१६ श्रीराधाके प्रेमोद‍्गार—श्रीकृष्णके प्रति

(राग भैरवी तर्ज—तीन ताल)

तुम हो यन्त्री, मैं यन्त्र; काठकी

पुतली मैं, तुम सूत्रधार।

तुम करवाओ, कहलाओ, मुझे

नचाओ निज इच्छानुसार॥१॥

हे प्रियतम! तुम यन्त्री—यन्त्रके चालक हो, मैं यन्त्र हूँ; मैं काठकी पुतली हूँ, तुम सूत्रधार—पुतलीको नचानेवाले हो। तुम अपनी इच्छाके अनुसार मुझसे क्रिया करवाते तथा बुलवाते एवं अपने इशारेपर नचाते रहो॥१॥

मैं करूँ, कहूँ, नाचूँ नित ही

परतन्त्र; न कोई अहंकार।

मन मौन—नहीं, मन ही न पृथक; मैं

अकल खिलौना, तुम खिलार॥२॥

मैं नित्य जो कुछ करती, बोलती तथा नाचती हूँ, सब तुम्हारे अधीन रहकर ही; मेरे भीतर कोई अहंकार—अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। मेरा मन सर्वथा मौन—क्रियाहीन हो गया है; नहीं-नहीं, मेरे मनकी अलग सत्ता ही नहीं रही—तुम्हारा मन ही मेरा मन बन रहा है। मैं तो अचिन्त्य(किसीकी धारणामें न आये, ऐसा) खिलौना हूँ, तुम्हीं उससे खेलनेवाले हो॥२॥

क्या करूँ, नहीं क्या करूँ—करूँ

इसका मैं कैसे कुछ विचार।

तुम करो सदा स्वच्छन्द, सुखी जो

करे तुम्हें, सो प्रिय विहार॥३॥

मुझको क्या करना है और क्या नहीं करना है—इसपर मैं कैसे कुछ विचार करूँ। तुम ही स्वयं सोचकर, जिससे तुमको सुख हो, ऐसा तुमको प्यारा लगनेवाला विहार—तुम्हारी रुचिका खेल स्वच्छन्दतासे (किसी तरहका संकोच न करके) नित्य करते रहो॥३॥

अनबोल, नित्य निष्क्रिय, स्पन्दनसे

रहित, सदा मैं निर्विकार।

तुम जब जो चाहो, करो, सदा,

बेशर्त, न कोई भी करार॥४॥

मैं तो सदा बोलनेमें असमर्थ, क्रियाहीन, चेष्टाशून्य (हिलने-डुलनेमें भी अशक्त) तथा विकाररहित (प्रतिक्रियाशून्य) हूँ। तुम जिस क्षण, जो कुछ करना चाहो, वही सदा किया करो—मेरी ओरसे कोई शर्त अथवा करार नहीं है॥४॥

मरना-जीना मेरा कैसा,

कैसा मेरा मानापमान।

हैं सभी तुम्हारे ही, प्रियतम!

ये खेल नित्य सुखमय महान॥५॥

मेरे लिये मरना-जीना कैसा और कैसा मेरा मान-अपमान। अर्थात् मेरे लिये मरना-जीना और मान-अपमान भी कुछ अर्थ नहीं रखते। प्रियतम! ये सब तुम्हारे ही महान् सुखमय नित्यके खेल हैं॥५॥

कर दिया क्रीड़नक बना मुझे

निज करका तुमने अति निहाल।

यह भी कैसे मानूँ-जानूँ,

जानो तुम ही निज हाल-चाल॥६॥

तुमने अपने हाथका खिलौना बनाकर मुझको अत्यन्त निहाल कर दिया है। यह भी मैं कैसे मानूँ अथवा जानूँ? अपना हालचाल तुम ही जानो। (कारण, तुम्हीं सब कुछ करते-कराते हो)॥६॥

इतना मैं जो यह बोल गयी,

तुम जान रहे—है कहाँ कौन।

तुम ही बोले भर सुर मुझमें

मुखरा-से, मैं तो शून्य मौन॥७॥

इतनी बात जो मैं कह गयी, वह भी तुम जानते हो कि कौन कहाँपर है, कौन बोल-बुलवा रहा है; सच बात तो यह है कि मुझमें स्वर भरकर तुम्हीं मुखरा-जैसे बनकर बोले हो। मैं तो वाचालतासे शून्य—मौन हूँ॥ ७॥