९ श्रीकृष्णके प्रेमोद‍्गार—श्रीराधाके प्रति

(राग गूजरी—ताल कहरवा)

राधे! हे प्रियतमे! प्राण-

प्रतिमे! हे मेरी जीवन-मूल!

पल भर भी न कभी रह सकता,

प्रिये! मधुर मैं तुमको भूल॥१॥

राधे! हे प्रियतमे! हे मेरे प्राणोंकी पुतली! हे मेरी जीवनमूल! हे प्रिये! मधुरातिमधुर तुमको बिसराकर मैं किसी क्षण पलमात्र भी नहीं रह सकता हूँ॥१॥

श्वास-श्वासमें तेरी स्मृतिका

नित्य पवित्र स्रोत बहता।

रोम-रोम अति पुलकित तेरा

आलिंगन करता रहता॥२॥

श्वास-श्वासमें तेरी यादका पवित्र झरना बहा करता है। मेरा रोम-रोम अत्यन्त पुलकित होकर नित्य-निरन्तर तेरा आलंगन करता रहता है॥२॥

नेत्र देखते तुझे नित्य ही,

सुनते शब्द मधुर यह कान।

नासा अंग-सुगन्ध सूँघती,

रसना अधर-सुधा-रस-पान॥३॥

मेरे नेत्र नित्य तुझको ही निरखते रहते हैं और ये कान तेरा ही मधुर-मनोहर बोल सुनते रहते हैं। मेरी नासिका तेरे ही अंगोंसे निकलनेवाली परम मनोहर सुगन्धको सूँघती रहती है और रसना तेरे ही अधरोंके सुधामय रसका पान करती रहती है॥३॥

अंग-अंग शुचि पाते नित ही

तेरा प्यारा अंग-स्पर्श।

नित्य नवीन प्रेम-रस बढ़ता,

नित्य नवीन हृदयमें हर्ष॥४॥

मेरा एक-एक अंग—अवयव तेरे प्यारे अंगोंका स्पर्श पाकर नित्य पवित्र होता रहता है। तेरे प्रेमका रस नित्य नया बढ़ता रहता है और उसीके साथ-साथ मेरे हृदयमें हर्ष भी नित्य नया बढ़ता रहता है॥४॥