५ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग परज—तीन ताल)

हे बृषभानुराजनन्दिनि! हे

अतुल प्रेम-रस-सुधा-निधान!

गाय चराता वन-वन भटकूँ,

क्या समझूँ मैं प्रेम-विधान॥१॥

हे वृषभानु राजाकी बेटी! हे प्रेम-रस-सुधाकी अनुपम निधि! मैं तो गायोंको चराता वन-वनमें भटकता रहता हूँ; मैं भला, प्रेमकी रीति-नीति—प्रेम कैसे किया जाता है, यह क्या जानूँ!॥१॥

ग्वाल-बालकोंके सँग डोलूँ,

खेलूँ सदा गँवारू खेल।

प्रेम-सुधा-सरिता तुमसे मुझ

तप्त धूलका कैसा मेल?॥२॥

मैं तो ग्वाल-बालोंके साथ घूमता रहता हूँ तथा सदा गँवारू खेल खेलता रहता हूँ। तुम तो प्रेमरूपी अमृतकी सरिता हो और मैं तपी हुई वालुका हूँ; मेरा तुम्हारे साथ कैसा मेल?॥२॥

तुम स्वामिनि अनुरागिणि! जब

देती हो प्रेमभरे दर्शन।

तब अति सुख पाता मैं, मुझपर

बढ़ता अमित तुम्हारा ऋण॥३॥

अनुरागभरी स्वामिनि! जब भी तुम मुझको प्रेमभरा दर्शन देती हो, तब मुझको अपार सुखका अनुभव होता है और मुझपर तुम्हारा ऋण असीम रूपसे बढ़ जाता है॥३॥

कैसे ऋणका शोध करूँ मैं,

नित्य प्रेम-धनका कंगाल।

तुम्हीं दयाकर प्रेमदान दे,

मुझको करती रहो निहाल॥४॥

मैं तो सदा ही प्रेम-धनका कंगाल हूँ, तब मैं तुम्हारे इस अत्यन्त बढ़े हुए ऋणको कैसे चुका सकता हूँ? तुम दयाकी खानि हो; तुम्हीं प्रेमका दान देकर मुझको निहाल—कृतार्थ करती रहो, यही मेरी विनती है॥४॥