आध्यात्मिक जगत‍्में पतन

सम्मान्य महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। आपने......तथा ........नामक संस्थाओं तथा उनके संचालकों या गुरुओंकी स्थितिके सम्बन्धमें पूछा, सो इस सम्बन्धमें कुछ कहा नहीं जा सकता। साधनाके क्षेत्रमें कौन किस स्तरपर है, कौन तत्त्व-साक्षात्कारको प्राप्त पुरुष है—यह दूसरा कोई नहीं जानता। इसीलिये कुछ भी कहना अनधिकार चर्चा है। हाँ, इतनी बात अवश्य है कि प्रत्येक आध्यात्मिक साधनाके मार्गमें दैवी सम्पदाके गुण साधना-प्रासादकी नींवके रूपमें आवश्यक हैं। इसीसे योगमें ‘यम-नियम’, भक्तिरसमें ‘शान्तरस’, ज्ञानमें ‘साधन-चतुष्टय’—उनमें भी ‘षट् सम्पत्ति’, कर्ममें मनुकथित ‘दस धर्म’—आदि अत्यावश्यक हैं; नहीं तो, बिना नींवके मकानकी भाँति साधन टिक ही नहीं सकता। जिस संस्थामें या जिस महात्मामें ये सब हों और जिनसे ये सब मिलते हों, अपने लिये वे ही निरापद हैं—चमत्कार, सिद्धि पलभरमें ध्यान-समाधि आदि निरापद नहीं हैं, क्योंकि उनमें दम्भ भी हो सकता है। आपका लिखना सत्य है—आजकल ऐसी संस्थाओं, गुरुओं और अवतारोंकी भरमार है, जो शास्त्रोंको बखेड़ा तथा अनावश्यक बताते हैं; अपना अलग मनमाना पन्थ चलाते हैं। वे कहते हैं—

‘संयम-नियम, आचार-विचार, संध्या-पूजा, शुद्ध आहार-विहार, त्याग-वैराग्य, स्वाध्याय-जप आदिकी कोई आवश्यकता नहीं। देवता, ऋषि, मुनि आदि कुछ नहीं; राम-कृष्णको मानना बेकार है। कुछ भी करें, कुछ भी खायें-पीयें, कैसा भी आचरण करें—कोई रोक-टोक नहीं। बस, हमारी बात मानो, हम कहें सो करो। एक हम तथा हमारा सिद्धान्त ही सत्य है और सब मिथ्या है। हम ही अवतार हैं, हमारे ही अनुभव सत्य हैं। हम नवीन मानव, नवीन समाज, नवीन आचार-पद्धतिकी स्थापना करके जगत‍्का उद्धार करने आये हैं। हम सर्वसमर्थ हैं। हम योग-सिद्ध हैं, हम शक्तिमान् हैं, योगबल तथा शक्तिसे ही सबका कल्याण कर सकते हैं’ इत्यादि।

इस प्रकार स्वच्छन्द उपदेश-आदेश देनेवाले तथा वैसे ही आचरण करने-करानेवाले तथा सब प्रकारके आराम-भोगोंका स्वच्छन्द उपभोग करनेवाले यथेच्छाचारी लोगोंकी मानो बाढ़-सी आ गयी है।

इस प्रकारके वातावरणमें सावधान रहनेकी बड़ी आवश्यकता है। बस, दैवी सम्पदा (गीता १६।१—३)-की कसौटीपर परखकर चलिये; नहीं तो, धोखा ही होगा। आप धोखा खा चुके हैं, इसलिये औरोंको भी सावधान करते रहिये तथा खण्डन-मण्डनमें न पड़कर चुपचाप सदाचारका सेवन, भगवान‍्का भजन, शास्त्रोंका—उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्‍गीता, भागवत, रामायण, मनुस्मृति आदिका स्वाध्याय तथा भगवन्नामका जप करते रहिये। गोस्वामी तुलसीदासजी आजके युगके सम्बन्धमें कहते हैं—

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा।

पंडित सोइ जो गाल बजावा॥

मिथ्यारंभ दंभ रत जोई।

ता कहुँ संत कहइ सब कोई॥

सोइ सयान जो परधन हारी।

जो कर दंभ सो बड़ आचारी॥

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी।

कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥

शेष भगवत्कृपा।