७ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग भैरवी तर्ज—तीन ताल)

हे प्रियतमे राधिके! तेरी

महिमा अनुपम, अकथ, अनन्त।

युग-युगसे गाता मैं अविरत,

नहीं कहीं भी पाता अन्त॥१॥

हे प्रियतमे राधिके! तेरी महिमा उपमारहित, अवर्णनीय और अनन्त है। मैं युग-युगान्तरसे बिना विराम लिये उसका गान करता आ रहा हूँ, तब भी उसका कहीं अन्त—ओर-छोर नहीं मिलता॥१॥

सुधानन्द बरसाता हियमें

तेरा मधुर वचन अनमोल।

बिका सदाके लिये मधुर दृग-

कमल, कुटिल भ्रुकुटीके मोल॥२॥

तेरे मधुर अनमोल बोल मेरे हृदयमें आनन्दामृत बरसाया करते हैं। तेरे मधुर कमल-से नेत्र तथा बाँकी भौंहोंके मोल मैं सदाके लिये बिक चुका हूँ॥२॥

जपता तेरा नाम मधुर

अनुपम, मुरलीमें नित्य ललाम।

नित अतृप्त नयनोंसे तेरा

रूप देखता अति अभिराम॥३॥

अपनी मुरलीमें मैं तेरे उपमारहित मधुर एवं श्रेष्ठ नामकी रात-दिन रट लगाया करता हूँ और अतृप्त नेत्रोंसे तेरे अत्यन्त मनोहर रूपको नित्य निहारता रहता हूँ॥३॥

कहीं न मिला प्रेम शुचि ऐसा,

कहीं न पूरी मनकी आश।

एक तुझीको पाया मैंने

जिसने किया पूर्ण अभिलाष॥४॥

तेरे-जैसा निर्मल पवित्र प्रेम मुझको कहीं नहीं मिला, कहीं भी मेरे मनकी आशा पूर्ण नहीं हुई। एकमात्र तू ही मुझको ऐसी मिली है, जिसने मेरी अभिलाषा पूरी की है॥४॥

नित्य तृप्त निष्काम नित्यमें

मधुर अतृप्ति, मधुरतम काम।

तेरे दिव्य प्रेमका है यह

जादूभरा मधुर परिणाम॥५॥

मैं (अपने ही आनन्दसे) नित्य तृप्त रहनेवाला और सदा निष्काम—कामनाहीन हूँ। ऐसे मुझमें मधुर अपरिमित अतृप्ति और अत्यन्त मधुर अपरिमित कामना जगा देना—यह तेरे अलौकिक प्रेमका ही जादूभरा मधुर फल है॥५॥