१३ श्रीकृष्णके प्रेमोद्गार—श्रीराधाके प्रति
(राग वागेश्री—तीन ताल)
राधे! तू ही चित्तरंजनी,
तू ही चेतनता मेरी।
तू ही नित्य आतमा मेरी,
मैं हूँ, बस, आत्मा तेरी॥१॥
प्यारी राधे! तू ही मेरे चित्तको रंजन करनेवाली है—(नहीं-नहीं) तू ही मेरी चेतनता है—तेरी ही सत्तासे मैं चेतन बना हुआ हूँ। तू ही मेरी सनातन आत्मा है और मैं तेरी आत्मा हूँ—इससे अधिक और क्या कहूँ॥१॥
तेरे जीवनसे जीवन है,
तेरे प्राणोंसे हैं प्राण।
तू ही मन, मति, चक्षु, कर्ण, त्वक्,
रसना, तू ही इन्द्रिय-घ्राण॥२॥
तेरे जीवनसे ही मेरा जीवन है और तेरे प्राणोंसे ही मेरे प्राणोंकी सत्ता है। मेरे मन, बुद्धि, नेत्र, कान, त्वचा, रसना और घ्राणेन्द्रिय (नासिका) तू ही है॥२॥
तू ही स्थूल-सूक्ष्म इन्द्रियके
विषय सभी मेरे सुखरूप।
तू ही मैं, मैं ही तू, बस,
तेरा-मेरा सम्बन्ध अनूप॥३॥
मेरी स्थूल एवं सूक्ष्म इन्द्रियोंके सुखरूप विषय तू ही है। तू ही मैं है और मैं ही तू हूँ। बस, तेरा-मेरा सम्बन्ध उपमारहित—अद्वितीय है॥३॥
तेरे बिना न मैं हूँ, मेरे
बिना न तू रखती अस्तित्व।
अविनाभाव विलक्षण यह
सम्बन्ध, यही, बस, जीवन-तत्त्व॥४॥
तेरे बिना मेरी कुछ हस्ती नहीं और मेरे बिना तेरा कुछ अस्तित्व नहीं। तेरा-मेरा यह अनोखा अविनाभाव सम्बन्ध है—मेरे बिना तू और तेरे बिना मैं नहीं रह सकता। बस, यही जीवनका तत्त्व—सार है॥४॥