२ श्रीराधाके प्रेमोद‍्गार—श्रीकृष्णके प्रति

(राग रागेश्वरी—ताल दादरा)

हौं तो दासी नित्य तिहारी।

प्राननाथ जीवन-धन मेरे,

हौं तुम पै बलिहारी॥१॥

प्राणनाथ! मैं तो तुम्हारी नित्य दासी—सदाकी चेरी हूँ। तुम मेरे प्राणोंके स्वामी तथा जीवन-सर्वस्व हो, मैं तुमपर बलिहारी हूँ—न्योछावर हूँ॥१॥

चाहें तुम अति प्रेम करौ,

तन-मन सौं मोहि अपनाऔ।

चाहें द्रोह करौ, त्रासौ,

दुख देइ मोहि छिटकाऔ॥२॥

चाहे तुम मुझसे अत्यन्त प्रेम करो, शरीर और मनसे मुझको अंगीकार करो अथवा द्रोह करो, त्रासो, दु:ख देकर मुझको छोड़-छिटका दो॥२॥

तुम्हरौ सुख ही है मेरौ सुख,

आन न कछु सुख जानौं।

जो तुम सुखी होउ मो दुखमें,

अनुपम सुख हौं मानौं॥३॥

तुम्हारा सुख ही मेरा सुख है, दूसरा कोई सुख मैं रंचमात्र भी नहीं जानती। यदि तुम मेरे दु:खमें सुखका अनुभव करो तो (तुमको सुखी देखकर) उस दु:खमें मैं ऐसे महान् सुखका अनुभव करूँ, जिसकी कहीं उपमा नहीं॥३॥

सुख भोगौं तुम्हरे सुख कारन,

और न कछु मन मेरे।

तुमहि सुखी नित देखन चाहौं

निसि-दिन साँझ-सबेरे॥४॥

मैं जो सुख बिलसती हूँ, वह भी तुम्हारे सुखके कारण ही; मेरे मनमें दूसरे सुखकी कल्पना ही नहीं। मैं तुमको नित्य—संध्यासे सबेरेतक और सबेरेसे संध्यातक—रात-दिन सुखी देखना चाहती हूँ॥४॥

तुमहि सुखी देखन हित हौं निज

तन-मन कौं सुख देऊँ।

तुमहि समरपन करि अपने कौं

नित तव रुचि कौं सेऊँ॥५॥

तुमको सुखी देखनेके लिये ही मैं अपने शरीर और मनको सुखी रखती हूँ—मुझे सुखी देखकर तुमको सुख होता है, इसी कारण मैं शरीर और मनसे सुखी रहती हूँ। अपने-आपको तुम्हें अर्पण करके मैं सदा तुम्हारी रुचिका ही सेवन करती हूँ॥५॥

तुम मोहि ‘प्रानेस्वरि’, ‘हृदयेस्वरि’,

‘कांता’ कहि सचु पावौ।

यातैं हौं स्वीकार करौं सब,

जद्यपि मन सकुचावौ॥६॥

तुम मुझको ‘प्राणेश्वरी’, ‘हृदयकी स्वामिनी’, ‘कान्ता’ (प्यारी) कहकर सुख प्राप्त करते हो, इसीसे मैं इन सब सम्बोधनोंको स्वीकार कर लेती हूँ, ग्रहण कर लेती हूँ, यद्यपि इन शब्दोंको सुनकर मुझको मनमें बहुत संकोच होता है—संकोचके मारे मैं गड़ जाती हूँ॥६॥