४ श्रीराधाके प्रेमोद‍्गार—श्रीकृष्णके प्रति

(राग भैरवी—तीन ताल)

मेरी इस विनीत विनतीको

सुन लो, हे व्रजराजकुमार!

युग-युग, जन्म-जन्ममें मेरे

तुम ही बनो जीवनाधार॥१॥

मेरी इस विनीत प्रार्थनाको, हे व्रजराजकुमार! तुम ध्यान देकर सुन लो। युग-युगान्तरमें, जन्म-जन्ममें तुम्हीं मेरे जीवनके आधार बने रहो—यही मैं चाहती हूँ॥१॥

पद-पंकज-परागकी मैं नित

अलिनी बनी रहूँ, नँदलाल!

लिपटी रहूँ सदा तुमसे मैं,

कनकलता ज्यों तरुण तमाल॥२॥

तुम्हारे चरण-कमलोंके परागकी, हे नन्दलाल! मैं नित्य भ्रमरी बनी रहूँ—उन चरणोंपर मँडराती डोलूँ। इतना ही नहीं, जैसे कोई सोनेकी बेल नवीन तमालके वृक्षसे सदा लिपटी रहे, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे श्रीअंगोंसे सटी रहूँ॥२॥

दासी मैं हो चुकी सदाको,

अर्पणकर चरणोंमें प्राण।

प्रेम-दामसे बँध चरणोंमें,

प्राण हो गये धन्य महान॥३॥

तुम्हारे चरणोंपर अपने प्राणोंको न्योछावर करके मैं सदाके लिये तुम्हारी चेरी बन चुकी हूँ। प्रेमकी डोरीसे तुम्हारे चरणोंमें बँधकर मेरे ये प्राण अत्यन्त धन्य हो चुके हैं॥३॥

देख लिया, त्रिभुवनमें बिना

तुम्हारे और कौन मेरा।

कौन पूछता है ‘राधा’ कह,

किसको राधाने हेरा॥४॥

मैंने परीक्षण करके देख लिया, त्रिलोकीमें तुमको छोड़कर मेरा और कौन है (कोई नहीं है)। ‘राधा’ नाम लेकर दूसरा कौन मुझको टेरता है और मुझ राधाकी भी दृष्टि और किसकी ओर गयी है?॥४॥

इस कुल, उस कुल—दोनों कुल,

गोकुलमें मेरा अपना कौन?

अरुण मृदुल पद-कमलोंकी ले

शरण अनन्य, गयी होमौन॥५॥

मेरे नैहरमें और ससुरालमें—दोनों परिवारोंमें, इस गोकुल (व्रज)-में मेरा सगा कौन है—कोई नहीं। एकमात्र तुम्हारे लाल-लाल सुकुमार चरण-कमलोंका आश्रय लेकर मैं मौन हो गयी हूँ॥५॥

देखे बिना तुम्हें पलभर भी

मुझे नहीं पड़ता है चैन।

तुम ही प्राणनाथ नित मेरे,

किसे सुनाऊँ मनके बैन॥६॥

तुमको देखे बिना मुझको एक पल भी चैन—शान्ति नहीं मिलती। सदाके लिये तुम्हीं मेरे प्राणोंके स्वामी हो, तुमको छोड़कर और किसको अपने मनकी बात सुनाऊँ?॥६॥

रूप-शील-गुणहीन समझकर

कितना ही दुतकारो तुम।

चरणधूलि मैं चरणोंमें ही

लगी रहूँगी, बस, हरदम॥७॥

रूप, शील-स्वभाव तथा गुणोंसे हीन समझकर तुम मुझको कितना ही दुतकारो, मैं तो तुम्हारे चरणोंकी रज हूँ और प्रतिक्षण चरणोंमें ही चिपटी रहूँगी—बस, इतनी बात जानती हूँ॥७॥