१० श्रीराधाके प्रेमोद्गार—श्रीकृष्णके प्रति
(राग गूजरी—ताल कहरवा)
मेरे धन-जन-जीवन तुम ही,
तुम ही तन-मन, तुम सब धर्म।
तुम ही मेरे सकल सुख सदन,
प्रिय निज जन, प्राणोंके मर्म॥१॥
हे प्राणप्रियतम! मेरा धन, परिवार तथा जीवन तुम्हीं हो; तुम्हीं मेरा शरीर और मन हो; तुम्हीं मेरे सम्पूर्ण धर्म हो। तुम्हीं मेरे समस्त सुखोंके सुन्दर आलय हो। तुम्हीं प्रिय निज-जन और तुम्हीं प्राणोंके मर्म—आधार हो॥१॥
तुम्हीं एक, बस, आवश्यकता;
तुम ही एकमात्र हो पूर्ति।
तुम्हीं एक सब काल, सभी विधि,
हो उपास्य शुचि सुन्दर मूर्ति॥२॥
अधिक क्या कहूँ, तुम्हीं मेरी एकमात्र आवश्यकता हो और तुम्हीं उसकी एकमात्र पूर्ति हो। तुम्हीं मेरे लिये सब समय और सब प्रकारसे उपासना करनेयोग्य पवित्र और मधुर-मनोहर मूर्ति हो॥२॥
तुम ही काम-धाम सब मेरे,
एकमात्र तुम लक्ष्य महान।
आठों पहर बसे रहते तुम
मम मन-मन्दिरमें भगवान*॥३॥
तुम्हीं मेरे समस्त कार्य और घर हो और तुम्हीं मेरे एकमात्र महान् लक्ष्य हो। आठों पहर तुम मेरे मनरूपी मन्दिरमें भगवान्—इष्टदेवके रूपमें बसे रहते हो॥३॥
सभी इन्द्रियोंको तुम शुचितम
करते नित्य स्पर्श-सुख-दान।
बाह्याभ्यन्तर नित्य निरन्तर
तुम छेड़े रहते निज तान॥४॥
तुम मेरी समस्त इन्द्रियोंको नित्य पवित्रतम स्पर्शसुखका दान करते रहते हो। मेरे भीतर और बाहर तुम सदा अविराम अपनी मधुर तान छेड़ा करते हो॥४॥
कभी नहीं तुम ओझल होते,
कभी नहीं तजते संयोग।
घुले-मिले रहते करवाते-
करते निर्मल रस-सम्भोग॥५॥
तुम कभी मेरे नेत्रोंसे अदृश्य नहीं होते, एक पलकभर भी संयोगका त्याग नहीं करते और सदा घुले-मिले रहकर पवित्र रसका सम्भोग करते एवं करवाते रहते हो॥५॥
पर इसमें न कभी मतलब कुछ
मेरा तुमसे रहता भिन्न।
हुए सभी संकल्प भंग मैं-
मेरेके समूल तरु छिन्न॥६॥
परंतु इसमें मेरा तुमसे भिन्न कभी कुछ दूसरा अभिप्राय नहीं रहता। मेरे समस्त संकल्प भंग हो चुके हैं और अहंकार तथा ममताके वृक्ष जड़से कट गये हैं॥६॥
भोक्ता, भोग्य—सभी कुछ तुम हो,
तुम ही स्वयं बने हो भोग।
मेरा मन बन सभी तुम्हीं हो
अनुभव करते योग-वियोग॥७॥
भोगनेवाले और भोगनेकी वस्तु—सब कुछ तुम्हीं हो और तुम्हीं स्वयं भोगकी क्रिया बने हो और मेरा मन बनकर तुम्हीं संयोग और वियोग—सभीका अनुभव किया करते हो॥७॥