१४ श्रीराधाके प्रेमोद्गार—श्रीकृष्णके प्रति
(राग वागेश्री—तीन ताल)
तुम अनन्त सौन्दर्य-सुधा-निधि,
तुममें सब माधुर्य अनन्त।
तुम अनन्त ऐश्वर्य-महोदधि,
तुममें सब शुचि शौर्य अनन्त॥१॥
हे प्राणप्यारे! तुम सौन्दर्यरूप सुधाकी अनन्त निधि हो, तुममें सब प्रकारका अनन्त माधुर्य भरा है। तुम ऐश्वर्यके भी अनन्त महासागर हो और तुम्हारे भीतर सब प्रकारकी पवित्र शूरवीरता भी अनन्त रूपमें भरी है॥१॥
सकल दिव्य सद्गुण-सागर तुम
लहराते सब ओर अनन्त।
सकल दिव्य रस निधि तुम अनुपम,
पूर्ण रसिक, रसरूप अनन्त॥२॥
सम्पूर्ण दिव्य श्रेष्ठ गुणोंके अनन्त सागररूपमें तुम सब दिशाओंमें लहराया करते हो। तुम सम्पूर्ण अलौकिक रसोंकी अनुपम निधि हो एवं पूर्ण रसिक हो और अनन्त रसरूप हो॥२॥
इस प्रकार जो सभी गुणोंमें,
रसमें अमित, असीम, अपार।
नहीं किसी गुण-रसकी उसे
अपेक्षा कुछ भी, किसी प्रकार॥३॥
इस प्रकार जो सम्पूर्ण गुणोंमें तथा रसमें परिमाणरहित, सीमारहित और अपार हो, उसको किसी गुण अथवा रसकी किसी प्रकारसे तनिक भी अपेक्षा—चाह अथवा प्रयोजन नहीं हो सकता॥३॥
फिर, मैं तो गुणरहित सर्वथा,
कुत्सित-गति सब भाँति,गँवार।
सुन्दरता-मधुरता-रहित,
कर्कश, कुरूप, अति दोषागार॥४॥
इसके विपरीत, मैं तो सब प्रकारसे गुणहीन, सब तरहसे बेढंगी एवं गँवारिन हूँ। सुन्दरता, मधुरताका मुझमें नाम-निशान भी नहीं। इतना ही नहीं, मैं कठोर स्वभावकी, अत्यन्त कुरूपा और दोषोंकी घर हूँ॥४॥
नहीं वस्तु कुछ भी ऐसी,
जिससे तुमको मैं दूँ रस-दान।
जिससे तुम्हें रिझाऊँ, जिससे
करूँ तुम्हारा पूजन-मान॥५॥
मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं, जिससे मैं तुमको रस—आनन्द दे सकूँ, जिससे मैं तुमको रिझा सकूँ, जिससे मैं तुम्हारी पूजा कर सकूँ, तुम्हारा सम्मान कर सकूँ॥५॥
एक वस्तु मुझमें अनन्य,
आत्यन्तिक है विरहित उपमान।
‘मुझे सदा प्रिय लगते तुम’,
यह तुच्छ किंतु अत्यन्त महान॥६॥
हाँ, एक ऐसी तुच्छ, परंतु अत्यन्त गौरवकी वस्तु मेरे पास अवश्य है, जो किसी दूसरेके पास नहीं, जिसका अन्त नहीं हो सकता और जिसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता। वह यह है कि ‘तुम मुझको सदा प्यारे लगते हो’॥६॥
रीझ गये तुम इसी एकपर,
किया मुझे तुमने स्वीकार।
दिया स्वयं आकर अपनेको,
किया न कुछ भी सोच-विचार॥७॥
इसी एक वस्तुपर तुम रीझ गये और तुमने मुझको अंगीकार कर लिया। इसीपर तुमने स्वयं पधारकर अपने-आपको मुझे दे दिया, कुछ भी सोच-विचार नहीं किया॥७॥
भूल उच्चता, भगवत्ता सब,
सत्ताका सारा अधिकार।
मुझ नगण्यसे मिले तुच्छ बन,
स्वयं छोड़ संकोच-सँभार॥८॥
मानो अति आतुर मिलनेको,
मानो हो अत्यन्त अधीर।
तत्त्वरूपता भूल सभी,
नेत्रोंसे लगे बहाने नीर॥९॥
अपनी सम्पूर्ण महानता, भगवत्ता एवं सत्ताका समस्त अधिकार भूलकर और संकोचका बोझ उतारकर तथा परवाह छोड़कर स्वयं तुच्छ बनकर तुम मुझ नगण्य—नाचीजसे इस प्रकार मिले, मानो कोई मिलनेके लिये अत्यन्त आतुर—उतावला और अधीर हो। और-तो-और, तुम अपनी तत्त्वरूपता—वास्तविक सर्वरूपताको भूलकर नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे॥८-९॥
बढ़ी अमित, उमड़ी रस-सरिता
पावन, छायी चारों ओर।
डूबे सभी भेद उसमें, फिर
रहा कहीं भी ओर न छोर॥११॥
उस समय रसकी वह पावन सरिता अपाररूपसे बढ़ गयी और उमड़कर चारों ओर छा गयी, व्याप्त हो गयी। सब प्रकारके भेदभाव उसकी गहराईमें डूब गये, विलीन हो गये और उस रससरिताका कहीं ओर-छोर नहीं रहा॥११॥
हो व्याकुल, भर रस अगाध,
आकर शुचि रस-सरिताके तीर।
करने लगे परम अवगाहन,
तोड़ सभी मर्यादा धीर॥१०॥
इतना ही नहीं, व्याकुल होकर अगाध रस भरकर तथा पवित्र रसकी सरिताके तीरपर आकर सब प्रकारकी मर्यादा एवं धीरजके बाँधको सर्वथा तोड़कर उस नदीमें तुम अत्यन्त गहरे गोते लगाने लगे॥१०॥
प्रेमी, प्रेम, परम प्रेमास्पद—
नहीं ज्ञान कुछ, हुए विभोर।
राधा प्यारी हूँ मैं, या हो
केवल तुम प्रिय नन्दकिशोर॥१२॥
प्रेमी, प्रेम और परम प्रेमास्पदका भेद-ज्ञान तनिक भी नहीं रहा और तुम बेभान हो गये। उस समय तुमको यह भी ज्ञान नहीं रह गया कि ‘केवल मैं तुम्हारी राधा प्यारी हूँ’ अथवा ‘मेरे प्रियतम तुम नन्दकिशोर ही हो’ (‘केवल मैं रह गयी हूँ या केवल तुम्हीं हो’—इस बातका भी भान नहीं रहा)॥१२॥