पुष्पिका
महाभाव-रसराजके मधुर मनोहर भाव।
दिव्य, मधुरतम, रागमय, दैन्य विभूषित चाव॥१॥
महाभावस्वरूपा श्रीराधा और मूर्तिमान् रसराज श्रीकृष्णके ये भाव (जो ऊपरके सोलह गीतोंमें व्यक्त हुए हैं) मधुर और मन हरण करनेवाले ही नहीं, ये अलौकिक, मधुरतम, प्रेमासक्तिमय और प्रेमके दीनतारूप गुणसे विभूषित हैं॥१॥
दोनों दोनोंके लिये सहज सभी कर त्याग।
सुखद परस्पर बन रहे, छलक रहा अनुराग॥२॥
दोनों ही एक-दूसरेके लिये सहज भावसे—अनायास सब कुछ त्यागकर एक-दूसरेको सुख पहुँचानेमें दत्तचित्त रहते हैं और दोनोंके हृदयमें अनुराग छलक रहा है॥२॥
दोनों दोनोंके सदा प्रेमी-प्रेष्ठ महान।
नित्य, अनन्त, अचिन्त्य, शुचि, अनिर्वाच्य रस खान॥३॥
दोनों ही सदा दोनोंके—एक-दूसरेके महान् प्रेमी और महान् प्रेमास्पद हैं। दोनों ही उस दिव्य रसके अटूट स्रोत हैं, जो नित्य और अनन्त है—जिसका त्रिकालमें कभी अभाव और अन्त नहीं होता, चित्तके द्वारा जो चिन्तनमें नहीं आता, वाणीसे जिसका वर्णन नहीं हो सकता तथा जो सर्वथा पवित्र—काम-कलंकसे शून्य, त्यागमय है॥३॥
सुख-दुख दोनों ही सुखद, प्रियतम-सुखके हेतु।
अन्य सभी टूटे सहज मिथ्या निजसुख-सेतु॥४॥
इनके प्रेम-राज्यमें सुख-दु:ख नामकी दोनों अवस्थाएँ प्रेमास्पदके सुख-उल्लासकी हेतु होनेके कारण सुख देनेवाली हैं। इसमें आत्म-सुखकी कामनारूप जितने भी झूठे बाँध थे, वे सब अपने-आप टूट चुके—नष्ट हो चुके हैं॥४॥
राधा-माधव-प्रेम-रस वाचा-चित्त-अतीत।
करते शाखाचन्द्र-से इंगित सोलह गीत॥५॥
श्रीराधा एवं श्रीकृष्णका यह दिव्य प्रेम-रस वाणी तथा चित्तसे अतीत है। ऊपरके सोलह गीत इस रसका संकेतमात्र करते हैं—जैसे द्वितीयाके चन्द्रमाको दिखानेके लिये यह कहा जाता है कि वह अमुक वृक्षकी अमुक डालसे सटा हुआ है, यद्यपि चन्द्रमा वहाँसे लाखों कोस दूर है॥५॥