६ श्रीराधाके प्रेमोद‍्गार—श्रीकृष्णके प्रति

(राग परज—तीन ताल)

सुन्दर श्याम कमल-दल-लोचन,

दुखमोचन व्रजराजकिशोर!

देखूँ तुम्हें निरन्तर हिय-

मन्दिरमें, हे मेरे चितचोर!॥१॥

हे कमल-जैसे नेत्रोंवाले श्यामसुन्दर! हे दु:खसे छुड़ानेवाले व्रजराज-किशोर! हे मेरे चित्तचोर! मैं तुमको अपने हृदयरूप भवनमें निरन्तर—बिना बाधा निहारती रहूँ॥१॥

लोक-मान-कुल-मर्यादाके

शैल सभी कर चकनाचूर।

रक्खूँ तुम्हें समीप सदा मैं,

करूँ न पलक तनिक भर दूर॥२॥

मेरा मन चाहता है कि लोक-लाज, मान-प्रतिष्ठा तथा कुलकी मर्यादारूपी समस्त पर्वतोंको चकनाचूर करके मैं तुमको सदा ही अपने समीप बनाये रखूँ, एक पलक भी और तनिक भी दूर नहीं रहने दूँ॥२॥

पर मैं अति गँवार ग्वालिनि,

गुणरहित, कलंकी, सदा कुरूप।

तुम नागर, गुण-आगर, अतिशय

कुलभूषण, सौन्दर्य-स्वरूप॥३॥

परंतु मैं तो निरी गँवार ग्वालिनी हूँ, गुणोंसे रीती, कलंकिनी और सदा ही कुरूपा हूँ। इसके विपरीत तुम अत्यन्त चतुर, अनन्त गुणोंके भण्डार, कुलके महान् भूषण तथा सुन्दरताके स्वरूप ही हो॥३॥

मैं रस-ज्ञान-रहित, रसवर्जित,

तुम रसनिपुण, रसिक-सिरताज।

इतनेपर भी, दयासिन्धु!

तुम मेरे उरमें रहे विराज॥४॥

कहाँ मैं रसके ज्ञानसे सर्वथा शून्य, रसहीन और कहाँ तुम रसके मर्मज्ञ तथा रसिकोंके सिरमौर हो। इतनेपर भी तुम दयाके सागर [मुझपर दया करके ही] मेरे हृदयमें सदा विराजित रहते हो॥४॥