती, उसी प्रकार हे प्यारी! सबके सुखकी एकमात्र आधार तुम ही हो। तुम्हारे बिना जीवनमें कोई रस नहीं रह जाता, जिस (जीवन)-को सब कोई प्यार करते हैं॥ २-३॥

तुम्हरे प्राननि सौं अनुप्रानित,

तुम्हरे मन मनवान।

तुम्हरौ प्रेम-सिंधु-सीकर लै

करौं सबहि रसदान॥४॥

मेरे प्राण तुम्हारे प्राणोंसे ही संचालित रहते हैं, तुम्हारे मनसे ही मैं मनवान् बना हूँ—तुम्हारे मनसे ही मेरे मनकी सत्ता है। तुम्हारे प्रेमरूपी समुद्रकी एक बूँदको ही लेकर मैं सबको रसदान करता हूँ॥४॥

तुम्हरे रस-भंडार पुन्य तैं

पावत भिच्छुक चून।

तुम सम केवल तुमहि एक हौ,

तनिक न मानौ ऊन॥५॥

तुम्हारे पुण्यमय—पवित्र रस-भण्डारसे ही सभी भिक्षुक चून—रसकण प्राप्त करते हैं, सबको रस वहींसे मिलता है। तुम्हारे समान तो एकमात्र तुम्हीं हो, इसमें तुम तनिक भी कसर मत समझो॥५॥

सोऊ अति मरजादा, अति

संभ्रम-भय-दैन्य-सँकोच।

नहिं कोउ कतहुँ कबहुँ तुम-सी

रसस्वामिनि निस्संकोच॥६॥

इस प्रकार मैं तुम्हारे ही रस-भण्डारमेंसे रस-दान करता हूँ, परंतु उसमें बड़ी ही मर्यादा, बड़ा संयम, भय, दीनता और संकोच बना रहता है (मुक्तहस्तसे—उदारतापूर्वक नहीं कर सकता)। तुम-जैसी संकोच छोड़कर रस बाँटनेवाली उदार रसकी स्वामिनी तो एक तुम ही हो, दूसरी कोई कहीं, कभी नहीं है॥६॥

तुम्हरौ स्वत्व अनंत नित्य, सब

भाँति पूर्न अधिकार।

कायब्यूह निज रस-बितरन

करवावति परम उदार॥७॥

फिर मुझपर तो तुम्हारा नित्य अनन्त स्वत्व है—कभी नहीं हटनेवाला हक है (मैं तो सदा तुम्हारी ही सम्पत्ति हूँ)। अतएव मुझपर सभी प्रकारसे तुम्हारा पूरा अधिकार है। (इसीसे मुझको निमित्त बनाकर) तुम अपनी कायव्यूहरूपा—अंगस्वरूपा गोपीजनोंके द्वारा परम उदार होकर खुले हाथों रसका वितरण करवाती हो—रस बँटवाती रहती हो॥७॥

तुम्हरी मधुर रहस्यमई

मोहनि माया सौं नित्य।

दच्छिन बाम रसास्वादन हित

बनतौ रहूँ निमित्त॥८॥

मैं तो यही चाहता हूँ कि तुम्हारी रहस्यमयी, मेरे जीवनको सदा मुग्ध रखनेवाली मीठी मायाके—रसमयी प्रीतिके वशीभूत रहकर मैं तुम्हारे दक्षिण और वाम दोनों प्रकारके भावोंके रसास्वादनमें निमित्त बनता रहूँ॥८॥