३ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग भैरवी—तीन ताल)

हे आराध्या राधा! मेरे

मनका तुझमें नित्य निवास।

तेरे ही दर्शन कारण मैं

करता हूँ गोकुलमें वास॥१॥

हे आराध्या राधे! मेरा मन सदा—दिन-रात तुझीमें बसा रहता है। मुझको तेरा दर्शन मिलता रहे, इसी लोभसे मैं गोकुलमें बस रहा हूँ॥१॥

तेरा ही रस-तत्त्व जानना,

करना उसका आस्वादन।

इसी हेतु दिन-रात घूमता

मैं करता वंशीवादन॥२॥

तेरे ही रसके तत्त्वको जानने और उसका आस्वादन करनेके लिये मैं बाँसुरी बजाता रात-दिन इधर-उधर घूमता-फिरता हूँ॥२॥

इसी हेतु स्नानको जाता,

बैठा रहता यमुना-तीर।

तेरी रूपमाधुरीके दर्शन-

हित रहता चित्त अधीर॥३॥

इसीके लिये मैं स्नान करनेको यमुनापर जाया करता हूँ और तटपर बैठा रहता हूँ। तेरी रूपमाधुरीका दर्शन करनेके लिये मेरा चित्त अधीर—उतावला रहता है॥३॥

इसी हेतु रहता कदम्बतल,

करता तेरा ही नित ध्यान।

सदा तरसता चातककी ज्यौं,

रूप-स्वातिका करने पान॥४॥

इसी कारण मैं कदम्बके नीचे अवस्थित रहता हूँ और नित्य तेरा ही ध्यान—तेरा ही चिन्तन करता रहता हूँ। तेरी रूपछटारूप स्वातिके जलका पान करनेके लिये मैं पपीहेकी भाँति सदा तरसता रहता हूँ— लालायित रहता हूँ॥४॥

तेरी रूप-शील-गुण-माधुरि

मधुर नित्य लेती चित चोर।

प्रेमगान करता नित तेरा,

रहता उसमें सदा विभोर॥५॥

तेरे रूप, शील-स्वभाव तथा गुणोंकी मोहक मधुरता बरबस मेरे चित्तको चुरा लेती है। इसीसे मैं नित्य तेरे प्रेमके गीत गाता हुआ सदा उसीमें तन्मय रहता हूँ॥५॥