८ श्रीराधाके प्रेमोद‍्गार—श्रीकृष्णके प्रति

(राग भैरवी तर्ज—तीन ताल)

सदा सोचती रहती हूँ मैं,

क्या दूँ तुमको, जीवनधन!

जो धन देना तुम्हें चाहती,

तुम ही हो वह मेरा धन॥१॥

मेरे जीवनधन! मैं सदा सोचती रहती हूँ कि तुमको क्या दूँ। जो धन मैं तुमको देना चाहती हूँ, मेरा वह धन तो तुम ही हो॥१॥

तुम ही मेरे प्राणप्रिय हो,

प्रियतम! सदा तुम्हारी मैं।

वस्तु तुम्हारी तुमको देते

पल-पल हूँ बलिहारी मैं॥२॥

तुम्हीं मुझको प्राणोंसे प्यारे हो और हे प्रियतम! मैं सदा तुम्हारी हूँ। तुम्हारी ही वस्तु तुमको देती हुई मैं पल-पल तुमपर बलिहारी—न्योछावर हूँ॥२॥

प्यारे! तुम्हें सुनाऊँ कैसे

अपने मनकी सहित विवेक।

अन्योंके अनेक, पर मेरे

तो तुम ही हो, प्रियतम! एक॥३॥

हे प्यारे! मैं अपने मनकी बात विवेकपूर्वक—होश-हवासमें तुमसे कैसे कहूँ? औरोंके तो अनेक हैं, परंतु मेरे तो हे प्रियतम! तुम एक ही हो॥३॥

मेरे सभी साधनोंकी, बस

एकमात्र हो तुम ही सिद्धि।

तुम ही प्राणनाथ हो, बस,

तुम ही हो मेरी नित्य समृद्धि॥४॥

अधिक क्या कहूँ, मेरे सम्पूर्ण साधनोंकी सिद्धि—सफलता एकमात्र तुम्हीं हो। तुम ही मेरे प्राणनाथ हो और तुम्हीं मेरा नित्य ऐश्वर्य—स्थिर सम्पत्ति हो, केवल इतनी बात मैं जानती हूँ॥४॥

तन-धन-जनका बन्धन टूटा,

छूटा भोग-मोक्षका रोग।

धन्य हुई मैं, प्रियतम! पाकर

एक तुम्हारा प्रिय संयोग॥५॥

देह, धन और परिवारका बन्धन टूट गया; भोग और मोक्षका रोग भी मिट गया। एक तुम्हारा प्यारा संयोग—मिलन पाकर हे प्रियतम! मैं धन्य-धन्य हो गयी॥५॥