श्रीराधा-माधव-रस-सुधा
[षोडशगीत]
महाभाव-रसराज-वन्दना
दोउ चकोर, दोउ चंद्रमा, दोउ अलि, पंकज दोउ।
दोउ चातक, दोउ मेघ प्रिय, दोउ मछरी, जल दोउ॥ १॥
श्रीराधा-माधव दोनों एक-दूसरेके लिये चकोर भी हैं और चन्द्रमा भी, भ्रमर भी हैं और कमल भी, पपीहा भी हैं और मेघ भी एवं मछली भी हैं और जल भी॥१॥
आस्रय-आलंबन दोउ, बिषयालंबन दोउ।
प्रेमी-प्रेमास्पद दोउ, तत्सुख-सुखिया दोउ॥ २॥
प्रिया-प्रियतम एक-दूसरेके प्रेमी भी हैं और प्रेमास्पद भी। प्रेमीको कहते हैं—‘आश्रयालम्बन’ और प्रेमास्पदको ‘विषयालम्बन’। कहीं श्यामसुन्दर प्रेमी बनते हैं तो राधाकिशोरी प्रेमास्पद हो जाती हैं और जहाँ राधाकिशोरी प्रेमिकाका बाना धारण करती हैं वहाँ श्यामसुन्दर प्रेमास्पद हो जाते हैं। प्रेमका स्वरूप ही है प्रेमास्पदके सुखमें सुख मानना। इसीसे प्रेमीको ‘तत्सुख-सुखिया’ कहते हैं। श्रीराधाकिशोरी और उनके प्राण-प्रियतम श्रीकृष्ण दोनों ही तत्सुख-सुखी हैं। श्रीराधाको सुखी देखकर श्यामसुन्दरको सुख होता है और श्यामसुन्दरको सुखी देखकर श्रीराधा सुखी होती हैं॥२॥
लीला-आस्वादन-निरत महाभाव-रसराज।
बितरत रस दोउ दुहुन कौं, रचि बिचित्र सुठि साज॥ ३॥
प्रेमकी अन्तिम परिणतिका नाम है ‘महाभाव’। महाभावके मूर्तिमान् विग्रह हैं श्रीराधा। इसी प्रकार रसोंमें सर्वश्रेष्ठ रस है उज्ज्वल अथवा शृंगाररस। इसके मूर्तिमान् स्वरूप हैं श्रीकृष्ण। इस प्रकार श्रीराधा और श्रीकृष्णके रूपमें साक्षात् महाभाव-रसराज ही परस्पर लीलारसका आस्वादन करते रहते हैं और नाना प्रकारके नित्य नूतन साज—वेश सजकर एक-दूसरेको रसका वितरण किया करते हैं॥ ३॥
सहित बिरोधी धर्म-गुन जुगपत नित्य अनंत।
बचनातीत अचिन्त्य अति, सुषमामय श्रीमंत॥ ४॥
प्रिया-प्रियतम दोनों ही एक ही कालमें परस्परविरोधी, अनन्त, नित्य, मन-वाणीके अगोचर (वाणीसे जिनका वर्णन नहीं हो सकता और चित्तसे जिनका चिन्तन नहीं हो सकता), अत्यन्त शोभामय एवं दिव्य ऐश्वर्ययुक्त गुणोंसे विभूषित रहते हैं॥ ४॥
श्रीराधा-माधव-चरन बंदौं बारंबार।
एक तत्त्व दो तनु धरैं, नित-रस-पारावार॥ ५॥
ये तत्त्वत:—स्वरूपत: एक होते हुए दो भिन्न स्वरूपोंको धारण किये हुए हैं। नित्य रसके समुद्र उन श्रीराधा-माधवके चरणोंकी मैं बारम्बार वन्दना करता हूँ॥ ५॥