१२ श्रीराधाके प्रेमोद्गार—श्रीकृष्णके प्रति
(राग शिवरंजनी—तीन ताल)
तुमसे सदा लिया ही मैंने,
लेती-लेती थकी नहीं।
अमित प्रेम-सौभाग्य मिला, पर
मैं कुछ भी दे सकी नहीं॥१॥
हे प्राणेश्वर! तुमसे मैंने सदा लिया-ही-लिया है, लेती-लेती मैं किसी क्षण थकी (अघायी) नहीं। तुमसे मुझको अपार प्रेम और सौभाग्य मिला, परंतु मैं तुमको कुछ भी नहीं दे सकी॥१॥
मेरी त्रुटि, मेरे दोषोंको
तुमने देखा नहीं कभी।
दिया सदा, देते न थके तुम,
दे डाला निज प्यार सभी॥२॥
मेरी त्रुटि अथवा दोष तुमने कभी नहीं देखे; तुम सदा ही देते रहे, देते-देते कभी थके-(अघाये) नहीं, अपना समस्त प्यार मुझपर उँड़ेल दिया॥२॥
तब भी कहते—‘दे न सका मैं
तुमको कुछ भी, हे प्यारी!
तुम-सी शील-गुणवती तुम ही,
मैं तुम पर हूँ बलिहारी’॥३॥
इसपर भी तुम कहते हो—‘हे प्यारी! मैं तुझको कुछ भी नहीं दे सका। तुम्हारे-जैसी शील-स्वभाव और गुणोंसे युक्त नागरी एक तुम्हीं हो; मैं तुमपर बलिहारी—न्योछावर हूँ’॥३॥
क्या मैं कहूँ प्राणप्रियतमसे,
देख लजाती अपनी ओर।
मेरी हर करनीमें ही तुम
प्रेम देखते, नन्दकिशोर!॥४॥
मैं अपने प्राण-प्रियतम तुमसे क्या कहूँ; मैं अपनी ओर जब देखती हूँ तो लाजके मारे गड़ जाती हूँ। प्यारे नन्दकिशोर! (मैं क्या कहूँ) मेरी प्रत्येक करनीमें तुमको प्रेमके ही दर्शन होते हैं। (यह तुम्हारी प्रेममयी दृष्टिका चमत्कार है!)॥४॥