१५ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग भैरवी—तीन ताल)

राधा! तुम-सी तुम्हीं एक हो,

नहीं कहीं भी उपमा और।

लहराता अत्यन्त सुधा-रस-

सागर, जिसका ओर न छोर॥१॥

प्यारी राधे! तुम्हारे-जैसी तो तुम एक ही हो और किसीमें भी तुम्हारी समता नहीं है। तुम्हारे भीतर सुधा-रसका अनन्त सागर लहराया करता है, जिसका कहीं ओर-छोर नहीं दीखता॥१॥

मैं नित रहता डूबा उसमें,

नहीं कभी ऊपर आता।

कभी तुम्हारी ही इच्छासे

हूँ लहरोंमें लहराता॥२॥

उसमें मैं सदा डूबा रहता हूँ, कभी उतराता नहीं। किसी क्षण तुम्हारी इच्छासे ही (ऊपर आकर) तरंगोंमें लहराता रहता हूँ॥२॥

पर वे लहरें भी गाती हैं

एक तुम्हारा रम्य महत्त्व।

उनका सब सौन्दर्य और

माधुर्य, तुम्हारा ही है स्वत्व॥३॥

परंतु वे तरंगें भी एक तुम्हारे ही परम रमणीय महत्त्वका गान किया करती हैं; उन लहरोंका समस्त सौन्दर्य तथा माधुर्य एकमात्र तुम्हारी ही सम्पत्ति—निजस्व है॥३॥

तो भी उनके बाह्य रूपमें

ही, बस, मैं हूँ लहराता।

केवल तुम्हें सुखी करनेको

सहज कभी ऊपर आता॥४॥

तो भी उनके बाह्यरूपमें ही मैं लहराता रहता हूँ, इससे अधिक मैं क्या कहूँ? केवल तुमको सुखी करनेके लिये ही किसी क्षण सहज रूपसे मैं उतराने लगता हूँ॥४॥

एकच्छत्र स्वामिनि तुम मेरी

अनुकम्पा अति बरसाती।

रखकर सदा मुझे संनिधिमें

जीवनके क्षण सरसाती॥५॥

मेरी एकच्छत्र स्वामिनि! तुम मुझपर अपार दया बरसाती रहती हो और मुझको सदा अपने समीप रखकर जीवनके क्षणोंको सरस बनाती रहती हो॥५॥

अमित नेत्रसे गुण-दर्शन कर,

सदा सराहा ही करती।

सदा बढ़ाती सुख अनुपम,

उल्लास अमित उरमें भरती॥६॥

अनन्त नेत्रोंसे मुझमें गुण देखकर सदा मुझको सराहा करती हो तथा नित्य मेरे उपमारहित सुखको बढ़ाती हुई हृदयमें अपार उल्लास भरती रहती हो॥६॥

सदा, सदा मैं सदा तुम्हारा,

नहीं कदा कोई भी अन्य—

कहीं जरा भी कर पाता

अधिकार दासपर सदा अनन्य॥७॥

मैं सदा, सदा, सदा तुम्हारा हूँ; तुम्हारे इस नित्य अनन्य दासपर कहीं कोई दूसरा कभी रंचमात्र भी अधिकार नहीं कर सकता॥७॥

जैसे मुझे नचाओगी तुम,

वैसे नित्य करूँगा नृत्य।

यही धर्म है, सहज प्रकृति यह,

यही एक स्वाभाविक कृत्य॥८॥

जिस प्रकारसे मुझको तुम नचाओगी, मैं उसी प्रकारसे सदा नाचा करूँगा। यही मेरा धर्म है, यही मेरा सहज स्वभाव है और यही मेरा एकमात्र स्वाभाविक कर्म है॥८॥