११ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग शिवरंजनी—तीन ताल)

मेरा तन-मन सब तेरा ही,

तू ही सदा स्वामिनी एक।

अन्योंका उपभोग्य न भोक्ता

है कदापि, यह सच्ची टेक॥१॥

अहो प्राणप्यारी! मेरा शरीर और मन—सब तेरा ही है, तू ही मेरी सदा एकमात्र स्वामिनी है। मेरे ये शरीर और मन और किसीके किसी कालमें न तो उपभोग्य—भोगनेकी वस्तु हैं और न भोगनेवाले हैं, यह मेरी सच्ची टेक—प्रण है॥१॥

तन समीप रहता न स्थूलत:,

पर जो मेरा सूक्ष्म शरीर।

क्षणभर भी न विलग रह पाता,

हो उठता अत्यन्त अधीर॥२॥

मेरी देह स्थूलरूपसे तेरे समीप [सदा] नहीं रहती—यह सच है, परंतु मेरा जो यह सूक्ष्मशरीर है, वह एक क्षण भी तुझसे विलग नहीं रह सकता, [तेरे वियोगमें] अत्यन्त अधीर—विकल हो जाता है॥२॥

रहता सदा जुड़ा तुझसे ही,

अत: बसा तेरे पद-प्रान्त।

तू ही उसकी एकमात्र

जीवनकी जीवन है निर्भ्रान्त॥३॥

यह सदा-सर्वदा तुझीसे जुड़ा रहता है और इसीसे तेरे चरणोंके समीप ही बसा रहता है। कारण, तू ही इसके जीवनकी एकमात्र जीवन—आधार है, इसमें कोई भ्रम नहीं॥३॥

हुआ न होगा अन्य किसीका

उसपर कभी तनिक अधिकार।

नहीं किसीको सुख देगा,

लेगा न किसीसे किसी प्रकार॥४॥

उसपर किसी दूसरेका किसी कालमें रंचमात्र अधिकार न हुआ है और न होगा। न तो उसके द्वारा किसीको सुख मिलनेका और न उसको किसीसे किसी प्रकारका सुख मिल सकता है॥४॥

यदि वह कभी किसीसे किंचित्

दिखता करता-पाता प्यार।

वह सब तेरे ही रसका, बस,

है केवल पवित्र विस्तार॥५॥

यदि किसी क्षण वह किसीसे रंचमात्र भी प्यार करता अथवा प्यार प्राप्त करता दीखे तो (समझ लेना चाहिये कि) वह सब एकमात्र तेरे ही रसका पवित्र विस्तार है और कुछ नहीं॥५॥

कह सकती तू मुझे सभी कुछ,

मैं तो नित तेरे आधीन।

पर न मानना कभी अन्यथा,

कभी न कहना निजको दीन॥६॥

तू मुझको यथारुचि सब कुछ (जो चाहे सो) कह सकती है, मैं तो सदा तेरे अधीन हूँ। परंतु मेरी इस बातको कभी अन्यथा मत मानना और न अपनेको किसी क्षण दीन कहना॥६॥

इतनेपर भी मैं तेरे

मनकी न कभी हूँ कर पाता।

अत: बना रहता हूँ सतत

तुझको दुखका ही दाता॥७॥

इतनेपर भी मैं तेरे मनकी कभी नहीं कर पाता। इसीसे मैं सदा तेरे लिये दु:खका ही कारण बना रहता हूँ॥७॥

अपनी ओर देख तू मेरे

सब अपराधोंको जा भूल।

करती रह कृतार्थ मुझको, दे

पावन पद-पंकजकी धूल॥८॥

परंतु मेरी तो तुझसे यह विनती है कि तू अपनी ओर देखकर मेरे समस्त अपराधोंको भूल जा और मुझको अपने चरण-कमलोंकी पावन धूल देकर कृतार्थ—निहाल करती रह॥८॥